लो-कार्ब डाइट से दिल को खतरा? कुछ लोगों में बढ़ सकता है बैड कोलेस्ट्रॉल

लो-कार्ब डाइट वजन और ब्लड शुगर नियंत्रित करने में मदद कर सकती है, लेकिन कुछ लोगों में एलडीएल बढ़ाकर हार्ट डिजीज और स्ट्रोक का खतरा बढ़ा सकती है।

लो-कार्ब डाइट से दिल को खतरा? कुछ लोगों में बढ़ सकता है बैड कोलेस्ट्रॉल

लो-कार्ब डाइट से वजन घट सकता है, लेकिन हर किसी के लिए फायदेमंद नहीं

➤ ज्यादा सैचुरेटेड फैट वाली डाइट से बढ़ सकता है बैड कोलेस्ट्रॉल

➤ आनुवंशिक जोखिम वाले लोगों में हार्ट डिजीज और स्ट्रोक का खतरा बढ़ने की आशंका

हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली: वजन कम करने और ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने के लिए इन दिनों लो-कार्ब डाइट काफी लोकप्रिय है। रोटी, ब्रेड, आलू और दूसरी कार्बोहाइड्रेट वाली चीजों की मात्रा कम करके लोग वजन घटाने की कोशिश करते हैं। हालांकि, एक नई रिसर्च ने इस डाइट को लेकर कुछ लोगों के लिए चिंता बढ़ा दी है। अध्ययन में पाया गया है कि लो-कार्ब डाइट का असर हर व्यक्ति पर एक जैसा नहीं होता और कुछ लोगों में इससे बैड कोलेस्ट्रॉल यानी एलडीएल तेजी से बढ़ सकता है।

हाई एलडीएल को पहले से ही स्वास्थ्य विशेषज्ञ धमनियों की दीवारों में फैट जमा होने, नसों के संकरा होने और हार्ट अटैक के खतरे से जोड़ते रहे हैं। नई रिसर्च के मुताबिक, जिन लोगों में आनुवंशिक रूप से हार्ट डिजीज का जोखिम अधिक है, उनमें सैचुरेटेड फैट वाली लो-कार्ब डाइट लेने पर बैड कोलेस्ट्रॉल में ज्यादा बढ़ोतरी देखी गई। इससे यह सवाल उठता है कि क्या वजन घटाने के लिए हर व्यक्ति के लिए लो-कार्ब डाइट सही विकल्प है।

वजन और ब्लड शुगर कंट्रोल के लिए लोकप्रिय है लो-कार्ब डाइट

स्वस्थ और फिट रहने के लिए स्वास्थ्य विशेषज्ञ डाइट में सुधार करने की सलाह देते हैं। भोजन में प्रोटीन, फाइबर और विटामिन्स से भरपूर चीजों को शामिल करना शरीर के लिए जरूरी पोषक तत्वों की पूर्ति में मदद कर सकता है। इससे वजन और ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रित रखना भी आसान हो सकता है।

वजन बढ़ना कई बीमारियों का बड़ा कारण माना जाता है। ऐसे में जब बात वेट कंट्रोल की आती है तो लो-कार्ब डाइट की चर्चा अक्सर होती है। इसमें रोटी, चावल, ब्रेड, आलू और दूसरी कार्बोहाइड्रेट वाली चीजों की मात्रा कम की जाती है। इसे वजन कम करने, ब्लड शुगर कंट्रोल रखने और डायबिटीज से बचाव के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है।

हालांकि, नई रिसर्च के बाद यह साफ हुआ है कि लो-कार्ब डाइट सभी लोगों के लिए एक जैसी फायदेमंद हो, यह जरूरी नहीं है

कुछ लोगों में तेजी से बढ़ सकता है बैड कोलेस्ट्रॉल

अध्ययन में पाया गया है कि लो-कार्ब वाली डाइट कुछ लोगों में बैड कोलेस्ट्रॉल का स्तर काफी बढ़ा सकती है। शरीर में एलडीएल बढ़ने से धमनियों में फैट जमा होने और नसों के संकरा होने की समस्या हो सकती है। इससे हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ने की आशंका रहती है।

हाई कोलेस्ट्रॉल धमनियों को संकरा करके हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ाता है और हर साल दुनिया भर में लाखों लोगों की मौत का कारण बनता है। वहीं, कार्बोहाइड्रेट वाली चीजें शरीर को ऊर्जा देने के लिए जरूरी मानी जाती हैं।

पहले कुछ अध्ययनों में यह भी कहा जाता रहा है कि लो-कार्ब डाइट शरीर में गुड कोलेस्ट्रॉल यानी एचडीएल बढ़ा सकती है। एचडीएल शरीर से अतिरिक्त फैटी पदार्थ और धमनियों में जमा चर्बी को कम करने में भूमिका निभा सकता है। लेकिन नई रिसर्च से संकेत मिला है कि जिन लोगों में पहले से हार्ट डिजीज का खतरा ज्यादा है, उनके लिए इस तरह की डाइट गंभीर समस्याओं का कारण बन सकती है।

हर व्यक्ति के लिए एक जैसा काम नहीं करती डाइट

अध्ययन की मुख्य लेखिका एलेक्सा बराड का कहना है कि लो-कार्ब डाइट से कुछ लोगों को फायदा मिल सकता है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि यह सभी लोगों के लिए फायदेमंद हो।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हर डाइट 'वन साइज फिट्स ऑल' वाले फॉर्मूले पर काम नहीं करती। यानी किसी एक व्यक्ति के लिए फायदेमंद साबित होने वाली डाइट दूसरे व्यक्ति के लिए भी उतनी ही अच्छी हो, यह जरूरी नहीं है।

अध्ययन में पाया गया कि जिन लोगों में आनुवंशिक यानी जीन से जुड़े हार्ट डिजीज के खतरे की संभावना ज्यादा थी, उनमें सैचुरेटेड फैट ज्यादा लेने पर बैड कोलेस्ट्रॉल में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी देखी गई।

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने 600 से अधिक वयस्कों के आंकड़े देखे

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन के शोधकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि क्या किसी व्यक्ति के जेनेटिक्स से यह संकेत मिल सकता है कि उसके लिए लो-कार्ब डाइट फायदेमंद होगी या नहीं। इसके लिए 600 से अधिक वयस्कों के एक साल के ट्रायल के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया।

प्रतिभागियों ने हेल्दी लो-कार्ब या हेल्दी लो-फैट डाइट अपनाई थी। वजन घटाने के मामले में दोनों डाइट से विशेषज्ञों को कोई खास लाभ नहीं दिखा।

इसके बाद 431 प्रतिभागियों के जेनेटिक डेटा, सैचुरेटेड फैट वाली डाइट और छह महीने में बैड कोलेस्ट्रॉल में हुए बदलाव को समझने की कोशिश की गई। इसमें पाया गया कि जिन लोगों में आनुवंशिक रूप से एलडीएल बढ़ने की प्रवृत्ति थी, उनमें लो-कार्ब डाइट के दौरान बैड कोलेस्ट्रॉल की बढ़ोतरी अधिक देखी गई।

कार्ब कम करने के बाद क्या खाते हैं, यह भी महत्वपूर्ण

शोधकर्ताओं के अनुसार, इसकी एक वजह यह हो सकती है कि जब लोग कार्बोहाइड्रेट कम करते हैं तो उसकी जगह रेड मीट और चीज जैसे अधिक फैट वाले खाद्य पदार्थ खाने लगते हैं। इससे डाइट में सैचुरेटेड फैट की मात्रा बढ़ सकती है और कुछ लोगों में एलडीएल का स्तर भी बढ़ सकता है।

यही कारण है कि केवल कार्बोहाइड्रेट की मात्रा कम करना ही पर्याप्त नहीं माना जा सकता। उसकी जगह कौन से खाद्य पदार्थ लिए जा रहे हैं, इसका भी ध्यान रखना जरूरी है।

विशेषज्ञों ने सैचुरेटेड फैट को लेकर दी सलाह

विशेषज्ञों के मुताबिक, हार्ट हेल्थ को बेहतर बनाए रखने के लिए आहार में सैचुरेटेड फैट कम करना और उसकी जगह अनसैचुरेटेड फैट और ओमेगा-3 की मात्रा बढ़ाना बेहतर विकल्प हो सकता है।

ब्रिटेन की मौजूदा गाइडलाइन के मुताबिक, किसी व्यक्ति की रोजाना कुल कैलोरी में सैचुरेटेड फैट की मात्रा करीब 10 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। पुरुषों के लिए रोजाना अधिकतम करीब 30 ग्राम सैचुरेटेड फैट, जबकि महिलाओं को इसकी मात्रा 20 ग्राम तक सीमित रखने की सलाह दी जाती है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि आगे चलकर इस तरीके की मदद से डॉक्टर और न्यूट्रिशनिस्ट यह पहचानने में सक्षम हो सकते हैं कि किन लोगों के लिए किस तरह की डाइट की सलाह दी जा सकती है।

खुद से डाइट शुरू करने से बचने की सलाह

अध्ययनकर्ताओं ने लोगों को सलाह दी है कि किसी दूसरे व्यक्ति में किसी डाइट के फायदे देखकर खुद से डाइट शुरू नहीं करनी चाहिए। हर व्यक्ति की जरूरत और स्वास्थ्य स्थिति अलग हो सकती है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, अपनी सेहत की जांच कराने और उसके आधार पर डाइट का चयन करना बेहतर विकल्प है। खासतौर पर लो-कार्ब डाइट लेते समय यह देखना जरूरी है कि कम किए गए कार्बोहाइड्रेट की जगह किन खाद्य पदार्थों को शामिल किया जा रहा है।

इस रिसर्च का मुख्य संदेश यही है कि वजन घटाने के लिए डाइट चुनते समय सिर्फ कार्बोहाइड्रेट कम करने पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। डाइट में वसा की गुणवत्ता, सैचुरेटेड फैट की मात्रा और व्यक्ति के आनुवंशिक जोखिम जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखना जरूरी है।