VIDEO: नोएडा में अचानक उतरा 190 टन तक वजन वाला रूसी 'गजराज , आखिर Il-76 की इस लैंडिंग के पीछे क्या था बड़ा मकसद?

जेवर के नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर रूसी Il-76 विमान की ऐतिहासिक लैंडिंग हुई। रनवे, नेविगेशन और भारी कार्गो संचालन की तैयारियों का परीक्षण हुआ।

VIDEO: नोएडा में  अचानक उतरा 190 टन तक वजन वाला रूसी 'गजराज  , आखिर Il-76 की इस लैंडिंग के पीछे क्या था बड़ा मकसद?

जेवर एयरपोर्ट के रनवे पर रूसी दिग्गज Il-76 की ऐतिहासिक लैंडिंग
3900 मीटर लंबे रनवे पर भारी सैन्य परिवहन विमान की सफल लैंडिंग
कार्गो, सामरिक और आपातकालीन संचालन की तैयारियों को मिला अहम परीक्षण


पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जेवर में आकार ले रहे देश के सबसे बड़े ग्रीनफील्ड एविएशन हब नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट (NIA) के इतिहास में एक अहम अध्याय जुड़ गया है। एयरपोर्ट के रनवे पर रूसी मूल के चार टर्बोफैन इंजनों वाले विशालकाय सामरिक सैन्य परिवहन विमान Ilyushin Il-76 (इल्युशिन इल-76) ने सफलतापूर्वक लैंडिंग की।

भारी सैन्य उपकरणों, राहत सामग्री और विशिष्ट कार्गो के परिवहन के लिए दुनिया भर में पहचान रखने वाला यह विमान 'गजराज' उपनाम से भी जाना जाता है। जेवर की धरती पर Il-76 का उतरना एयरपोर्ट की संचालन तैयारियों के लिहाज से बेहद अहम पड़ाव माना जा रहा है। इस लैंडिंग के जरिए एयरफील्ड की क्षमता और उससे जुड़े कई तकनीकी पहलुओं का व्यावहारिक परीक्षण हुआ।

व्यावसायिक उड़ानों से पहले रनवे की क्षमता का अहम परीक्षण

किसी भी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर व्यावसायिक संचालन शुरू होने से पहले रनवे, नेविगेशन सिस्टम, एयर ट्रैफिक कंट्रोल और सुरक्षा से जुड़े ढांचे को कड़े तकनीकी मानकों पर परखा जाता है। ऐसे में Ilyushin Il-76 जैसे सुपर-हेवी एयरक्राफ्ट की लैंडिंग कई महत्वपूर्ण क्षमताओं की जांच के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

Il-76 का अधिकतम टेकऑफ वजन लगभग 190 टन तक होता है। ऐसे भारी विमान के रनवे पर उतरने के दौरान एयरफील्ड के पेवमेंट पर काफी दबाव पड़ता है। इसलिए इस लैंडिंग के माध्यम से पेवमेंट क्लासिफिकेशन नंबर (PCN) से जुड़े व्यावहारिक पहलुओं की जांच भी अहम रही। रनवे का कंक्रीट स्ट्रक्चर इतने भारी विमान और लैंडिंग के दौरान पड़ने वाले जबरदस्त दबाव को कितनी मजबूती से झेलता है, इसका वास्तविक आकलन किया गया।

3900 मीटर लंबे रनवे पर हुई लैंडिंग, बड़े विमानों के लिए तैयार एयरफील्ड

जेवर एयरपोर्ट के पहले चरण में तैयार किया गया रनवे 3,900 मीटर लंबा और 45 मीटर चौड़ा है। इसे कोड-4E और कोड-4F श्रेणी के विमानों के संचालन को ध्यान में रखते हुए डिजाइन किया गया है। इन श्रेणियों में Boeing 777, Airbus A380 और बड़े कार्गो विमानों जैसे विशाल एयरक्राफ्ट शामिल हैं।

ऐसे में Il-76 की सफल लैंडिंग ने रनवे की लंबाई, चौड़ाई और भारी विमानों के संचालन से जुड़ी क्षमताओं के व्यावहारिक परीक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह परीक्षण इस बात के लिहाज से भी अहम है कि एयरफील्ड भविष्य में बड़े आकार के यात्री और कार्गो विमानों की आवाजाही को किस तरह संभाल सकता है।

ILS, ATC और नेविगेशन सिस्टम की भी परखी गई सटीकता

भारी विमान की लैंडिंग केवल रनवे की मजबूती का परीक्षण नहीं होती, बल्कि इसके साथ एयरफील्ड के कई तकनीकी सिस्टम भी काम करते हैं। जेवर एयरफील्ड पर स्थापित उन्नत इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम (ILS), विजुअल अप्रोच स्लोप इंडिकेटर और एटीसी के साथ रडार समन्वय की सटीकता को भी तकनीकी मानकों पर परखा गया।

एवियोनिक्स और नेविगेशन एड्स से जुड़ी यह पूरी प्रक्रिया एयरपोर्ट के सुरक्षित और सुचारु संचालन की तैयारियों का महत्वपूर्ण हिस्सा है। CAT-I/CAT-III से जुड़े एयरफील्ड सिस्टम की क्षमता भी ऐसे परीक्षणों के दौरान महत्वपूर्ण हो जाती है।

दुनिया के भरोसेमंद 'हैवी-लिफ्टर' विमानों में शामिल है Il-76

सोवियत काल में विकसित Ilyushin Il-76 को बहुउद्देश्यीय रणनीतिक एयरलिफ्टर के तौर पर विकसित किया गया था। आज भी यह दुनिया के भरोसेमंद भारी परिवहन विमानों में गिना जाता है। इसका इस्तेमाल सैन्य उपकरणों और भारी कार्गो के परिवहन के साथ-साथ राहत और विशेष अभियानों में भी किया जाता है।

तकनीकी विशेषता विवरण
भूमिका सामरिक/भारी सैन्य एवं कार्गो परिवहन
इंजन 4 × Soloviev D-30KP / Aviadvigatel PS-90 टर्बोफैन इंजन
पेलोड क्षमता 40 से 50 टन तक कार्गो/सैन्य साजो-सामान
अधिकतम टेकऑफ वजन लगभग 190,000 किलोग्राम (190 टन)
विशेषता कच्ची, उबड़-खाबड़ और छोटी हवाई पट्टियों पर उतरने में सक्षम मल्टी-व्हील लैंडिंग गियर

Il-76 की डिजाइन की एक खासियत इसका मल्टी-व्हील लैंडिंग गियर है, जो इसे कच्ची, उबड़-खाबड़ और छोटी हवाई पट्टियों पर भी उतरने की क्षमता देता है। यही वजह है कि यह विमान सैन्य और विशेष कार्गो अभियानों में लंबे समय से महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है।

भारतीय वायुसेना भी लंबे समय से कर रही Il-76 के संशोधित संस्करणों का इस्तेमाल

भारत के लिए भी Il-76 कोई नया विमान नहीं है। भारतीय वायुसेना 1980 के दशक से इस विमान के संशोधित संस्करणों का इस्तेमाल करती आ रही है। इनमें IL-76MD, एयर-टू-एयर रिफ्यूलर IL-78 और फाल्कन AWACS शामिल हैं।

इस वजह से जेवर एयरपोर्ट के रनवे पर इस विमान का उतरना नागरिक विमानन ढांचे और सैन्य परिवहन क्षमता के बीच संभावित उपयोगिता के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

सिर्फ यात्री एयरपोर्ट नहीं, बड़े कार्गो हब के रूप में तैयार हो रहा जेवर

नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट को केवल यात्री उड़ानों के लिए विकसित नहीं किया जा रहा है। इसे उत्तर भारत के बड़े मल्टी-मॉडल कार्गो हब के रूप में भी विकसित किया जा रहा है। ऐसे में Il-76 जैसे भारी कार्गो विमान का संचालन एयरपोर्ट के लॉजिस्टिक ढांचे की तैयारियों को परखने के लिए विशेष महत्व रखता है।

Il-76 के आगमन से कार्गो एप्रन, टैक्सीवे, ग्राउंड हैंडलिंग इक्विपमेंट (GHE) और विशेष भारी कार्गो को संभालने वाले क्रेन तथा फोर्कलिफ्ट सिस्टम की ऑन-ग्राउंड तत्परता का परीक्षण संभव हुआ। बड़े और भारी मालवाहक विमानों के संचालन में इन सुविधाओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है।

सामरिक संकट और आपदा के समय भी उपयोगी हो सकता है जेवर एयरफील्ड

जेवर एयरपोर्ट की उपयोगिता केवल सामान्य नागरिक उड़ानों और कार्गो संचालन तक सीमित नहीं है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में हिंडन एयरबेस और आईजीआई एयरपोर्ट के अलावा जेवर बड़े सैन्य परिवहन विमानों के संचालन के लिए एक संभावित महत्वपूर्ण विकल्प के रूप में उभर रहा है।

सामरिक संकट या मानवीय आपदा (HADR मिशन्स) के दौरान भारी परिवहन विमानों की जरूरत पड़ने पर ऐसे एयरफील्ड की उपलब्धता महत्वपूर्ण हो सकती है। Il-76 की लैंडिंग ने इस दृष्टि से भी जेवर के एयरफील्ड की क्षमता को परखने का अवसर दिया है।

कुल मिलाकर, जेवर एयरपोर्ट के रनवे पर Il-76 की सफल लैंडिंग एयरफील्ड की संचालन तैयारियों के लिहाज से एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। इससे यह सामने आया है कि एयरफील्ड नागरिक उड़ानों के साथ-साथ बड़े सैन्य और मालवाहक विमानों की आवाजाही से जुड़े तकनीकी और लॉजिस्टिक परीक्षणों के लिए भी तैयार है।