हरियाणा के सबसे बड़े 1857 स्मारक का आज लोकार्पण, 600 करोड़ में तैयार हुआ भव्य म्यूजियम

अंबाला में 600 करोड़ रुपये से बने 1857 क्रांति स्मारक का अमित शाह लोकार्पण करेंगे। जानें टिकट, टाइमिंग, 23 गैलरी, लेजर शो और प्रमुख आकर्षण।

हरियाणा के सबसे बड़े 1857 स्मारक का आज लोकार्पण, 600 करोड़ में तैयार हुआ भव्य म्यूजियम

➤ अंबाला में 1857 की क्रांति के सबसे बड़े स्मारक का आज गृहमंत्री अमित शाह करेंगे लोकार्पण

➤ करीब 600 करोड़ रुपये की लागत से 10 साल में तैयार हुआ म्यूजियम, 23 गैलरी में दिखेगा क्रांति का इतिहास

➤ 250 रुपये तक टिकट प्रस्तावित, 40 फीट ऊंची एलिवेटर गैलरी, 360 डिग्री प्रोजेक्शन और स्काई कैफे होंगे खास आकर्षण

दुबई के फ्यूचर म्यूजियम और इंग्लैंड जैसी आधुनिक तकनीक से सजा अंबाला का स्मारक, 65 मीटर ऊंचा टावर और 2 हजार दर्शकों की क्षमता वाला ओपन एयर थिएटर; दिवाली के बाद आम लोगों को मिलेगी एंट्री

हरियाणा के अंबाला में 1857 की क्रांति को समर्पित देश का सबसे बड़ा स्मारक बनकर तैयार हो गया है। गुरुवार को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह इसका लोकार्पण करेंगे। करीब 600 करोड़ रुपये की लागत से 10 साल में तैयार हुए इस स्मारक को आम लोगों के लिए दिवाली के बाद खोला जाएगा। यहां प्रवेश के लिए टिकट लेना होगा। टिकट की कीमत 250 रुपये तक प्रस्तावित है, हालांकि अंतिम फैसला मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी करेंगे। वह म्यूजियम संचालन कमेटी के चेयरमैन भी हैं।

करीब 22 एकड़ में फैले इस परिसर में इतिहास को आधुनिक डिजिटल तकनीक के जरिए दिखाया जाएगा। म्यूजियम में कुल 23 गैलरी बनाई गई हैं, जिन्हें देखने में करीब 5 घंटे का समय लगेगा। इसके अलावा शाम को होने वाला लाइट एंड साउंड शो देखने के लिए अलग से समय देना होगा। दर्शकों को दुबई के फ्यूचर म्यूजियम की तर्ज पर एलिवेटर गैलरी और इंग्लैंड की तरह 360 डिग्री प्रोजेक्शन गैलरी का अनुभव मिलेगा। परिसर में 65 मीटर ऊंचा मेमोरियल टावर, 2 हजार दर्शकों की क्षमता वाला ओपन एयर थिएटर और सबसे ऊपर स्काई कैफे भी बनाया गया है।

स्मारक के डायरेक्टर डॉ. कुलदीप सैनी का दावा है कि निर्माण लागत, कंस्ट्रक्टेड एरिया और थीम के आधार पर यह देश का सबसे बड़ा म्यूजियम है। यहां 130 शॉर्ट फिल्मों के जरिए इतिहास बताया जाएगा। म्यूजियम का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा डिजिटल टेक्नोलॉजी पर आधारित है। लेजर शो, 3D ग्राफिक्स और वर्चुअल रियलिटी (VR) के माध्यम से दर्शकों को 1857 की क्रांति के घटनाक्रम से रूबरू कराया जाएगा।

दिवाली के बाद आम लोगों के लिए खुलेगा स्मारक, 250 रुपये तक टिकट प्रस्तावित

गृहमंत्री अमित शाह गुरुवार को स्मारक का लोकार्पण करेंगे, लेकिन आम लोगों को इसके लिए दिवाली के बाद तक इंतजार करना होगा। म्यूजियम संचालन कमेटी ने प्रवेश टिकट की कीमत 250 रुपये तक प्रस्तावित की है। हालांकि यह कीमत कम या ज्यादा हो सकती है। टिकट की अंतिम दर और आम लोगों के प्रवेश की तारीख मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी घोषित करेंगे।

स्टूडेंट्स के लिए टिकट 10 रुपये रखने का प्रस्ताव है। इसके अलावा आर्मी पर्सनल, सीनियर सिटिजन्स समेत कुछ अन्य वर्गों को भी छूट देने का प्रस्ताव रखा गया है।

शाम को होने वाले लाइट एंड साउंड शो के लिए अलग से कॉम्बो-पैक की व्यवस्था रहेगी। दर्शक म्यूजियम देखने के साथ इवनिंग शो का आनंद भी ले सकेंगे।

सुबह 9 बजे खुलेगा म्यूजियम, पूरा परिसर देखने में लगेंगे करीब 5 घंटे

म्यूजियम की शुरुआती टाइमिंग सुबह 9 बजे से रखी गई है। हालांकि शाम को प्रवेश जल्दी बंद करना होगा, क्योंकि टिकट लेने और पूरे परिसर को देखने में करीब 5 घंटे का समय लगेगा। ऐसे में आखिरी बैच की एंट्री का समय शाम 3 से 5 बजे के बीच रह सकता है।

म्यूजियम में गाइड की व्यवस्था भी रहेगी। दर्शकों के 40-40 लोगों के बैच बनाए जाएंगे। यदि किसी समय विजिटर्स की संख्या कम रहती है तो उन्हें बड़े बैच का इंतजार नहीं करना पड़ेगा, बल्कि छोटी टोली में ही म्यूजियम घुमाया जाएगा।

परिसर की सभी 23 गैलरियों में 1857 की क्रांति की घटनाओं को कालानुक्रमिक तरीके से प्रस्तुत किया गया है। इन्हें देखने के लिए दर्शकों को पर्याप्त समय देना होगा।

65 मीटर ऊंचा टावर और 2 हजार लोगों की क्षमता वाला ओपन एयर थिएटर

22 एकड़ के परिसर में प्रवेश करते ही 65 मीटर ऊंचा मेमोरियल टावर नजर आता है। हाई-स्पीड लिफ्ट की मदद से दर्शक इसकी 13वीं मंजिल तक पहुंच सकेंगे। यहां इमर्सिव प्रोजेक्शन शो होगा। इसमें चारों तरफ चलने वाले दृश्यों के बीच दर्शकों को ऐसा अनुभव मिलेगा, मानो वे खुद इतिहास का हिस्सा हों।

टावर के सामने 2 हजार दर्शकों की क्षमता वाला ओपन एयर थिएटर बनाया गया है। यहां खुले आसमान के नीचे लाइट, साउंड और प्रोजेक्शन के जरिए 1857 की क्रांति की कहानी दिखाई जाएगी। म्यूजियम के सबसे ऊपरी हिस्से में स्काई कैफे भी बनाया गया है।

म्यूजियम का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा डिजिटल तकनीक पर आधारित है। इसमें लेजर शो, 3D ग्राफिक्स और वर्चुअल रियलिटी के जरिए इतिहास को नए अंदाज में पेश किया जाएगा। खास तौर पर जेन-जी को ध्यान में रखते हुए इसमें आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया गया है।

पानी की स्क्रीन पर दिखेगी क्रांति, टावर पर नजर आएंगे शहीद

शाम को होने वाला वाटर शो म्यूजियम के प्रमुख आकर्षणों में शामिल रहेगा। इसमें पानी के फव्वारों के जरिए स्क्रीन तैयार की जाएगी। इस पर चलने वाली तस्वीरें और वीडियो 65 मीटर ऊंचे मेमोरियल टावर पर दिखाई देंगे।

ग्राफिक्स के माध्यम से ऐसा दृश्य तैयार होगा, मानो क्रांति के दौर से निकला घोड़ा छलांग लगाकर टावर तक पहुंच रहा हो। म्यूजियम की दीवारों पर प्रोजेक्शन मैपिंग और मेमोरियल टावर पर लाइट एंड साउंड शो भी होगा। इसमें इस्तेमाल होने वाले एक प्रोजेक्टर की कीमत करीब 5 करोड़ रुपये बताई गई है।

इस तकनीक के जरिए दर्शकों को ऐसा अनुभव कराने की तैयारी है, जिसमें पूरा इतिहास एक फिल्म की तरह आंखों के सामने चलता दिखाई देगा।

तीन मंजिलों में 22 गैलरी, 360 डिग्री प्रोजेक्शन से मिलेगा 1857 का अनुभव

मुख्य म्यूजियम तीन मंजिला है। इसकी 22 गैलरियों में 1857 की क्रांति से जुड़ी घटनाओं को क्रमवार दिखाया गया है। परिसर की कुल गैलरियों की संख्या 23 है।

'भारत में युद्ध' नाम की गैलरी में 360 डिग्री इमर्सिव प्रोजेक्शन की व्यवस्था की गई है। इसमें दर्शकों को चारों तरफ इतिहास से जुड़े दृश्य दिखाई देंगे। इसके अलावा डिजिटल किताब भी आकर्षण का केंद्र होगी। इसके पन्ने हाथ के इशारों से पलटे जा सकेंगे।

दुबई के फ्यूचर म्यूजियम की तर्ज पर एलिवेटर गैलरी भी बनाई गई है। इसमें करीब 40 फीट ऊंची छत होगी। प्रवेश के बाद दर्शकों को भूल-भुलैया जैसा अनुभव मिलेगा। वहीं, इंग्लैंड और अन्य देशों की तर्ज पर तैयार 360 डिग्री गैलरी में फिल्म दिखाई जाएगी, जो दर्शकों को आभासी दुनिया में ले जाएगी।

हरियाणा के कारीगरों ने तैयार किया आर्ट एंड क्राफ्ट, मूक वृक्ष बताएगा बलिदान की कहानी

म्यूजियम में आर्ट एंड क्राफ्ट का काम हरियाणा के स्थानीय कारीगरों ने किया है। इसमें टेराकोटा, जूट और पारंपरिक फुलकारी का इस्तेमाल किया गया है। इससे परिसर को स्थानीय कला और संस्कृति से भी जोड़ा गया है।

म्यूजियम के आखिर में श्रद्धांजलि गैलरी बनाई गई है। इसमें 'मूक वृक्ष' तैयार किया गया है। इसके जरिए अंग्रेजी शासन के दौरान क्रांतिकारियों को पेड़ों पर फांसी दिए जाने की घटनाओं को दर्शाया गया है।

इसकी खासियत यह है कि जब विजिटर इसे हाथ से छुएंगे तो रोशनी निकलेगी और पेड़ की शाखाएं जलने लगेंगी। इस तरह तकनीक के माध्यम से बलिदान की घटनाओं को दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया जाएगा।

मेरठ से करीब 9 घंटे पहले अंबाला में उठी थी क्रांति की चिंगारी, म्यूजियम में दिखेगा ऐतिहासिक दावा

म्यूजियम का सबसे अहम हिस्सा 1857 की क्रांति की शुरुआत को लेकर अंबाला से जुड़ा ऐतिहासिक दावा है। आमतौर पर 10 मई 1857 को मेरठ में हुए विद्रोह को क्रांति की शुरुआत माना जाता है। लेकिन अंबाला से जुड़े कुछ ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर दावा किया जाता है कि यहां विद्रोह की घटनाएं मेरठ से करीब 9 घंटे पहले शुरू हो गई थीं।

इसी इतिहास को सामने रखने के लिए म्यूजियम में 'अंबाला की ओर' और 'अंबाला की घटनाएं' नाम से अलग-अलग गैलरियां बनाई गई हैं। इनमें अंबाला छावनी के रणनीतिक महत्व और अंग्रेजी शासन के खिलाफ सैनिकों में बढ़ते असंतोष को दिखाया गया है।

इन गैलरियों के माध्यम से बताया जाएगा कि किस तरह अंबाला छावनी में विद्रोह की परिस्थितियां बनीं और अंग्रेजी शासन के खिलाफ सैनिकों में विरोध बढ़ा।

2012 में सामने आया था ऐतिहासिक टेलीग्राम, अंबाला के दावे को मिला आधार

अंबाला में मेरठ से पहले क्रांति की शुरुआत होने के दावे के समर्थन में 2012 में सामने आए एक ऐतिहासिक टेलीग्राम का उल्लेख किया गया है। इसके मुताबिक, 10 मई की सुबह अंबाला में 60वीं और 5वीं नेटिव इन्फेंट्री से जुड़ी विद्रोह की घटनाएं हुई थीं, जबकि मेरठ में उसी दिन शाम को विद्रोह हुआ।

इतिहासकार केसी यादव की पुस्तक 'रिवॉल्ट ऑफ 1857 इन हरियाणा' में भी हरियाणा में हुई क्रांतिकारी गतिविधियों का उल्लेख है। हालांकि, कई इतिहासकार आज भी 1857 की क्रांति की शुरुआत मेरठ से ही मानते हैं। म्यूजियम में इस विषय से जुड़े ऐतिहासिक दस्तावेजों और घटनाओं को भी दर्शकों के सामने रखा जाएगा।

रोटी और कमल के फूल से पहुंचाए जाते थे गुप्त संदेश

म्यूजियम की 'क्रांति की योजना' गैलरी में विद्रोह की तैयारियों और गुप्त संदेश पहुंचाने के तरीकों को दिखाया गया है। इसमें बताया गया है कि गांवों तक संदेश पहुंचाने के लिए रोटियों और सैनिक छावनियों में कमल के फूलों का इस्तेमाल संकेत के रूप में किया जाता था।

इसके अलावा पेड़ों की छाल के जरिए भी संदेश पहुंचाने का उल्लेख किया गया है। इस गैलरी में दिखाया जाएगा कि किस तरह अलग-अलग गांवों और सैनिक छावनियों को जोड़कर अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की तैयारी की गई थी।

चर्बी वाले कारतूस से लेकर कविता और संगीत तक की कहानी

'क्रांति के कारण' गैलरी में चर्बी वाले कारतूसों के विवाद को धातु की कलाकृतियों और होलोग्राफिक शो के माध्यम से दिखाया गया है। 1857 की क्रांति का तात्कालिक कारण बनी इनफील्ड राइफल भी यहां देखने को मिलेगी।

इस राइफल में इस्तेमाल होने वाले चर्बी वाले कारतूसों को भारतीय सैनिकों ने इस्तेमाल करने से मना कर दिया था। इसके अलावा क्रांति के दौर की तलवारें और भाले भी दर्शकों को देखने को मिलेंगे।

वहीं, 'स्वतंत्रता के औजार' गैलरी में बताया गया है कि आजादी की लड़ाई में केवल तलवार और बंदूक ही नहीं, बल्कि साहित्य, कविता, संगीत और जन-आंदोलनों ने भी लोगों को एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

यह स्मारक 1857 की आजादी की पहली लड़ाई में शहीद हुए वीर सपूतों को समर्पित है। इसकी डिजाइन और थीम स्वतंत्रता संग्राम की भावना को केंद्र में रखकर तैयार की गई है।