चंबा रुमाल से प्रेरित कुर्ते में दिखीं साक्षी धोनी हिमाचल की पारंपरिक कला ने जीता फैशन प्रेमियों का दिल

साक्षी धोनी ने चंबा रुमाल से प्रेरित खास कुर्ता पहनकर हिमाचल प्रदेश की सदियों पुरानी कढ़ाई कला को नया मंच दिया। इस पारंपरिक कला का इतिहास 16वीं शताब्दी से जुड़ा है और इसका एक नमूना लंदन के विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम में भी मौजूद है।

चंबा रुमाल से प्रेरित कुर्ते में दिखीं साक्षी धोनी  हिमाचल की पारंपरिक कला ने जीता फैशन प्रेमियों का दिल

साक्षी धोनी ने चंबा रुमाल से प्रेरित आइवरी कुर्ता पहनकर सबका ध्यान खींचा
16वीं शताब्दी से जुड़ी है चंबा रुमाल की ऐतिहासिक कढ़ाई कला
डिजाइनर हिना कोचर ने पारंपरिक पहाड़ी कला से तैयार किया खास लुक


भारतीय क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी की पत्नी साक्षी धोनी इन दिनों अपने खास पारंपरिक लुक को लेकर चर्चा में हैं।

हाल ही में वह सचिन तेंदुलकर के बेटे अर्जुन तेंदुलकर की शादी में एक आइवरी रंग के खूबसूरत सूट में नजर आईं। यह कुर्ता खास इसलिए बना क्योंकि इसका डिजाइन हिमाचल प्रदेश के प्रसिद्ध चंबा रुमाल से प्रेरित था।

साक्षी के इस लुक में भारतीय पारंपरिक कला, इतिहास और आधुनिक फैशन का अनोखा संगम दिखाई दिया।

इस खास लुक को फैशन डिजाइनर हिना कोचर ने डिजाइन किया। उन्होंने श्यामली अरोड़ा के साथ मिलकर इस आउटफिट को तैयार किया।

बताया गया कि साक्षी चाहती थीं कि उनका पहनावा ऐसी पारंपरिक टेक्सटाइल कला को सम्मान दे, जो अपनी कहानी कहने की कला के लिए जानी जाती है।

इसलिए कुर्ते पर लाल, पीले, हरे और नीले रंग के धागों से प्रकृति प्रेरित डिजाइन बनाए गए, जो चंबा रुमाल की पारंपरिक शैली को दर्शाते हैं।

चंबा रुमाल हिमाचल प्रदेश की एक बेहद प्रसिद्ध हाथ से बनाई जाने वाली कढ़ाई कला है।

इसे मशीन से नहीं बल्कि पूरी तरह हाथों से तैयार किया जाता है। इस पर बनाए जाने वाले डिजाइन पहाड़ी लघु चित्रकला से प्रेरित होते हैं और इनमें कहानियां दिखाई जाती हैं

इन रुमालों पर कृष्ण लीला, महाभारत और रामायण के कई प्रसंग रंग-बिरंगे धागों से बेहद खूबसूरती से उकेरे जाते हैं।

इतिहासकारों के अनुसार चंबा रुमाल का इतिहास 16वीं शताब्दी तक जाता है

कहा जाता है कि सबसे पुराने रुमालों में से एक पर गुरु नानक देव की बहन बेबी नानकी ने कढ़ाई की थी। यह रुमाल आज भी पंजाब के होशियारपुर के एक गुरुद्वारे में संरक्षित है।

बाद में चंबा के राजाओं ने इस कला को संरक्षण दिया और 18वीं शताब्दी में राजा उम्मेद सिंह (1748–1764) के शासनकाल में यह कला अपने चरम पर पहुंच गई।

शुरुआती दौर में चंबा रुमाल शाही परिवार की महिलाएं और रानियां बनाया करती थीं। इसे खास तौर पर शादी और शुभ अवसरों पर उपहार के रूप में दिया जाता था।

समय के साथ यह कला हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान बन गई और दुनिया भर में प्रसिद्ध हो गई।

बताया जाता है कि एक खास चंबा रुमाल आज लंदन के विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम में भी सुरक्षित है, जिसे राजा गोपाल सिंह ने अंग्रेजों को भेंट किया था। उस रुमाल पर महाभारत का एक दृश्य दर्शाया गया है।