‘हनुमान अंश’ की शूटिंग में अचानक आया रहस्यमयी बंदर, मूर्ति स्थापना देखता रहा

‘हनुमान अंश’ की शूटिंग के दौरान मूर्ति स्थापना का सीन देखने रहस्यमयी बंदर पहुंचा। भगवान दास ने इसे हनुमान जी की निगरानी जैसा अनुभव बताया।

‘हनुमान अंश’ की शूटिंग में अचानक आया रहस्यमयी बंदर, मूर्ति स्थापना देखता रहा

‘हनुमान अंश’ की शूटिंग के दौरान अचानक पहुंचा रहस्यमयी बंदर, मूर्ति स्थापना का सीन देखता रहा
भगवान दास बोले- लगा जैसे हनुमान जी खुद पूरी शूटिंग की निगरानी कर रहे हों
जबलपुर से मुंबई तक संघर्ष, थिएटर के छह साल बाद ‘हनुमान अंश’ ने बदली जिंदगी


फिल्म ‘हनुमान अंश’ में गोपाल का किरदार निभाकर अभिनेता भगवान दास पटेल इन दिनों दर्शकों का ध्यान खींच रहे हैं। मध्य प्रदेश के जबलपुर से मुंबई तक का उनका सफर आसान नहीं रहा। थिएटर में करीब छह साल बिताने के बाद उन्होंने टीवी और फिल्मों में छोटे-बड़े किरदार निभाए। ‘मुझसे फ्रेंडशिप करोगे’, ‘प्रेम रतन धन पायो’, ‘थार’, ‘रंगबाज’ और ‘फोटोग्राफ’ जैसी फिल्मों और सीरीज का हिस्सा रहे भगवान दास ने फिल्म की शूटिंग से जुड़े कई दिलचस्प किस्से साझा किए।

फिल्म की शूटिंग के दौरान एक ऐसा वाकया भी हुआ, जिसे भगवान दास आज तक याद करते हैं। जब टीम बजरंगबली की मूर्ति स्थापित करने वाला सीन शूट कर रही थी, तभी एक काले मुंह वाला बंदर बरगद के पेड़ पर आकर बैठ गया। वह काफी देर तक मूर्ति स्थापना की प्रक्रिया को देखता रहा। टीम ने उसे केले दिए तो उसने केले भी खाए और शूटिंग भी देखता रहा। इसके बाद जब झोपड़ी बनाई जा रही थी, तब भी वह वहीं मौजूद रहा। इस घटना ने पूरी टीम को हैरान कर दिया।

भगवान दास के मुताबिक, उन्हें ऐसा लगा जैसे हनुमान जी खुद शूटिंग की निगरानी कर रहे हों। गांव वालों ने भी बताया कि उन्होंने करीब 13-14 साल बाद वहां ऐसा बंदर देखा था।

गोपाल का किरदार कैसे मिला, एक ही ऑडिशन में हो गया चयन

भगवान दास ने बताया कि उन्हें एक जानने वाले ने फिल्म के बारे में जानकारी दी थी। उन्हें बताया गया कि फिल्म नीम करौली बाबा पर बन रही है और इसमें गोपाल का किरदार है। पैसे ज्यादा नहीं थे, लेकिन किरदार अच्छा था। इसके बाद वह निर्देशक विशाल चतुर्वेदी से मिलने पहुंचे।

वहां हनुमान जी की एक तस्वीर लगी थी, जिसमें नीम करौली बाबा ध्यान में बैठे थे। उस तस्वीर ने उनका ध्यान खींचा। निर्देशक ने उन्हें कहानी सुनाई और इसके एक-दो दिन बाद उन्होंने ऑडिशन दिया। उनका एक ही ऑडिशन हुआ और इसी के बाद उनका चयन हो गया।

शूटिंग में रोज पढ़ते थे हनुमान चालीसा, गणेश जी की पूजा भी होती थी

भगवान दास ने बताया कि फिल्म की शूटिंग के दौरान टीम हर दिन हनुमान चालीसा पढ़ती थी और गणेश जी की पूजा करती थी। शूटिंग के दौरान कई मुश्किलें भी आईं, लेकिन किसी न किसी तरह सब ठीक होता गया।

बंदर वाला किस्सा इसी दौरान हुआ। मूर्ति स्थापना के सीन के दौरान बरगद के पेड़ पर आकर बैठा बंदर काफी देर तक शूटिंग देखता रहा। उसे केले दिए गए तो उसने उन्हें खाया और वहां से जाने के बजाय शूटिंग देखता रहा। झोपड़ी बनाए जाने के दौरान भी उसकी मौजूदगी बनी रही।

भगवान दास ने बताया कि गांव वालों ने कहा कि करीब 13-14 साल बाद वहां ऐसा बंदर दिखाई दिया है। इस वजह से पूरी घटना उनके लिए बेहद खास बन गई।

ट्रेन वाला सीन भगवान दास के दिल के सबसे करीब

फिल्म में कई दृश्यों में से ट्रेन वाला सीन भगवान दास के दिल के बेहद करीब है। इस दृश्य में महाराज जी ट्रेन रोक देते हैं। अंग्रेज अधिकारी वहां पहुंचते हैं और कहते हैं कि उनके पास टिकट नहीं है। इसके बाद किसी तरह टिकट सामने आ जाती है।

महाराज जी कहते हैं कि किसी साधु-संत को ट्रेन में बैठने से कभी नहीं रोकना चाहिए। भगवान दास के मुताबिक, इस पूरे सीन में गोपाल का महाराज जी के प्रति जुड़ाव बहुत गहरा है। उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि वह भगवान का ही स्वरूप हैं। इस दृश्य को करते हुए वह अंदर से काफी भावुक हो गए थे।

अचानक बदला महाराज जी का किरदार, नए अभिनेता ने जल्दी पकड़ी भूमिका

महाराज जी का किरदार निभाने वाले अभिनेता पहले से तय नहीं थे। भगवान दास ने बताया कि पहले किसी दूसरे अभिनेता के साथ एक दिन शूटिंग हो चुकी थी, लेकिन अचानक उनकी तबीयत खराब हो गई। इसके बाद नए अभिनेता की तलाश शुरू हुई।

इसी दौरान निर्देशन टीम में शामिल शोभिनव के साथ उनकी रीडिंग हुई। भगवान दास ने उन्हें पहली बार ठीक से उसी दौरान देखा। उन्हें लगा कि उनका चेहरा बाबा के किरदार के लिए बिल्कुल सही है।

इसके बाद कई दृश्यों की रिहर्सल हुई और उन्होंने बहुत जल्दी किरदार पकड़ लिया। बाद में पता चला कि वह लखनऊ में थिएटर कर चुके हैं और उन्होंने फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) में कुछ फिल्मों में असिस्ट किया है। भगवान दास को लगा कि शायद यह किरदार उन्हीं के लिए था।

बारिश से लेकर जनरेटर तक, शूटिंग के दौरान कई मुश्किलें आईं

फिल्म की शूटिंग के दौरान टीम को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा। कलाकारों के आने-जाने में दिक्कत हुई, जनरेटर और दूसरी व्यवस्थाओं को लेकर परेशानी आई और बारिश के कारण भी शूटिंग रोकनी पड़ी।

टीम करीब 24-25 दिन चित्रकूट में रही। हालांकि निर्देशक विशाल चतुर्वेदी काफी स्पष्ट और आत्मविश्वासी थे। उन्हें पता था कि फिल्म पूरी करनी है। इसी वजह से किसी न किसी तरह शूटिंग आगे बढ़ती रही।

फिल्म की सफलता के बाद लगातार मिल रहे फोन और शुभकामनाएं

‘हनुमान अंश’ की सफलता के बाद भगवान दास की जिंदगी में बड़ा बदलाव आया है। उन्होंने कहा कि ऐसा जीवन उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था। पिछले कुछ दिनों से लगातार फोन और संदेश आ रहे हैं।

लोग जिस तरह दुआएं और शुभकामनाएं दे रहे हैं, उससे वह कई बार भावुक हो जाते हैं। उनके लिए सबसे अच्छी बात यह है कि बहुत से लोग उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानते तक नहीं, फिर भी उनके लिए दुआ कर रहे हैं। वह अपनी क्षमता के अनुसार ज्यादा से ज्यादा लोगों को जवाब देकर धन्यवाद देने की कोशिश करते हैं।

बचपन से था अभिनय का सपना, रेडियो से शुरू हुई कलाकारों को जानने की कोशिश

भगवान दास के मुताबिक, उन्हें बचपन से ही अभिनय में रुचि थी। उस समय मोबाइल फोन नहीं था और वह रेडियो सुना करते थे। रेडियो पर आने वाले कलाकारों के इंटरव्यू सुनते और उनकी बातें अपनी डायरी में लिखते थे।

उन्होंने मुंबई के कई स्कूलों के पते भी जुटाए और कलाकारों को चिट्ठियां लिखकर काम देने का अनुरोध किया। हालांकि किसी का जवाब नहीं आया, लेकिन अभिनय का सपना बना रहा।

12वीं के बाद उन्होंने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) के बारे में जानकारी हासिल की। वहां प्रवेश के लिए थिएटर के अनुभव की जरूरत थी। उनके गुरु अरुण पांडे जी ने उन्हें रंगमंडल से जोड़ा। इसके बाद उन्होंने करीब छह साल थिएटर किया।

उन्होंने दो बार NSD में प्रवेश की कोशिश की, लेकिन चयन नहीं हुआ। बाद में उन्हें लखनऊ के भारतेंदु नाट्य अकादमी में प्रवेश मिल गया।

मुंबई आने के डेढ़ महीने बाद मिला पहला काम

मुंबई आने के करीब डेढ़ महीने बाद भगवान दास को टीवी सीरियल ‘देवी’ में बुंदेली भाषा के संवाद और बोली पर काम करने का मौका मिला। उनके सीनियर राम मेहर झांगड़ा ने उनकी मुलाकात कराई थी।

वह कलाकारों को बुंदेली के शब्द और बोलने का तरीका बताते थे। बाद में इसी सीरियल में उन्हें छोटा-सा किरदार निभाने का मौका भी मिला।

ऑटो ड्राइवर से लेकर कैकेयी और कुल्फी वाले तक निभाए अलग-अलग किरदार

भगवान दास ने अपने अब तक के करियर में कई तरह के किरदार निभाए हैं। ‘मुझसे फ्रेंडशिप करोगे’ में उन्होंने ऑटो ड्राइवर का किरदार किया। इसके बाद ‘प्रेम रतन धन पायो’ में रामलीला के सीन में कैकेयी की भूमिका निभाई।

इसके बाद ‘शादिस्तान’ और ‘थार’ जैसी फिल्मों में काम किया। ‘रंगबाज’ में उन्होंने गज्जू का किरदार निभाया। वहीं ‘फोटोग्राफ’ में कुल्फी वाले का छोटा-सा किरदार किया।

कुल्फी वाले की भूमिका की तैयारी के लिए वह करीब 10-15 दिन जुहू में कुल्फी बेचने वालों के साथ घूमे। इस दौरान उन्होंने करीब से देखा कि कुल्फी बेचने वाले किस तरह ग्राहकों को कुल्फी बेचते हैं और उनका व्यवहार कैसा होता है।

कई बार हिम्मत टूटी, लेकिन अभिनय छोड़ने का ख्याल नहीं आया

अभिनेता ने बताया कि संघर्ष के दौरान कई बार उनकी हिम्मत जरूर टूटी, लेकिन उन्होंने कभी अभिनय छोड़ने और घर लौटने का फैसला नहीं किया। उनके मुताबिक, उन्हें अभिनय के अलावा कुछ आता भी नहीं है।

उन्होंने ड्रामा पढ़ाने की कोशिश की, दूसरे काम किए और नुक्कड़ नाटक भी किए, लेकिन अभिनय से जुड़े रहे। उनका मानना है कि इंसान को वही काम करना चाहिए, जिसमें उसे खुशी मिलती है। सफल हों या असफल, अपने मन का काम करने में एक अलग तरह का संतोष मिलता है।

‘हनुमान अंश’ के बाद कई प्रोजेक्ट्स पर बातचीत

‘हनुमान अंश’ के बाद भगवान दास अब आगे अच्छे काम का इंतजार कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि फिलहाल कुछ प्रोजेक्ट्स पर बातचीत चल रही है।

जबलपुर में शूट की गई एक फिल्म आने वाली है। इसके अलावा एक शॉर्ट फिल्म है, जो फिल्म समारोहों में जा रही है। ‘मेट्रो सिटी’ नाम का डॉक्यू-ड्रामा भी है।

भगवान दास का कहना है कि ‘हनुमान अंश’ के बाद उन्हें लोगों का प्यार मिला है और अब उम्मीद है कि आगे भी अच्छा काम मिलेगा।