किशाऊ बांध परियोजना पर बिंदल ने उठाए सवाल, बोले- ₹135.69 करोड़ सालाना बचाने के लिए जल अधिकारों से समझौता क्यों?

किशाऊ परियोजना पर राजीव बिंदल ने वित्तीय बोझ, जल अधिकार, संभावित आय, सिंचाई और रोजगार को लेकर सरकार से जवाब मांगा और श्वेतपत्र जारी करने की मांग की।

किशाऊ बांध परियोजना पर बिंदल ने उठाए सवाल, बोले- ₹135.69 करोड़ सालाना बचाने के लिए जल अधिकारों से समझौता क्यों?

बिंदल ने किशाऊ परियोजना के वित्तीय प्रावधानों पर सरकार से जवाब मांगा
जल अधिकारों और संभावित आर्थिक लाभों को लेकर उठाए सवाल
परियोजना पर श्वेतपत्र जारी करने की मांग, केंद्र की भूमिका का भी किया जिक्र


शिमला। हिमाचल भाजपा अध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल ने किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना को लेकर प्रदेश सरकार से इसके वित्तीय प्रावधानों, जल अधिकारों और हिमाचल के दीर्घकालिक आर्थिक हितों पर स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है। बिंदल ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी परियोजना और छह राज्यों के बीच हुए समझौते का स्वागत करती है, लेकिन सरकार को यह बताना चाहिए कि ₹135.69 करोड़ सालाना के वित्तीय दायित्व से बचने के लिए हिमाचल प्रदेश के दीर्घकालिक जल अधिकारों और संभावित आर्थिक लाभों को लेकर क्या व्यवस्था की गई है। छह राज्यों—हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली—के मुख्यमंत्रियों ने 15 सितंबर 2026 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल की मौजूदगी में किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।

डॉ. बिंदल ने परियोजना का श्रेय केंद्र सरकार को देते हुए कहा कि किशाऊ बांध परियोजना का समझौता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के प्रयासों से संभव हुआ है। उन्होंने कहा कि भाजपा इस परियोजना और समझौते का स्वागत करती है, लेकिन मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू को इसके वित्तीय प्रावधानों और हिमाचल प्रदेश के दीर्घकालिक हितों की स्थिति जनता के सामने स्पष्ट करनी चाहिए। केंद्र सरकार के अनुसार किशाऊ परियोजना को राष्ट्रीय परियोजना के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है और जल घटक की करीब 90 प्रतिशत लागत केंद्र सरकार द्वारा वहन की जाएगी, जबकि शेष 10 प्रतिशत वित्तीय बोझ छह भागीदार राज्यों के बीच साझा किया जाएगा।

परियोजना की लागत और पुराने इतिहास का जिक्र

डॉ. बिंदल ने कहा कि किशाऊ बांध परियोजना की कुल अनुमानित लागत 15,624 करोड़ रुपये है। इसमें जल घटक की लागत 12,096 करोड़ रुपये और विद्युत घटक की लागत 3,528 करोड़ रुपये बताई गई है। उनके अनुसार जल घटक की 12,096 करोड़ रुपये की राशि केंद्र सरकार द्वारा वहन किए जाने की व्यवस्था परियोजना को आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण आधार बनी है।

उन्होंने कहा कि किशाऊ परियोजना की परिकल्पना ब्रिटिश काल में हुई थी। वर्ष 1944-45 में इसका प्रारंभिक सर्वेक्षण हुआ था। इसके बाद वर्ष 1962 में उत्तर प्रदेश सरकार ने विस्तृत सर्वेक्षण करवाया और वर्ष 1964 में प्राथमिक रिपोर्ट तैयार की गई। इसके बावजूद परियोजना कई दशकों तक आगे नहीं बढ़ सकी।

बिंदल ने कहा कि वर्ष 2015 में भी परियोजना को लेकर बैठक हुई थी, लेकिन जल घटक की लागत के बंटवारे को लेकर सहमति नहीं बन पाई थी। उनके अनुसार छह लाभार्थी राज्य इस बड़े वित्तीय बोझ को उठाने के लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने कहा कि वर्ष 2025 में केंद्र सरकार की ओर से जल घटक का खर्च वहन करने का सैद्धांतिक निर्णय परियोजना के लिए निर्णायक साबित हुआ और इसके बाद 15 सितंबर 2026 को छह राज्यों के बीच समझौता हो सका। उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के अनुसार भी परियोजना को लेकर लंबे समय से चले आ रहे लागत और जल आवंटन से जुड़े मतभेदों के बाद छह राज्यों के बीच सहमति बनी और समझौते पर हस्ताक्षर हुए।

बिंदल ने कहा कि विस्थापित परिवारों के पुनर्वास से जुड़ा खर्च भी केंद्र सरकार द्वारा वहन किए जाने की व्यवस्था है, जिससे हिमाचल सरकार पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ नहीं पड़ेगा। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के प्रयासों के लिए प्रदेश की जनता की ओर से आभार जताया। उन्होंने कहा कि रेणुका बांध सहित कई अंतरराज्यीय परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में भी केंद्र सरकार की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

विद्युत घटक में हिमाचल के हिस्से पर सवाल

डॉ. बिंदल ने कहा कि वर्ष 2015 में हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के बीच विद्युत घटक की लागत 50-50 प्रतिशत के अनुपात में वहन करने पर सहमति बनी थी। उन्होंने विद्युत घटक की कुल अनुमानित लागत 3,528 करोड़ रुपये बताते हुए कहा कि इस हिसाब से हिमाचल प्रदेश को 1,764 करोड़ रुपये का निवेश करना पड़ता।

बिंदल के अनुसार परियोजना की निर्धारित पूर्णता अवधि वर्ष 2040 तक बताई जा रही है। उन्होंने कहा कि यदि निवेश को 13 वर्षों में बांटा जाए तो हिमाचल प्रदेश पर औसतन 135.69 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष का वित्तीय दायित्व बनता है। इसी गणना को आधार बनाते हुए उन्होंने सरकार से सवाल किया कि क्या हिमाचल प्रदेश अपने दीर्घकालिक जल अधिकारों और संभावित आर्थिक लाभों को सुरक्षित रखने के लिए यह निवेश नहीं कर सकता था।

हालांकि, केंद्र सरकार की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक नए समझौते में हिमाचल प्रदेश के जल हिस्से को दिल्ली और राजस्थान को देने के बदले हिमाचल के विद्युत घटक की लागत में योगदान करने पर सहमति बनी है। आधिकारिक बयान में इसे छह राज्यों के बीच लंबे समय से लंबित सहमति का हिस्सा बताया गया है।

जल अधिकारों और पानी के भविष्य को लेकर उठाए सवाल

डॉ. बिंदल ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने तत्काल वित्तीय बोझ कम करने को प्राथमिकता दी, लेकिन भविष्य में जल संसाधनों से मिलने वाले लाभों का पर्याप्त मूल्यांकन जनता के सामने नहीं रखा। उन्होंने कहा कि सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि जल अधिकारों में बदलाव स्थायी है या किसी तय अवधि के लिए है और भविष्य में हिमाचल प्रदेश की जरूरतें बढ़ने पर पानी प्राप्त करने की क्या व्यवस्था होगी।

बिंदल ने पूर्व निर्धारित जल बंटवारे का जिक्र करते हुए कहा कि हरियाणा की हिस्सेदारी 40.6 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश की 30.1 प्रतिशत, दिल्ली की 10.4 प्रतिशत, राजस्थान की 6.3 प्रतिशत और हिमाचल प्रदेश व उत्तराखंड की हिस्सेदारी 1.7-1.7 प्रतिशत थी। उन्होंने दावा किया कि हिमाचल प्रदेश के हिस्से में करीब 50 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी आता था और नए समझौते में इसके अधिकारों में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं।

उन्होंने कहा कि उनके अनुसार हिमाचल के हिस्से की व्यवस्था में बदलाव के बदले दिल्ली और राजस्थान की ओर से क्रमशः करीब 1,323 करोड़ रुपये और 441 करोड़ रुपये का वित्तीय योगदान प्रस्तावित है। आधिकारिक केंद्र सरकार के बयान में भी हिमाचल के जल हिस्से को दिल्ली और राजस्थान को आवंटित करने के बदले हिमाचल के विद्युत घटक की लागत साझा करने की सहमति का उल्लेख है।

₹1,200 करोड़ सालाना आय के दावे पर भी सवाल

डॉ. बिंदल ने कहा कि मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू स्वयं किशाऊ बांध परियोजना से हिमाचल प्रदेश को करीब 1,200 करोड़ रुपये सालाना आय होने का दावा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि मुख्यमंत्री के इस अनुमान को आधार बनाया जाए और हिमाचल प्रदेश विद्युत घटक में 1,764 करोड़ रुपये का निवेश करता तो साधारण गणना के अनुसार करीब डेढ़ वर्ष की आय इस निवेश के बराबर होती।

बिंदल ने कहा कि ब्याज और अन्य वित्तीय दायित्वों को जोड़कर निवेश की वसूली की अवधि का विस्तृत आकलन किया जाना चाहिए। उन्होंने सवाल किया कि यदि परियोजना से इतनी बड़ी वार्षिक आय की संभावना थी तो सरकार ने स्वयं निवेश करने का विकल्प क्यों छोड़ा।

उन्होंने मुख्यमंत्री से 1,200 करोड़ रुपये की अनुमानित सालाना आय का आधार सार्वजनिक करने की मांग की। बिंदल ने कहा कि इसमें बिजली की बिक्री दर, हिमाचल को मिलने वाली बिजली की मात्रा, उत्पादन लागत और वास्तविक शुद्ध राजस्व का स्पष्ट विवरण सामने रखा जाना चाहिए।

सिरमौर की सिंचाई जरूरतों का मुद्दा

डॉ. बिंदल ने कहा कि किशाऊ बांध परियोजना केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है। इसका संबंध सिरमौर जिले के किसानों, बागवानों और भविष्य की कृषि अर्थव्यवस्था से भी है।

उन्होंने कहा कि टोंस नदी पर बांध बनने से जल स्तर में बदलाव होगा और इस जल संसाधन के जरिए सिरमौर के क्षेत्रों में सिंचाई सुविधाओं के विस्तार की संभावनाओं का अध्ययन किया जाना चाहिए था। उन्होंने गिरिबाटा परियोजना का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां बिजली उत्पादन के साथ विकसित सिंचाई सुविधाओं से पांवटा दून की कृषि अर्थव्यवस्था को लाभ मिला है।

बिंदल के अनुसार सिंचाई सुविधाओं से धान सहित विभिन्न फसलों का उत्पादन बढ़ा और किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार आया। उन्होंने आरोप लगाया कि किशाऊ परियोजना में हिमाचल के जल अधिकारों से जुड़े निर्णय लेते समय सिरमौर के किसानों की भविष्य की सिंचाई जरूरतों को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं दी गई।

उन्होंने सरकार से परियोजना से संभावित सिंचाई क्षेत्र, प्रस्तावित नहरों, कृषि उत्पादन में संभावित वृद्धि और किसानों की आय पर पड़ने वाले प्रभाव की विस्तृत रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की।

रोजगार और स्थानीय युवाओं के अवसरों पर भी सवाल

डॉ. बिंदल ने कहा कि किशाऊ जैसी बड़ी परियोजना के निर्माण से स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार, तकनीकी प्रशिक्षण और स्वरोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि निर्माण कार्य, परिवहन, मशीनरी, निर्माण सामग्री, होटल व्यवसाय और अन्य सेवाओं में स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

उन्होंने सवाल किया कि क्या नए समझौते में हिमाचल के युवाओं के लिए रोजगार की कोई बाध्यकारी व्यवस्था की गई है। सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि परियोजना के निर्माण और संचालन के दौरान कितने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित होने का अनुमान है और इनमें स्थानीय लोगों को कितनी प्राथमिकता मिलेगी।

केंद्र सरकार के अनुसार किशाऊ परियोजना से करीब 97,000 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई और स्वच्छ जलविद्युत उत्पादन सहित कई लाभ जुड़े हैं। परियोजना टोंस नदी पर हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा के साथ प्रस्तावित है।

श्वेतपत्र जारी करने की मांग

डॉ. बिंदल ने कहा कि मुख्यमंत्री को परियोजना की उपलब्धियां गिनाने के साथ समझौते की सभी वित्तीय और कानूनी शर्तें भी सार्वजनिक करनी चाहिए। उन्होंने सरकार से किशाऊ बांध परियोजना पर श्वेतपत्र जारी करने की मांग की।

उन्होंने कहा कि श्वेतपत्र में केंद्र और राज्यों के वित्तीय योगदान, हिमाचल के जल अधिकार, बिजली की हिस्सेदारी, अनुमानित आय, सिंचाई सुविधाओं और रोजगार के प्रावधानों का विस्तृत विवरण होना चाहिए।

बिंदल ने कहा कि भाजपा किशाऊ बांध परियोजना और छह राज्यों के बीच हुए समझौते का स्वागत करती है। छह राज्यों के बीच समझौता 15 सितंबर 2026 को हुआ और केंद्र सरकार ने बताया है कि इसके बाद परियोजना को केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के लिए रखा जाएगा।

उन्होंने कहा कि भाजपा का सवाल परियोजना के निर्माण से नहीं, बल्कि हिमाचल प्रदेश के दीर्घकालिक आर्थिक हितों और जल अधिकारों से जुड़ा है। उन्होंने सरकार से इन सभी बिंदुओं पर तथ्यात्मक जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की है।