एमडीयू में प्रो. गिल को राहत, निलंबन आदेश रद्द

महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय के कंप्यूटर साइंस विभाग के प्रो. नसीब सिंह गिल का निलंबन कुलपति द्वारा निरस्त कर दिया गया है। 1989 की नियुक्ति में योग्यता संबंधी विवाद पर जांच रिपोर्ट के बाद उन्हें निलंबित किया गया था।

एमडीयू में प्रो. गिल को राहत, निलंबन आदेश रद्द

एमडीयू में निलंबित प्रो. नसीब सिंह गिल को बड़ी राहत
कुलपति प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने निरस्त किया सस्पेंशन
1989 की नियुक्ति पर सवाल, जांच रिपोर्ट में योग्यता विवाद


रोहतक स्थित महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में लंबे समय से चर्चित रहे प्रो. नसीब सिंह गिल प्रकरण में बड़ा मोड़ आ गया है। कंप्यूटर साइंस एंड एप्लीकेशंस विभाग के निलंबित प्रोफेसर नसीब सिंह गिल का निलंबन विश्वविद्यालय प्रशासन ने निरस्त कर दिया है। मौजूदा कुलपति प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने यह निर्णय लिया। उन्हें 17 फरवरी को तत्कालीन कुलपति राजबीर सिंह द्वारा निलंबित किया गया था।

प्रो. गिल की नियुक्ति को लेकर आई शिकायतों के बाद पूर्व वीसी ने डॉ. पी. बापैया की अध्यक्षता में एक सदस्यीय फैक्ट फाइंडिंग कमेटी गठित की थी। 10 जनवरी को सौंपी गई रिपोर्ट में उल्लेख किया गया कि वर्ष 1989 में विज्ञापन संख्या 7/89 के तहत लेक्चरर पद के लिए पीएचडी या एमफिल अनिवार्य योग्यता थी। रिपोर्ट के अनुसार, उस समय चयनित प्रो. गिल और उनके साथ चयनित एक अन्य अभ्यर्थी निर्धारित योग्यता पूरी नहीं करते थे।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि एक पद के सापेक्ष दो लेक्चरर की नियुक्ति की गई, जो नियमों के विरुद्ध थी। इसके अलावा नियुक्ति से जुड़े दस्तावेज विश्वविद्यालय रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं पाए गए। इन तथ्यों के सामने आने के बाद प्रो. गिल पर बर्खास्तगी की आशंका भी जताई जा रही थी।

हालांकि प्रो. गिल ने लगातार दावा किया है कि उनका चयन पूरी तरह से नियमों के अनुरूप और वैध प्रक्रिया के तहत हुआ था। उन्होंने जांच रिपोर्ट पर भी सवाल उठाए थे। अब कुलपति द्वारा निलंबन निरस्त किए जाने के बाद उन्हें बड़ी राहत मिली है, लेकिन नियुक्ति विवाद का मुद्दा पूरी तरह समाप्त नहीं माना जा रहा।

विश्वविद्यालय परिसर में इस फैसले को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। एक पक्ष इसे प्रशासनिक संतुलन का कदम मान रहा है, तो दूसरा पक्ष जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की मांग कर रहा है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या नियुक्ति से जुड़ी जांच पर कोई अंतिम निर्णय लिया जाता है या मामला यहीं शांत हो जाता है।