जलती चिताओं की भस्म से होली: नरमुंड, चश्मा लगाकर आए संन्यासी, डमरू की गूंज से गूंजी काशी

वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर मसाने की होली मनाई गई, जहां नागा साधुओं ने चिता की राख से भस्म होली खेली। इस अनूठे आयोजन में 3 लाख से अधिक श्रद्धालु और पर्यटक शामिल हुए।

जलती चिताओं  की भस्म से होली: नरमुंड, चश्मा लगाकर आए संन्यासी, डमरू की गूंज से गूंजी काशी

■ जलती चिताओं के बीच नागा साधुओं की भस्म होली
■ डमरू की गूंज पर बाबा मसान नाथ को अर्पित हुई राख और गुलाल
■ 3 लाख से ज्यादा श्रद्धालु और पर्यटक काशी पहुंचे

आस्था और अध्यात्म की नगरी वाराणसी में शनिवार को एक अनोखा और रहस्यमय दृश्य देखने को मिला। पवित्र मणिकर्णिका घाट पर ‘मसाने की होली’ खेली गई, जहां जलती चिताओं के बीच नागा साधु-संन्यासियों ने भस्म और रंग-गुलाल से होली का उत्सव मनाया।

घाट की गलियों में जबदस्त भीड़ है। हर तरफ चिता भस्म उड़ रही है। डमरू की धुन से पूरा घाट गूंज रहा है।

घाट पर डमरू की थाप गूंजती रही और साधु-संन्यासी गले में नरमुंडों की माला धारण किए नृत्य करते दिखाई दिए। सबसे पहले बाबा मसान नाथ का पूजन किया गया, उन्हें भस्म, अबीर और गुलाल अर्पित किए गए। इसके बाद चिता की राख से होली खेलने की परंपरा निभाई गई।

नागा संन्यासी जलती चिता के बुझने का इंतजार करते दिखाई दिए। बुझने के बाद इसी राख से होली खेली।

इस अनूठे आयोजन के दौरान घाट पर अंतिम संस्कार की प्रक्रियाएं भी जारी रहीं। जश्न और श्मशान का यह संगम काशी की सदियों पुरानी परंपरा का हिस्सा है। आमतौर पर जिससे लोग दूरी बनाते हैं, उसी चिता की राख को यहां श्रद्धा और भक्ति के प्रतीक के रूप में अपनाया जाता है।

मणिकर्णिका घाट पर संन्यासियों ने पूरे शरीर में चिता भस्म को लगाया। इसके बाद हर-हर महादेव के जयकारे लगाए।

इस अवसर पर देश-विदेश से आए पर्यटक भी शामिल हुए। अनुमान है कि मसाने की होली के लिए 3 लाख से अधिक श्रद्धालु और पर्यटक काशी पहुंचे। विदेशी पर्यटक भी रंग और राख में सराबोर होकर इस अनूठी परंपरा का अनुभव करते नजर आए।

मणिकर्णिका घाट पर मसाने की होली में नागा साधु नरमुंड पहने हुए नजर आ रहे हैं।

नागा संन्यासियों ने त्रिशूल लहराकर नमः पार्वती…हर-हर महादेव और बम-बम भोले के जयकारे लगाए।

रंग और चिता की राख में सराबोर होकर विदेशी पर्यटक झूम रहे हैं।

चिता भस्म से लिपटे नागा संन्यासी डमरू बजाते हुए नजर आए।

साधुओं ने शिवभक्तों के चेहरे पर बारी-बारी से चिता की राख लगवाई। इसके बाद एक-दूसरे पर जमकर भस्म उड़ाई।