जीरो नंबर लाने वाले को भी मिली सरकारी नौकरी, हाईकोर्ट सख्त, पूछा- शून्य अंक लाने वाला कैसे योग्य?
चतुर्थ श्रेणी भर्ती 2024 में जीरो नंबर पाने वाले अभ्यर्थियों को नियुक्ति देने के मामले पर हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए सरकार से जवाब मांगा है। अदालत ने कहा कि सरकारी सेवा में न्यूनतम योग्यता का ‘बेसिक स्टैंडर्ड’ होना जरूरी है।
■ जीरो अंक वालों को नियुक्ति देने के मामले पर हाईकोर्ट ने जताई हैरानी
■ सरकार से पूछा- शून्य या नेगेटिव अंक वाला अभ्यर्थी कैसे हो सकता है योग्य
■ संबंधित विभागों को शपथ पत्र के साथ जवाब देने के आदेश, 7 अप्रैल को अगली सुनवाई
फोर्थ क्लास (चपरासी) भर्ती 2024 में जीरो नंबर लाने वाले अभ्यर्थियों को भी नियुक्ति देने के मामले में हाईकोर्ट ने हैरानी जताई है। इस मुद्दे पर हाईकोर्ट ने कड़ी प्रतिक्रिया जताते हुए सरकार से पूछा है कि जो व्यक्ति परीक्षा में शून्य या नेगेटिव अंक लाता है, उसे किसी भी सरकारी पद के लिए उपयुक्त कैसे माना जा सकता है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि चाहे पद चतुर्थ श्रेणी का ही क्यों न हो, लेकिन सरकारी सेवा में एक “बेसिक स्टैंडर्ड” होना अनिवार्य है ताकि चयनित उम्मीदवार कम से कम अपना मूल काम संतोषजनक तरीके से कर सके।
दरअसल, जस्टिस आनंद शर्मा की अदालत में विनोद कुमार की याचिका पर सुनवाई के दौरान यह मामला सामने आया। याचिकाकर्ता ने चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी भर्ती में एक्स सर्विसमैन (ओबीसी) कैटेगरी में आवेदन किया था, लेकिन भर्ती परीक्षा में उसके नेगेटिव अंक आए। वहीं उसकी कैटेगरी में कट ऑफ 0.0033 (करीब शून्य) तक पहुंच गई। याचिका में दलील दी गई कि भर्ती विज्ञप्ति और सेवा नियमों में न्यूनतम अंक निर्धारित नहीं किए गए हैं, इसलिए यदि जीरो अंक वाले अभ्यर्थी पर्याप्त संख्या में नहीं मिलते हैं तो नेगेटिव अंक वालों को भी नियुक्ति दी जानी चाहिए।
इस दलील पर अदालत ने गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकारी नौकरी में चयन के लिए एक न्यूनतम योग्यता स्तर होना आवश्यक है। अदालत ने यह भी कहा कि इस स्थिति के दो संभावित कारण हो सकते हैं—या तो परीक्षा का पेपर चतुर्थ श्रेणी के स्तर से अधिक कठिन था या फिर भर्ती के मानक जानबूझकर इतने कमजोर रखे गए कि योग्यता का कोई महत्व ही नहीं रह गया। कोर्ट ने दोनों ही परिस्थितियों को अस्वीकार्य बताते हुए सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने संबंधित विभाग के प्रमुख शासन सचिव को शपथ पत्र प्रस्तुत कर यह बताने के निर्देश दिए कि ऐसी स्थिति क्यों बनी और भविष्य में इससे बचने के लिए क्या सुधारात्मक कदम उठाए जाएंगे। हालांकि, सामान्य प्रशासन विभाग ने अदालत में कहा कि उनका काम केवल सफल अभ्यर्थियों को विभाग आवंटित करना है, जबकि भर्ती के नियम बनाना और न्यूनतम योग्यता तय करना कार्मिक विभाग और कर्मचारी चयन बोर्ड की जिम्मेदारी है।
इस पर अदालत ने नाराजगी जताते हुए कहा कि विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डाल रहे हैं, जबकि अदालत ने स्पष्ट रूप से संबंधित विभाग से जवाब मांगा था। कोर्ट ने इसे गंभीर मामला बताते हुए सभी संबंधित विभागों को अंतिम मौका दिया है कि वे अगली सुनवाई तक शपथ पत्र पेश करें, अन्यथा अदालत को सख्त कदम उठाने पड़ सकते हैं। मामले की अगली सुनवाई 7 अप्रैल को तय की गई है।
Akhil Mahajan