एक साल पिता के साथ दूध बेचा, फिर मांगी कुश्ती की इजाजत; अखाड़े में लौटकर नितेश ने एशियाड में जीता सिल्वर

चोट के बाद नितेश ने एक साल पिता के साथ दूध बेचा, फिर कुश्ती में लौटे और एशियाई खेलों में सिल्वर जीतकर 64 साल बाद भारत को ग्रीको-रोमन पदक दिलाया।

एक साल पिता के साथ दूध बेचा, फिर मांगी कुश्ती की इजाजत; अखाड़े में लौटकर नितेश ने एशियाड में जीता सिल्वर

➤ चोट के बाद करीब एक साल तक पिता के साथ दूध बेचता रहा नितेश
➤ सुबह दूध लेकर पानीपत जाता, घर-घर पहुंचाता और मन में कुश्ती का सपना रखता
➤ एक दिन पिता से दोबारा अखाड़े में जाने की इजाजत मांगी और फिर बदल गई जिंदगी


जिस उम्र में नितेश सिवाच अखाड़े में दांव-पेच सीखकर कुश्ती के सपने देख रहा था, उसी सफर में एक ऐसा दौर भी आया जब घुटने की गंभीर चोट ने उसे करीब एक साल तक बिस्तर पर पहुंचा दिया। कुश्ती से दूर होने के कारण वह मानसिक रूप से भी परेशान रहने लगा। जिस अखाड़े में सुबह-शाम पसीना बहाने की आदत थी, वहां जाना बंद हो गया था। ऐसे समय में पिता आनंद ने बेटे को घर पर बैठे रहने के बजाय अपने साथ काम में हाथ बंटाने के लिए कहा। इसके बाद नितेश ने करीब एक साल तक पिता के साथ दूध बेचने का काम किया।

नितेश ने वर्ष 2017 में खरखौदा की निजी कुश्ती अकादमी में दोबारा अभ्यास शुरू किया।

 सुबह उठकर दूध लेना, उसे लेकर पानीपत जाना और फिर दुकान व घर-घर जाकर दूध पहुंचाना उसकी दिनचर्या बन गई। लेकिन इस रोजमर्रा की मेहनत के बीच उसके मन में कुश्ती का सपना खत्म नहीं हुआ। आखिरकार एक दिन नितेश ने पिता से दोबारा कुश्ती खेलने की इच्छा जताई और पिता ने उसे फिर से अखाड़े में जाने की अनुमति दे दी।

अखाड़े से अचानक दूध के कारोबार तक पहुंच गया सफर

नितेश के पिता आनंद गांव से दूध खरीदकर पानीपत में दुकान और घर-घर दूध बेचते थे। नितेश जब घुटने की चोट से जूझ रहा था और अभ्यास से दूर था, तब पिता ने उसे अपने काम में हाथ बंटाने के लिए कहा। चोट के कारण पहले ही कुश्ती रुक चुकी थी और अब नितेश के सामने रोजमर्रा की एक नई जिम्मेदारी थी।

करीब एक साल तक उसने पिता के साथ दूध बेचने का काम किया। सुबह उठकर दूध लेकर शहर जाना और ग्राहकों के घर तक उसे पहुंचाना उसकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया। अखाड़े में पसीना बहाने वाला नितेश अब पिता के साथ मेहनत करते हुए परिवार के काम में हाथ बंटा रहा था।

रोज दूध पहुंचाता था, लेकिन मन अखाड़े में ही अटका था

नितेश के लिए यह सिर्फ दूध बेचने का दौर नहीं था। उसके सामने कुश्ती का सफर अचानक रुक गया था। घुटने की चोट के बाद उसे करीब एक साल तक बिस्तर पर रहना पड़ा था और इसी दौरान वह मानसिक रूप से भी परेशान रहने लगा था।

पिता के साथ काम करते हुए नितेश ने मेहनत करना जारी रखा, लेकिन उसके भीतर कुश्ती में लौटने की इच्छा बनी रही। सुबह से दूध के काम में व्यस्त रहने के बावजूद उसके मन में अखाड़े और कुश्ती का सपना कहीं पीछे नहीं छूटा।

फिर एक दिन पिता से कह दिया- दोबारा कुश्ती खेलनी है

करीब एक साल तक पिता के साथ दूध बेचने के बाद नितेश ने अपने मन की बात पिता के सामने रखी। उसने कहा कि वह दोबारा कुश्ती खेलना चाहता है। यह वही खेल था, जिससे वह चोट के कारण दूर हो गया था और जिसके लिए वह बचपन से अखाड़े में मेहनत करता आया था।

पिता आनंद ने बेटे की इच्छा को समझा और उसे फिर से अखाड़े में जाने की अनुमति दे दी। इसके बाद नितेश ने दोबारा कुश्ती का अभ्यास शुरू किया। चोट के बाद अखाड़े में वापसी उसके लिए सिर्फ खेल में लौटना नहीं था, बल्कि उस सपने को फिर से पकड़ना था, जिसे वह छोड़ना नहीं चाहता था।

2017 में दोबारा शुरू किया अभ्यास

नितेश ने वर्ष 2017 में खरखौदा की निजी कुश्ती अकादमी में दोबारा अभ्यास शुरू किया। इसके बाद उसने जिला, हरियाणा और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया और कई पदक जीते।

एक बार एशियन गेम्स के ट्रायल में भी वह बाहर हो गया, लेकिन उसने अभ्यास जारी रखा। हार और मुश्किलों के बावजूद उसने प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना नहीं छोड़ा और लगातार अपनी तैयारी जारी रखी।

दूध बेचने से एशियाड के फाइनल तक

नितेश का यह सफर यहीं नहीं रुका। वर्ष 2022 में उसे रेलवे पुलिस में टीसी के पद पर नौकरी मिली। नौकरी के साथ उसने कुश्ती का अभ्यास भी जारी रखा और एशियाई खेलों की तैयारी पर फोकस किया।

जिस खिलाड़ी ने चोट के बाद करीब एक साल तक पिता के साथ दूध बेचकर परिवार के काम में हाथ बंटाया था, वही नितेश अब एशियाई खेलों के फाइनल में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहा था। फाइनल में जापान के यूरी नकाजातो से हार के बावजूद उसने सिल्वर मेडल जीत लिया।

64 साल बाद ग्रीको-रोमन कुश्ती में भारत को पदक

नितेश का सिल्वर मेडल इसलिए भी खास रहा क्योंकि इससे ग्रीको-रोमन कुश्ती में भारत का 64 साल का पदक सूखा खत्म हुआ। नितेश से पहले वर्ष 1962 एशियाड में गणपत अंदलकर ने 97+ किग्रा भारवर्ग में भारत के लिए पदक जीता था। इसके बाद भारतीय ग्रीको-रोमन पहलवान इस प्रतियोगिता में पदक नहीं जीत सके थे।

नितेश से पहले भारत के सुमित 60 किग्रा और अमन बरोनिया 77 किग्रा भारवर्ग में क्वार्टर फाइनल में हारकर बाहर हो गए थे। ऐसे में नितेश का फाइनल तक पहुंचना और सिल्वर मेडल जीतना भारतीय ग्रीको-रोमन कुश्ती के लिए एक बड़ी उपलब्धि बन गया।

पिता का सपना, बेटे का जुनून

नितेश के पिता आनंद खुद भी पहलवानी में रुचि रखते थे, लेकिन कुश्ती नहीं खेल सके। इसलिए उनका सपना था कि उनका बेटा पहलवान बने। बचपन में वह नितेश को गांव के अखाड़े में सुबह-शाम अभ्यास कराने ले जाते थे। धीरे-धीरे नितेश का भी कुश्ती के प्रति रुझान बढ़ता गया।

जब घुटने की चोट ने उसका रास्ता रोक दिया तो नितेश ने पिता के साथ दूध बेचने का काम किया। लेकिन मौका मिलते ही उसने फिर कुश्ती में लौटने की इच्छा जताई। पिता ने उसका साथ दिया और नितेश दोबारा अखाड़े में लौट आया।

आज वही संघर्ष एशियाई खेलों के सिल्वर मेडल तक पहुंच चुका है। दूध के डिब्बों के साथ शुरू हुई वह सुबह, जिसमें नितेश पिता के साथ पानीपत की गलियों में दूध पहुंचाता था, आगे चलकर उसी खिलाड़ी को एशियाई खेलों के पोडियम तक ले गई।