मौत के बाद भी दुनिया देख रही आंखें; करनाल के सब-इंस्पेक्टर की अनोखी मुहिम ने रोशन की कई जिंदगियां

करनाल के उप निरीक्षक डॉ. अशोक वर्मा ने 35 साल पहले नेत्रदान का संकल्प लिया। परिवार भी जुड़ा और अब 100 से अधिक लोगों को प्रेरित कर चुके हैं

मौत के बाद भी दुनिया देख रही आंखें; करनाल के सब-इंस्पेक्टर की अनोखी मुहिम ने रोशन की कई जिंदगियां

35 साल पहले लिया नेत्रदान का संकल्प, अब परिवार भी बना जागरूकता की मिसाल
दो भाइयों की मृत्यु के बाद परिवार ने कराया नेत्रदान, सामाजिक जिम्मेदारी को मिली मजबूती
डॉ. अशोक वर्मा अब तक 100 से अधिक लोगों को नेत्रदान के लिए प्रेरित कर चुके हैं


मृत्यु के बाद भी किसी के काम आने की सोच को करनाल के उप निरीक्षक डॉ. अशोक कुमार वर्मा ने करीब 35 साल पहले अपने जीवन का संकल्प बनाया था। उस समय उन्होंने नेत्र संबंधी उपचार के लिए अस्पताल जाने के दौरान नेत्रदान के महत्व के बारे में जाना और अपना फार्म भरकर नेत्रदान का संकल्प लिया।

वर्ष 1989-90 के आसपास लिया गया यह फैसला अब केवल डॉ. अशोक वर्मा तक सीमित नहीं है। धीरे-धीरे उनकी सोच ने पूरे परिवार को प्रभावित किया और आज उनकी पत्नी, मां और भाइयों समेत परिवार के कई सदस्यों ने भी नेत्रदान के फार्म भरे हुए हैं। परिवार ने इसे किसी एक व्यक्ति का व्यक्तिगत फैसला न मानकर सामूहिक सामाजिक संकल्प का रूप दे दिया है।

डॉ. अशोक वर्मा ने बाद में देहदान का संकल्प भी लिया। उनका मानना है कि मृत्यु के बाद भी किसी व्यक्ति की आंखें किसी दूसरे के जीवन में रोशनी ला सकती हैं। इसी सोच को वह लगातार लोगों तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं।

बड़े भाई की मृत्यु पर पहली बार सामने आई संकल्प की असली परीक्षा

डॉ. अशोक वर्मा के बड़े भाई यशवंत वर्मा की 1 अक्टूबर 2017 को मृत्यु हुई। उस समय परिवार ने उनका नेत्रदान कराने का फैसला लिया। इसके बाद छोटे भाई विनोद वर्मा की 26 अगस्त 2025 को मृत्यु हुई तो उनके भी नेत्रदान कराए गए।

दोनों भाइयों के नेत्रदान के बाद परिवार में इस सोच को और मजबूती मिली कि मृत्यु के बाद भी किसी की आंखें किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन में रोशनी ला सकती हैं। परिवार के लिए यह केवल संकल्प नहीं रहा, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी का हिस्सा बन गया।

पत्नी, मां और भाइयों ने भी भरा नेत्रदान का फार्म

अब डॉ. अशोक वर्मा के परिवार के कई सदस्य इस संकल्प में उनके साथ हैं। उनकी पत्नी कृष्णा वर्मा, माता मूर्ति देवी और उनके दो भाइयों के नाम से भी नेत्रदान के फार्म भरे गए हैं।

परिवार में नेत्रदान को लेकर जागरूकता अब अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। कृष्णा वर्मा का कहना है कि परिवार में बनी यह जागरूकता आगे भी जारी रहनी चाहिए, ताकि नेत्रदान के प्रति लोगों की सोच और मजबूत हो सके।

परिवार ने नेत्रदान को मृत्यु के बाद भी किसी जरूरतमंद के काम आने का माध्यम माना है। इसी सोच के साथ उन्होंने भी नेत्रदान का फार्म भरा है।

मां मूर्ति देवी बोलीं- नेत्रदान के लिए उम्र नहीं, इच्छाशक्ति जरूरी

मूर्ति देवी का कहना है कि नेत्रदान की कोई उम्र सीमा नहीं होती, बल्कि इसके लिए इच्छाशक्ति जरूरी है। परिवार में नेत्रदान को लेकर बनी सकारात्मक सोच ने उन्हें भी इस सामाजिक संकल्प का हिस्सा बनने के लिए प्रेरित किया।

इस तरह एक व्यक्ति के करीब 35 साल पहले लिए गए संकल्प ने धीरे-धीरे परिवार के दूसरे सदस्यों को भी इससे जोड़ दिया।

100 से अधिक लोगों को नेत्रदान के लिए प्रेरित कर चुके हैं डॉ. अशोक

डॉ. अशोक कुमार वर्मा का यह प्रयास अब परिवार तक सीमित नहीं रहा। वह बताते हैं कि वह स्वयं 100 से अधिक लोगों के नेत्रदान के फार्म भरवा चुके हैं

करनाल और कुरुक्षेत्र क्षेत्र में वह लोगों को नेत्रदान के लिए प्रेरित करते हैं। इस अभियान के दौरान कई परिवार उनसे फोन पर भी संपर्क करते हैं। लोगों को नेत्रदान के महत्व के बारे में समझाने और उन्हें संकल्प लेने के लिए प्रेरित करने का उनका प्रयास अब व्यक्तिगत संकल्प से आगे बढ़कर जनजागरूकता का रूप ले चुका है।

करीब 35 वर्ष पहले अस्पताल में नेत्रदान के महत्व की जानकारी मिलने के बाद शुरू हुआ डॉ. अशोक वर्मा का यह सफर आज उनके परिवार के सामूहिक संकल्प और समाज के अन्य लोगों को प्रेरित करने तक पहुंच गया है।