₹190 करोड़ के GST घोटाले का आरोपी बरी, विभाग 20 से अधिक तारीखों पर भी नहीं दे पाया सबूत

गुरुग्राम कोर्ट ने 190 करोड़ रुपये के कथित GST घोटाले में मोहम्मद शमशाद सैफी को बरी किया। विभाग 20 से अधिक तारीखों के बाद भी ठोस सबूत पेश नहीं कर सका।

₹190 करोड़ के GST घोटाले का आरोपी बरी, विभाग 20 से अधिक तारीखों पर भी नहीं दे पाया सबूत

गुरुग्राम कोर्ट ने ₹190 करोड़ के कथित GST घोटाले के आरोपी को किया बरी

➤ 20 से अधिक तारीखों के बावजूद विभाग पेश नहीं कर पाया ठोस सबूत और गवाह

➤ जज बोले- केवल गिरफ्तारी और आरोपों से किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता

गुरुग्राम। गुरुग्राम की अदालत ने 190 करोड़ रुपये के कथित GST इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) घोटाले में मुख्य आरोपी मोहम्मद शमशाद सैफी को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM) मनीष कुमार की अदालत ने पाया कि गुड्स एंड सर्विस टैक्स इंटेलिजेंस विभाग आरोपी के खिलाफ आरोपों को साबित करने के लिए ठोस दस्तावेजी और मौखिक साक्ष्य पेश करने में नाकाम रहा।

अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि केवल विभाग के दावों या किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी के आधार पर उसे दोषी नहीं माना जा सकता। अभियोजन पक्ष को आरोपों के समर्थन में पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत करने होते हैं। इस मामले में विभाग को कई अवसर दिए जाने के बावजूद वह अपने आरोपों को कानूनी रूप से साबित नहीं कर सका।

यह मामला गुड्स एंड सर्विस टैक्स इंटेलिजेंस (जीएसटीआई) की गुरुग्राम जोनल यूनिट की ओर से दर्ज कराया गया था। विभाग ने दिल्ली के लक्ष्मी नगर निवासी मोहम्मद शमशाद सैफी पर देशभर में फर्जी और गैर-मौजूद कंपनियां बनाने वाले कथित सिंडिकेट में शामिल होने का आरोप लगाया था।

190 करोड़ रुपये का इनपुट टैक्स क्रेडिट लेने का था आरोप

विभाग की शिकायत के अनुसार, इस मामले में मैसर्स टेक्नो इलेक्ट्रिकल एंड सेल्स और मैसर्स लता सेल्स जैसी कथित फर्जी फर्म बनाई गई थीं। आरोप था कि इन फर्मों का इस्तेमाल वास्तविक माल या सेवाओं की आपूर्ति किए बिना गुड्स-लेस इनवॉइस यानी फर्जी बिल जारी करने के लिए किया जाता था।

शिकायत में कहा गया था कि इन बिलों के माध्यम से विभिन्न संस्थाओं को लगभग 190 करोड़ रुपये का इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) अवैध रूप से ट्रांसफर किया गया। विभाग का आरोप था कि इस तरीके से सरकारी राजस्व को भारी नुकसान पहुंचाया गया।

इस मामले में मोहम्मद शमशाद सैफी को 9 अक्टूबर 2020 को CGST अधिनियम की धारा 69 के तहत गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी के बाद उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था।

हालांकि, अदालत में सुनवाई के दौरान विभाग उन आरोपों के समर्थन में पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर पाया, जिनके आधार पर यह मामला दर्ज किया गया था। अदालत ने इसी आधार पर आरोपी को राहत देते हुए सभी आरोपों से बरी कर दिया।

पांच गवाहों को पेश नहीं कर पाया विभाग

मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से गवाहों को पेश करने में भी गंभीर कमी सामने आई। शिकायतकर्ता विभाग ने अदालत में कुल छह गवाहों की सूची दी थी। इनमें जांच, छापेमारी और बयान दर्ज करने की प्रक्रिया से जुड़े अधिकारी शामिल थे।

इसके बावजूद विभाग पूरे मामले में केवल एक गवाह, वरिष्ठ खुफिया अधिकारी रामाशीष शर्मा, को ही अदालत के सामने पेश कर सका। सूची में शामिल बाकी पांच गवाहों को अदालत में पेश नहीं किया गया।

इससे विभाग के आरोपों की पुष्टि के लिए उपलब्ध मौखिक साक्ष्य सीमित रह गए। अदालत के सामने विभाग की ओर से आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त गवाही नहीं आ सकी।

एकमात्र गवाह की गवाही में भी सामने आई कमी

अदालत में पेश हुए विभाग के एकमात्र गवाह रामाशीष शर्मा की गवाही भी अभियोजन पक्ष के लिए पर्याप्त साबित नहीं हुई। क्रॉस-एग्जामिनेशन के दौरान उन्होंने स्वीकार किया कि उन्हें व्यक्तिगत रूप से इस मामले में शामिल कथित फर्जी राशि की सटीक जानकारी नहीं थी।

उन्होंने यह भी माना कि वह आरोपी के ठिकानों या कथित फर्जी कंपनियों पर की गई छापेमारी अथवा तलाशी की किसी भी टीम का हिस्सा नहीं थे।

इस स्थिति में गवाह की गवाही कथित घोटाले की राशि और जांच से जुड़े अहम पहलुओं को प्रत्यक्ष रूप से साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं रही। अदालत ने अपने फैसले में एकमात्र गवाह की गवाही को अधूरा, अपर्याप्त और सुनी-सुनाई बातों पर आधारित माना।

करोड़ों के मामले में दस्तावेजी सबूत भी नहीं हुए साबित

इस मामले में अभियोजन पक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी दस्तावेजी साक्ष्यों को लेकर सामने आई। अदालत में कथित 190 करोड़ रुपये के घोटाले को साबित करने के लिए कोई भी प्राथमिक दस्तावेजी साक्ष्य साबित नहीं किया जा सका।

सुनवाई के दौरान न तो कोई पंचनामा पेश किया गया, न बैंक स्टेटमेंट और न ही जीएसटी रिटर्न या इनवॉइस की प्रतियां अदालत के सामने प्रस्तुत की जा सकीं। विभाग ने केवल शिकायत दर्ज करने से संबंधित आधिकारिक अथॉराइजेशन लेटर पेश किया था।

अदालत के अनुसार, केवल शिकायत दर्ज करने की अनुमति से आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोप साबित नहीं होते। इसके लिए आरोपों के समर्थन में ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य जरूरी होते हैं। ऐसे में विभाग का पक्ष अदालत में कमजोर पड़ गया।

20 से अधिक तारीखें मिलने के बावजूद सबूत पूरे नहीं कर सका विभाग

अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट मनीष कुमार की अदालत ने मामले में विभाग को सबूत पेश करने के लिए पर्याप्त अवसर दिए जाने का उल्लेख किया। रिकॉर्ड के मुताबिक, 29 मई 2023 से 13 अक्टूबर 2025 के बीच 20 से अधिक तारीखें दी गईं, ताकि विभाग आरोप तय होने से पहले के चरण में अपने साक्ष्य पेश कर सके।

इसके बावजूद विभाग गवाही और साक्ष्य की प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाया। आखिरकार अक्टूबर 2025 में अदालत ने विभाग की गवाही पेश करने का अवसर बंद कर दिया।

अदालत ने इस घटनाक्रम को मामले की सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण माना। इतने लंबे समय और कई अवसरों के बाद भी विभाग आरोपों को साबित करने के लिए आवश्यक साक्ष्य पेश नहीं कर सका।

अंतिम बहस के दौरान भी कोर्ट में मौजूद नहीं रहा विभाग का प्रतिनिधि

मामले की अंतिम बहस के दौरान भी विभाग की ओर से अदालत में कोई वकील या प्रतिनिधि उपस्थित नहीं हुआ। फैसले में दर्ज जानकारी के अनुसार, 12 अक्टूबर, 16 अक्टूबर और 17 अक्टूबर 2026 को विभाग की ओर से कोई प्रतिनिधि अदालत में पेश नहीं हुआ।

अदालत ने विभाग के इस रवैये पर सवाल उठाए और कहा कि इससे मामले के प्रति गंभीरता की कमी दिखाई देती है। अभियोजन पक्ष की ओर से गवाहों और दस्तावेजों को पेश नहीं कर पाना तथा अंतिम बहस के दौरान प्रतिनिधि की अनुपस्थिति मामले के निपटारे में महत्वपूर्ण रही।

अदालत ने कहा- ठोस साक्ष्य के बिना आरोप तय नहीं किए जा सकते

फैसला सुनाते हुए जज मनीष कुमार ने कहा कि मामले में पेश एकमात्र गवाह की गवाही अधूरी और अपर्याप्त थी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पांच साल तक की सजा वाले गंभीर आर्थिक अपराध में भी ठोस मौखिक या दस्तावेजी साक्ष्य के बिना आरोप तय नहीं किए जा सकते।

अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनाने के लिए जरूरी साक्ष्य प्रस्तुत करने में विफल रहा। केवल विभाग के आरोप और गिरफ्तारी इस बात का पर्याप्त आधार नहीं हैं कि आरोपी के खिलाफ अपराध साबित हो गया है।

इसी आधार पर अदालत ने मोहम्मद शमशाद सैफी को सभी आरोपों से बरी कर दिया। साथ ही उनके बेल बॉन्ड भी डिस्चार्ज कर दिए गए।