पिता को चार साल से कैंसर, मां बेचती हैं दूध; जिंदगी की जंग लड़ते हुए प्रवीण हुड्डा ने एशियन गेम्स में जीता गोल्ड
रोहतक के रुड़की गांव की प्रवीण हुड्डा ने एशियन गेम्स में 65 किलोग्राम भार वर्ग का फाइनल 5-0 से जीतकर गोल्ड मेडल हासिल किया।
➤ चार साल से कैंसर और दिल की बीमारी से जूझ रहे हैं प्रवीण के पिता लखपत हुड्डा
➤ मां नीलम देवी भैंस का दूध बेचकर चलाती हैं घर, छोटा भाई कर रहा पढ़ाई
➤ परिवार की जिम्मेदारी संभालते हुए ITBP में असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर प्रवीण ने जीता गोल्ड
रोहतक। रुड़की गांव की बेटी और भारतीय महिला मुक्केबाज प्रवीण हुड्डा की कहानी सिर्फ रिंग में मिली जीत की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस संघर्ष की भी कहानी है जो वह अपनी जिंदगी में लगातार लड़ रही हैं। एशियन गेम्स के 65 किलोग्राम भार वर्ग के फाइनल में 5-0 से जीत दर्ज कर गोल्ड मेडल हासिल करने वाली प्रवीण के परिवार की परिस्थितियां आसान नहीं रही हैं। उनके पिता लखपत हुड्डा पिछले चार साल से कैंसर से जूझ रहे हैं और उन्हें दिल की बीमारी भी है। परिवार को संभालने की जिम्मेदारी के बीच उनकी मां नीलम देवी भैंस का दूध बेचकर घर चलाती हैं, जबकि प्रवीण का 20 साल का छोटा भाई अभी पढ़ाई कर रहा है। ऐसे हालात के बीच ITBP में असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर प्रवीण ने न सिर्फ बॉक्सिंग में अपनी पहचान बनाई, बल्कि परिवार की मुख्य कमाने वाली सदस्य की जिम्मेदारी भी संभाली।
प्रवीण के लिए रिंग की लड़ाई केवल प्रतिद्वंद्वी मुक्केबाज के खिलाफ मुकाबला नहीं है। उनके जीवन में परिवार की जिम्मेदारियां भी लगातार उनके सामने चुनौती बनकर खड़ी रही हैं। पिता की बीमारी, घर की जरूरतें और छोटे भाई की पढ़ाई के बीच प्रवीण ने अपने खेल को आगे बढ़ाया। उन्होंने मेहनत और हौसले के दम पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी जगह बनाई और अब एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीतकर अपने परिवार के संघर्ष को एक बड़ी उपलब्धि में बदल दिया है।
पिता लखपत हुड्डा की बीमारी परिवार के लिए लंबे समय से चिंता का कारण बनी हुई है। पिछले चार साल से वह कैंसर से जूझ रहे हैं और उन्हें दिल की बीमारी भी है। पिता की सेहत की चिंता के साथ परिवार की दूसरी जिम्मेदारियां भी बनी हुई हैं। ऐसे समय में प्रवीण के लिए खेल के साथ परिवार को संभालना भी उनकी जिंदगी का अहम हिस्सा रहा है।
घर चलाने में मां नीलम देवी की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण रही है। वह भैंस का दूध बेचकर परिवार का खर्च चलाने में योगदान देती हैं। परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियों के बीच मां का यह संघर्ष भी प्रवीण की कहानी का अहम हिस्सा है। एक तरफ बेटी देश के लिए रिंग में मुकाबला करती रही, तो दूसरी तरफ मां घर की जरूरतों को पूरा करने के लिए मेहनत करती रहीं।
प्रवीण का 20 साल का छोटा भाई पढ़ाई कर रहा है। ऐसे में परिवार की जिम्मेदारियों का बड़ा हिस्सा प्रवीण के कंधों पर भी आ गया है। ITBP में असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर के रूप में कार्यरत प्रवीण अब परिवार की मुख्य कमाने वाली सदस्य बन गई हैं। नौकरी, खेल और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच तालमेल बनाकर आगे बढ़ना उनकी जिंदगी के संघर्ष का हिस्सा रहा है।
एशियन गेम्स के फाइनल में जब प्रवीण रिंग में उतरीं तो उनके सामने सिर्फ एक मुकाबला नहीं था। उनके पीछे परिवार की उम्मीदें, पिता की बीमारी से जुड़ी चिंता, मां का संघर्ष और छोटे भाई के भविष्य की जिम्मेदारी भी थी। इसके बावजूद उन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ मुकाबला किया और 5-0 के स्पष्ट अंतर से जीत दर्ज कर गोल्ड मेडल हासिल किया।
प्रवीण की इस सफलता के बाद उनके परिवार में खुशी का माहौल है। जिस परिवार ने लंबे समय तक मुश्किल परिस्थितियों का सामना किया, उसके लिए बेटी का एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक जीतना गर्व का पल है। प्रवीण की उपलब्धि ने यह भी दिखाया कि कठिन परिस्थितियों के बीच लक्ष्य के प्रति लगातार मेहनत जारी रखी जाए तो बड़ी उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं।
अपने बचपन के कोच सुधीर सर को याद करते हुए भी प्रवीण उनकी तारीफ करती हैं। बॉक्सिंग के शुरुआती दौर से ही कोच सुधीर ने प्रवीण के खेल को निखारने में भूमिका निभाई। प्रवीण की कहानी में परिवार के संघर्ष के साथ उनके कोच का योगदान भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।
प्रवीण की जीत के बाद अब रुड़की गांव में उनके लौटने का इंतजार है। परिवार और ग्रामीणों के लिए यह सिर्फ एक गोल्ड मेडल की खुशी नहीं है, बल्कि उस बेटी की उपलब्धि है जिसने पिता की बीमारी, मां के संघर्ष और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच अपने सपने को जिंदा रखा और देश के लिए स्वर्ण पदक हासिल किया।
Akhil Mahajan