तो तैयार रहें , बढ़ेंगे पेट्रोल डीजल के दाम! होर्मुज संकट से शिप का भाड़ा बढ़ा
होर्मुज संकट के बीच तेल टैंकरों की कमी से शिपिंग भाड़ा बढ़ा है। भारत पर आयात लागत का दबाव बढ़ा, पेट्रोल-डीजल महंगे होने की आशंका।
➤ तेल टैंकरों की कमी से शिपिंग भाड़ा रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा
➤ अमेरिका से एशिया तक तेल ढुलाई का खर्च करीब 26 डॉलर प्रति बैरल बढ़ा
➤ महंगे भाड़े से भारत पर बढ़ा दबाव, सरकार ने पर्याप्त तेल स्टॉक होने की बात कही
दुनियाभर में कच्चा तेल ढोने वाले बड़े जहाजों यानी ऑयल टैंकरों की कमी का सीधा असर भारत पर पड़ रहा है। समुद्री रास्तों पर बढ़ते तनाव और जहाजों की उपलब्धता घटने के कारण तेल को भारत तक पहुंचाने का खर्च तेजी से बढ़ा है। 19 सितंबर तक मिली रिपोर्ट के मुताबिक, अकेले अमेरिका से एशिया तक तेल लाने का भाड़ा करीब 26 डॉलर यानी लगभग 2,300 से 2,400 रुपये प्रति बैरल बढ़ चुका है। इसका असर आगे चलकर पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ने की संभावना जताई जा रही है।
स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सिर्फ एक बड़े तेल जहाज का किराया करीब 52 मिलियन डॉलर यानी लगभग 430 करोड़ रुपये बढ़ गया है। यह बढ़ोतरी उस जहाज में भरे कुल तेल की कीमत के करीब 25 फीसदी के बराबर बताई गई है। ऐसे में कच्चे तेल की कीमत के अलावा उसे समुद्र के रास्ते भारत तक पहुंचाने की लागत भी तेल कंपनियों के लिए बड़ा दबाव बन रही है।
खाड़ी देशों से तेल लाना भी हुआ महंगा
यह समस्या केवल अमेरिका से एशिया तक के लंबे समुद्री रास्ते तक सीमित नहीं है। भारत जिन खाड़ी देशों से आमतौर पर तेल खरीदता है, वहां से भी जहाजों का किराया रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया है। फरवरी 2026 में खाड़ी देशों से भारत तक तेल लाने का भाड़ा सिर्फ 10.6 डॉलर प्रति टन था। यही भाड़ा अगस्त में बढ़कर 34.6 डॉलर और सितंबर में 61.9 डॉलर प्रति टन हो गया। वहीं, रूस से भारत तक तेल लाने का खर्च भी अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंचकर करीब 20 से 23 डॉलर प्रति बैरल बताया जा रहा है।
आखिर अचानक क्यों कम पड़ गए तेल के जहाज
जानकारों के मुताबिक, मौजूदा संकट किसी एक कारण का नतीजा नहीं है, बल्कि कई परिस्थितियों के एक साथ बनने से तेल टैंकरों की मांग और समुद्री परिवहन लागत बढ़ी है। फरवरी 2026 से अमेरिका और ईरान के बीच चल रही जंग के कारण होर्मुज के रास्ते जहाजों की आवाजाही को लेकर खतरा बढ़ गया है। दुनिया का करीब 20 फीसदी तेल और भारत की जरूरत का लगभग 45 फीसदी तेल इसी संकरे समुद्री रास्ते से गुजरता है।
इसके अलावा यमन के हूती लड़ाकों की ओर से लाल सागर में जहाजों पर हमलों का भी असर पड़ा है। 11 सितंबर को सऊदी अरब की मुख्य पाइपलाइन पर हमला होने के बाद पाइपलाइन बंद होने की स्थिति में तेल कंपनियों को जहाजों का ज्यादा इस्तेमाल करना पड़ा। इससे पहले से दबाव में चल रहे शिपिंग बाजार में जहाजों की मांग अचानक बढ़ गई।
पुराने जहाज और रूस से जुड़ी पाबंदियों का असर
रूस पर लगी पाबंदियों के बाद रूसी तेल ढोने वाले कई जहाज सामान्य कारोबार से अलग होकर ‘शैडो फ्लीट’ का हिस्सा बन गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के करीब 20 फीसदी जहाज इसी व्यवस्था में फंसे हुए हैं। दूसरी ओर, दुनियाभर में तेल ढोने वाले जहाज काफी पुराने हो चुके हैं और नए बड़े टैंकरों का निर्माण भी पर्याप्त गति से नहीं हो रहा है। वर्ष 2024 में पूरी दुनिया में सिर्फ एक नया बड़ा तेल टैंकर तैयार होने की बात कही गई है।
इसके साथ ही अमेरिका की ओर से 18 सितंबर 2026 को ‘ग्राहम एक्ट’ पारित किए जाने की बात भी सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, इस कानून के तहत रूस से तेल खरीदने वाले देशों, खासकर भारत और चीन पर 100 फीसदी तक टैक्स लगाने की बात कही गई है। हालांकि इसका लागू होना अमेरिकी राष्ट्रपति के फैसले पर निर्भर बताया गया है, लेकिन इस घोषणा ने शिपिंग बाजार में अनिश्चितता बढ़ाई है।
भारत पर कितना पड़ रहा है असर
भारत अपनी जरूरत का करीब 88.7 फीसदी कच्चा तेल दूसरे देशों से खरीदता है। ऐसे में समुद्री भाड़े में बढ़ोतरी का सीधा असर देश की तेल आयात लागत पर पड़ता है। चालू वित्त वर्ष में अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच भारत का तेल आयात बिल 48 फीसदी बढ़कर 74.8 अरब डॉलर पहुंच गया। रिपोर्ट के मुताबिक तेल आयात की मात्रा पहले जितनी ही रही, इसलिए बढ़ा हुआ खर्च कीमतों और महंगे समुद्री भाड़े से जुड़ा बताया गया है।
भारत अभी भी रूस से रोजाना करीब 1.6 मिलियन बैरल तेल खरीद रहा है। हालांकि, पहले मिलने वाली भारी छूट अब लगभग खत्म हो चुकी है। इसके साथ ही परिवहन लागत बढ़ने से रूसी तेल खरीदने से होने वाली बचत भी काफी कम रह गई है।
क्या पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ सकते हैं
कच्चे तेल और उसे भारत तक पहुंचाने के भाड़े में बढ़ोतरी से घरेलू महंगाई पर दबाव बढ़ने की आशंका है। रिजर्व बैंक के एक अनुमान के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमत में 10 डॉलर प्रति बैरल की तेजी घरेलू महंगाई को करीब आधा फीसदी तक बढ़ा सकती है। वहीं, पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी के मुताबिक तेल कंपनियों को रोज करीब 1,000 करोड़ रुपये का घाटा उठाना पड़ रहा है।
हालांकि, मौजूदा स्थिति में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर अंतिम फैसला क्या होगा, यह अलग विषय है। रिपोर्ट में फिलहाल बढ़ती परिवहन लागत को एक संभावित दबाव के तौर पर सामने रखा गया है।
सरकार ने कहा- घबराने की जरूरत नहीं
पेट्रोलियम मंत्रालय का कहना है कि लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है। सरकार के मुताबिक भारत के पास अपनी जरूरत का करीब 60 से 69 दिनों का तेल स्टॉक मौजूद है और देश की रिफाइनरियां पूरी क्षमता से काम कर रही हैं। किसी एक देश या समुद्री रास्ते पर निर्भरता कम करने के लिए भारत ने तेल खरीदने वाले देशों की संख्या भी बढ़ाई है। अब 27 के बजाय 41 देशों से तेल खरीदा जा रहा है, जिनमें अमेरिका, ब्राजील, इराक और अफ्रीकी देश शामिल हैं।
कुल मिलाकर, मौजूदा परेशानी को तेल की उपलब्धता की कमी के बजाय तेल को भारत तक पहुंचाने की बढ़ी हुई लागत से जोड़कर देखा जा रहा है। देश में फिलहाल तेल की किल्लत नहीं बताई गई है, लेकिन यदि समुद्री तनाव और जहाजों की कमी लंबे समय तक बनी रहती है तो इसका असर आने वाले दिनों में आम आदमी के बजट और रोजमर्रा के सामानों की कीमतों पर पड़ सकता है।
Akhil Mahajan