हिमाचल में नए जिले?रिटायर जस्टिस धर्मचंद चौधरी को जिम्मेदारी,6 महीने में रिपोर्ट देगा आयोग

हिमाचल प्रदेश में नए जिलों के गठन के लिए रिटायर जस्टिस धर्मचंद चौधरी की अध्यक्षता में आयोग बना। छह महीने में रिपोर्ट आएगी, देहरा समेत कई क्षेत्रों की मांग पर नजर।

हिमाचल में नए जिले?रिटायर जस्टिस धर्मचंद चौधरी को जिम्मेदारी,6 महीने में रिपोर्ट देगा आयोग

हिमाचल में नए जिलों के गठन के लिए रिटायर जस्टिस धर्मचंद की अध्यक्षता में चार सदस्यीय कमीशन गठित

➤ आयोग को छह महीने में रिपोर्ट सौंपनी होगी, जिलों के साथ उपमंडल, तहसील और विकास खंडों की भी होगी समीक्षा

➤ 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले नए जिलों का मुद्दा गरमाया, कांगड़ा के देहरा समेत कई क्षेत्रों में उठती रही है मांग

शिमला। हिमाचल प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले नए जिलों के गठन का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली सरकार ने राज्य में प्रशासनिक पुनर्गठन की संभावनाओं पर विचार करने के लिए कमीशन का गठन किया है। राज्यपाल की मंजूरी के बाद सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) ने इस संबंध में आयोग गठित कर दिया है। सरकार ने रिटायर जस्टिस धर्मचंद चौधरी की अध्यक्षता में चार सदस्यीय कमीशन बनाया है, जिसे छह महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपनी होगी।

आयोग की रिपोर्ट के आधार पर सरकार प्रदेश में नए जिलों के गठन और मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव को लेकर फैसला करेगी। इसके दायरे में केवल नए जिले बनाने की संभावनाएं ही नहीं होंगी, बल्कि मौजूदा जिलों, उपमंडलों, तहसीलों और विकास खंडों की स्थिति की भी समीक्षा की जाएगी। आयोग को यह भी देखना होगा कि प्रशासनिक व्यवस्था में कहां बदलाव की जरूरत है और उपलब्ध संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करते हुए व्यवस्था को कम खर्च में कैसे प्रभावी बनाया जा सकता है।

इस फैसले के बाद हिमाचल प्रदेश में लंबे समय से अलग जिले की मांग कर रहे क्षेत्रों में उम्मीदें बढ़ सकती हैं। हालांकि, अभी किसी नए जिले के गठन का अंतिम फैसला नहीं हुआ है। पहले आयोग अपनी रिपोर्ट तैयार करेगा और उसके बाद सरकार सिफारिशों के आधार पर आगे की कार्रवाई तय करेगी।

छह महीने में रिपोर्ट देगा आयोग, प्रशासनिक व्यवस्था की होगी समीक्षा

राज्य सरकार की ओर से गठित चार सदस्यीय आयोग को अपनी रिपोर्ट तैयार करने के लिए छह महीने का समय दिया गया है। आयोग प्रदेश के प्रशासनिक ढांचे का अध्ययन करेगा और जरूरत के मुताबिक जिलों के पुनर्गठन की सिफारिश करेगा।

इस प्रक्रिया में यह आकलन किया जाएगा कि वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था लोगों की जरूरतों के लिहाज से कितनी प्रभावी है। इसके साथ ही यह भी देखा जाएगा कि किन क्षेत्रों में जिला मुख्यालय या अन्य प्रशासनिक कार्यालयों की दूरी के कारण लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ता है।

आयोग के सामने यह चुनौती भी होगी कि प्रशासनिक सुविधाओं को बेहतर बनाने के साथ सरकारी खर्च को कैसे नियंत्रित रखा जाए। नए जिले बनने की स्थिति में प्रशासनिक कार्यालयों, अधिकारियों और अन्य संसाधनों की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे में पुनर्गठन की संभावनाओं का आकलन करते समय प्रशासनिक जरूरतों और वित्तीय प्रभावों को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण होगा।

आयोग की सिफारिशें आने के बाद ही नए जिलों के गठन को लेकर तस्वीर स्पष्ट होगी। फिलहाल सरकार ने समीक्षा की प्रक्रिया शुरू की है। इसका उद्देश्य मौजूदा व्यवस्था का आकलन करके यह तय करना है कि कहां प्रशासनिक बदलाव की जरूरत है।

नूरपुर, देहरा और पालमपुर में लंबे समय से उठती रही अलग जिले की मांग

हिमाचल प्रदेश में नए जिलों के गठन की मांग कोई नई नहीं है। राज्य के कई बड़े जिलों में दूरदराज के क्षेत्रों के लोगों को जिला मुख्यालय तक पहुंचने में परेशानी होती है। इसी वजह से समय-समय पर अलग जिला बनाने की मांग उठती रही है।

कांगड़ा जिले के नूरपुर, देहरा और पालमपुर जैसे क्षेत्रों में अलग जिला बनाने की मांग लंबे समय से चर्चा में रही है। इन क्षेत्रों में जिला मुख्यालय की दूरी को एक प्रमुख वजह बताया जाता रहा है। स्थानीय स्तर पर यह मांग उठती रही है कि प्रशासनिक सुविधाओं को लोगों के नजदीक लाने के लिए अलग जिले का गठन किया जाना चाहिए।

साल 2012 में तत्कालीन भाजपा सरकार के समय भी हिमाचल प्रदेश में नए जिले बनाने की संभावनाओं पर चर्चा हुई थी। उस समय इस दिशा में विचार किया गया, लेकिन योजना आगे नहीं बढ़ पाई। इसके बाद भी अलग जिलों की मांग समय-समय पर राजनीतिक और प्रशासनिक चर्चाओं का हिस्सा बनी रही।

शिमला के रोहड़ू और रामपुर, मंडी के सुंदरनगर को लेकर भी मांग

कांगड़ा के अलावा प्रदेश के दूसरे हिस्सों में भी नए जिले बनाने की मांग उठती रही है। शिमला जिले के रोहड़ू और रामपुर को अलग जिला बनाने की मांग की जाती रही है। इसी तरह मंडी जिले के सुंदरनगर को भी अलग जिला बनाने की मांग सामने आती रही है।

इन क्षेत्रों में अलग जिला बनाने की मांग के पीछे प्रशासनिक सुविधाओं को नजदीक लाने और लोगों की समस्याओं का स्थानीय स्तर पर समाधान करने की अपेक्षा प्रमुख रही है। हालांकि, अलग जिले के गठन का फैसला केवल मांग के आधार पर नहीं होता। इसके लिए प्रशासनिक जरूरतों, संसाधनों, वित्तीय प्रभावों और अन्य संबंधित पहलुओं का आकलन करना जरूरी होता है।

साल 2022 में विधानसभा चुनाव से पहले भी हिमाचल में नए जिले बनाने का मुद्दा उठा था। अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले आयोग के गठन ने इस विषय को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

2027 के विधानसभा चुनाव से पहले क्यों अहम है आयोग का गठन?

हिमाचल प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में नए जिलों के गठन की संभावनाओं की समीक्षा को प्रशासनिक और राजनीतिक, दोनों नजरियों से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सरकार की ओर से इस दिशा में आयोग गठित करने के बाद उन क्षेत्रों में भी चर्चा तेज हो सकती है, जहां लंबे समय से अलग जिले की मांग की जा रही है।

प्रशासनिक दृष्टि से देखा जाए तो जिलों के पुनर्गठन का उद्देश्य सरकारी सेवाओं को अधिक प्रभावी बनाना और लोगों की पहुंच प्रशासन तक आसान करना हो सकता है। वहीं, वित्तीय दृष्टि से यह आकलन जरूरी होगा कि नए जिलों के गठन और प्रशासनिक ढांचे में बदलाव से सरकारी खजाने पर कितना असर पड़ेगा।

चुनावी संदर्भ में भी यह मुद्दा महत्वपूर्ण है, क्योंकि अलग जिले की मांग कई क्षेत्रों में लंबे समय से उठती रही है। ऐसे में आयोग की रिपोर्ट और सरकार की आगे की कार्रवाई पर राजनीतिक दलों के साथ स्थानीय लोगों की नजर रहेगी।

हालांकि, आयोग का गठन अपने आप में नए जिले बनने की गारंटी नहीं है। अंतिम फैसला रिपोर्ट में दी गई सिफारिशों और सरकार के निर्णय पर निर्भर करेगा।

देहरा को जिला बनाने की चर्चा, कांगड़ा की राजनीतिक अहमियत पर नजर

नए जिलों के गठन की इस पहल में कांगड़ा जिले के देहरा को लेकर भी राजनीतिक चर्चा हो रही है। सूत्रों के मुताबिक, देहरा को जिला बनाकर कांगड़ा क्षेत्र को साधने की कोशिश हो सकती है। कांगड़ा को हिमाचल प्रदेश की सत्ता की दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जाता रहा है।

देहरा विधानसभा क्षेत्र से वर्तमान में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की धर्मपत्नी कमलेश ठाकुर विधायक हैं। ऐसे में देहरा को जिला बनाने की संभावना को लेकर राजनीतिक चर्चाएं और तेज हो सकती हैं।

हालांकि, देहरा को जिला बनाने को लेकर अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है। आयोग प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों की प्रशासनिक जरूरतों की समीक्षा करेगा और अपनी रिपोर्ट में सिफारिशें देगा। इसलिए किसी विशेष क्षेत्र को जिला बनाने की संभावना को फिलहाल प्रस्तावित चर्चा के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

अब आयोग की रिपोर्ट पर टिकी निगाहें

हिमाचल प्रदेश में नए जिलों के गठन को लेकर लंबे समय से उठ रही मांगों के बीच सरकार का यह कदम अहम माना जा रहा है। छह महीने के भीतर रिपोर्ट तैयार करने की जिम्मेदारी मिलने के बाद आयोग को प्रदेश के प्रशासनिक ढांचे की समीक्षा करनी होगी।

इस दौरान जिलों, उपमंडलों, तहसीलों और विकास खंडों की स्थिति के साथ यह भी देखा जाएगा कि मौजूदा व्यवस्था में बदलाव कहां जरूरी है। सरकार के सामने प्रशासनिक सुविधाओं को बेहतर बनाने के साथ खर्च और संसाधनों के संतुलन की चुनौती भी रहेगी।

अब सबसे अहम सवाल यह है कि आयोग अपनी रिपोर्ट में किन क्षेत्रों को अलग जिला बनाने की सिफारिश करता है और सरकार उन सिफारिशों पर क्या निर्णय लेती है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले इस मुद्दे पर होने वाली कार्रवाई हिमाचल प्रदेश की प्रशासनिक और राजनीतिक चर्चा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।