रिवालसर में नहीं गूंजा जजुराना-मोनाल का कलरव, चार साल से फाइलों में कैद फिजेन्ट्री; तीन धर्मों की आस्था के बीच पर्यटन का बड़ा सपना अधूरा
विश्व प्रसिद्ध धार्मिक स्थल रिवालसर में जजुराना और मोनाल के लिए प्रस्तावित फिजेन्ट्री चार साल से लंबित है, मंजूरी के बाद शुरू होगा निर्माण
➤ चार हेक्टेयर में जजुराना, मोनाल समेत दुर्लभ पक्षियों का संसार बसाने की योजना चार साल से अटकी
➤ विश्व प्रसिद्ध धार्मिक स्थल रिवालसर में हिंदू, बौद्ध और सिख आस्था का अनूठा संगम, फिर भी फिजेन्ट्री का सपना अधूरा
➤ 2021 में जयराम सरकार के समय भेजी गई प्रपोजल अब भी सेंट्रल जू अथॉरिटी की मंजूरी के इंतजार में
सतीश ठाकुर
गोहर, मंडी (हिमाचल)। मंडी जिले का रिवालसर सिर्फ एक पर्यटन स्थल या झील के लिए प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि यह हिंदू, बौद्ध और सिख धर्म की आस्था का अनूठा संगम माना जाता है। रिवालसर झील के किनारे तीनों धर्मों से जुड़े धार्मिक स्थल मौजूद हैं। बौद्ध परंपरा में इसे त्सो पेमा यानी कमल झील के नाम से जाना जाता है और इसका संबंध महान बौद्ध गुरु पद्मसंभव से जोड़ा जाता है। हिंदू परंपरा में भी रिवालसर का विशेष धार्मिक महत्व है, जबकि सिख इतिहास में गुरु गोबिंद सिंह के यहां ठहरने की मान्यता जुड़ी हुई है। हिमाचल प्रदेश सरकार का मंडी जिला प्रशासन भी रिवालसर को हिंदू, सिख और बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल बताता है।
ऐसे बहुधार्मिक और ऐतिहासिक आस्था केंद्र में पर्यटन को नया आयाम देने के लिए वर्ष 2021 में तत्कालीन जयराम सरकार के कार्यकाल में एक महत्वाकांक्षी योजना तैयार हुई थी। रिवालसर चिड़ियाघर में फिजेन्ट्री विकसित कर हिमाचल के दुर्लभ और खूबसूरत पक्षियों को पर्यटकों के सामने लाने का प्रस्ताव वाइल्ड लाइफ विभाग ने तैयार कर आगे भेजा था। करीब चार हेक्टेयर क्षेत्र में फिजेन्ट्री और एवियरी बनाने तथा राज्य पक्षी जजुराना, मोनाल, जंगली मुर्गा और मोर समेत दुर्लभ पक्षियों को बसाने की योजना थी।
लेकिन चार साल बाद भी यह योजना जमीन पर नहीं उतर पाई है। फिजेन्ट्री नहीं बनी, दुर्लभ पक्षी नहीं पहुंचे और पर्यटकों के लिए तैयार होने वाला नया आकर्षण अब भी सरकारी मंजूरी की राह देख रहा है।
तीन धर्मों की आस्था का केंद्र है रिवालसर, पर्यटन के लिहाज से भी खास पहचान
रिवालसर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां हिंदू, बौद्ध और सिख आस्था एक साथ दिखाई देती है। रिवालसर झील के आसपास तीनों धर्मों से जुड़े धार्मिक स्थल मौजूद हैं। हिमाचल सरकार के अनुसार झील अपने तैरते हुए सरकंडों के छोटे-छोटे द्वीपों और धार्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है।
बौद्ध मान्यता में रिवालसर का संबंध गुरु पद्मसंभव यानी गुरु रिनपोछे से जुड़ा है। तिब्बती बौद्ध परंपरा में रिवालसर झील को त्सो पेमा कहा जाता है और मान्यता है कि पद्मसंभव यहां से तिब्बत की ओर गए थे। झील में तैरते सरकंडों के छोटे द्वीपों को लेकर भी धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं।
हिंदू परंपरा में रिवालसर का संबंध भगवान शिव और ऋषि लोमस से जोड़ा जाता है। यहां भगवान कृष्ण, भगवान शिव और ऋषि लोमस से जुड़े मंदिर भी हैं। वहीं सिख इतिहास में दसवें गुरु गुरु गोबिंद सिंह के रिवालसर आने और यहां करीब एक महीने ठहरने की मान्यता है। उनकी स्मृति में यहां गुरुद्वारा भी स्थापित है।
यानी रिवालसर ऐसा धार्मिक स्थल है जहां तीन प्रमुख धार्मिक परंपराओं की आस्था, इतिहास और पर्यटन एक ही जगह दिखाई देते हैं। ऐसे स्थान पर दुर्लभ हिमाचली पक्षियों की फिजेन्ट्री विकसित होने से धार्मिक पर्यटन के साथ प्रकृति और वन्यजीव पर्यटन को भी नया आकर्षण मिल सकता था।
चार हेक्टेयर में बसना था दुर्लभ पक्षियों का संसार
वर्ष 2021 में तैयार प्रस्ताव के मुताबिक रिवालसर चिड़ियाघर में करीब चार हेक्टेयर भूमि पर फिजेन्ट्री विकसित की जानी थी। यहां राज्य पक्षी जजुराना के साथ मोनाल, जंगली मुर्गा, मोर और अन्य दुर्लभ पक्षियों को डिस्प्ले के लिए रखने का प्रस्ताव था।
पक्षियों के लिए एवियरी बनाने की भी योजना थी, ताकि उन्हें पर्याप्त स्थान और प्राकृतिक वातावरण मिल सके। इसके साथ ही दुर्लभ पक्षियों के संरक्षण और प्रजनन को बढ़ावा देने की भी योजना बनाई गई थी।
इसका सीधा लाभ पर्यटकों को भी मिलना था। देश-विदेश से रिवालसर पहुंचने वाले पर्यटकों को हिमाचल के जंगलों में पाए जाने वाले दुर्लभ और खूबसूरत पक्षियों को एक ही स्थान पर देखने का अवसर मिलता।
मगर प्रस्ताव भेजे जाने के बाद योजना जिस रफ्तार से आगे बढ़ने की उम्मीद थी, वह नहीं हो सकी। सरकार बदली और फिजेन्ट्री की योजना भी आगे बढ़ने के बजाय फाइलों में सिमट गई।
जजुराना और मोनाल बन सकते थे रिवालसर के नए पर्यटन आकर्षण
रिवालसर चिड़ियाघर पहले से ही पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। यहां सेहल, कक्कड़, घोरल, सांभर, चीतल, घोरड़ और भालू समेत कई वन्यजीव मौजूद हैं।
ऐसे में यदि फिजेन्ट्री बनती तो चिड़ियाघर का आकर्षण और बढ़ सकता था। खासकर हिमाचल के राज्य पक्षी जजुराना और मोनाल जैसे पक्षियों को देखने के लिए पर्यटकों को एक नया अनुभव मिलता।
रिवालसर की धार्मिक पहचान के साथ यदि यहां दुर्लभ हिमाचली पक्षियों की फिजेन्ट्री भी विकसित होती तो यह क्षेत्र धार्मिक पर्यटन, प्रकृति पर्यटन और वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से और महत्वपूर्ण बन सकता था।
सराहन और मनाली की तर्ज पर विकसित होनी थी फिजेन्ट्री
वर्ष 2021 में तैयार प्रस्ताव में सराहन और मनाली की तर्ज पर रिवालसर में फिजेन्ट्री विकसित करने की योजना थी। हिमाचल में सराहन, चैल और मनाली में फिजेन्ट्री संचालित हैं, जहां दुर्लभ पक्षियों के संरक्षण और प्रजनन से जुड़ी गतिविधियां होती हैं।
इसी तर्ज पर मंडी जिले में रिवालसर को फिजेन्ट्री देने की कवायद शुरू हुई थी। योजना सिरे चढ़ती तो रिवालसर चिड़ियाघर में वन्यजीवों के साथ हिमाचल के दुर्लभ पक्षियों की अलग दुनिया भी पर्यटकों को देखने को मिलती।
रिवालसर की धार्मिक विरासत को देखते हुए यह परियोजना यहां के पर्यटन को एक अलग पहचान देने वाली साबित हो सकती थी। लेकिन चार साल बाद भी यह संभावना कागजों से आगे नहीं बढ़ सकी।
चार साल बाद भी सेंट्रल जू अथॉरिटी की मंजूरी का इंतजार
फिजेन्ट्री को लेकर अब विभाग का कहना है कि प्रस्ताव सेंट्रल जू अथॉरिटी को भेजा गया है और फिलहाल मंजूरी लंबित है।
डीएफओ वाइल्ड कुल्लू राजेश शर्मा ने कहा, “रिवालसर चिड़ियाघर की फिजेन्ट्री को लेकर सेंट्रल जू अथॉरिटी को गई प्रपोजल अभी लंबित है। जैसे ही मंजूरी मिलती है तो फिजेन्ट्री पर काम शुरू किया जाएगा।”
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि 2021 में जिस योजना के जरिए रिवालसर में जजुराना और मोनाल समेत दुर्लभ पक्षियों का संसार बसाने का सपना देखा गया था, वह आखिर कब फाइलों से निकलकर जमीन पर आएगा।
एक ओर रिवालसर अपनी हिंदू, बौद्ध और सिख आस्था की विरासत के कारण विशेष पहचान रखता है, वहीं दूसरी ओर यहां का चिड़ियाघर पर्यटन का आधार पहले से मौजूद है। ऐसे में फिजेन्ट्री की योजना पूरी होने पर रिवालसर की पहचान को एक नया आयाम मिल सकता है। फिलहाल जजुराना के कलरव और मोनाल के दीदार का इंतजार जारी है।
Akhil Mahajan