हरियाणा की राजनीति से राजभवन तक पहुंचीं सुधा यादव, कर्नाटक के राज्यपाल पद की मिली जिम्मेदारी
हरियाणा की पूर्व सांसद डॉ. सुधा यादव कर्नाटक की राज्यपाल नियुक्त हुई हैं। कारगिल युद्ध के बाद राजनीति में प्रवेश, 1999 की जीत और भाजपा संगठन में उनकी भूमिका जानें।
➤ कारगिल युद्ध में पति की शहादत के बाद 1999 में शुरू हुआ था राजनीतिक सफर
➤ महेंद्रगढ़ सीट से राव इंद्रजीत सिंह को हराकर पहली बार बनी थीं सांसद
➤ चुनावी हार के बाद भी भाजपा संगठन में बनी रही भूमिका, अब कर्नाटक के राज्यपाल पद पर नियुक्ति
चंडीगढ़। हरियाणा भाजपा की वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद डॉ. सुधा यादव को कर्नाटक का नया राज्यपाल नियुक्त किए जाने की खबर ने उन्हें एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है। उनका सफर निजी जीवन के कठिन दौर से शुरू होकर संसद और भाजपा के संगठनात्मक ढांचे तक पहुंचा। कारगिल युद्ध के दौरान उनके पति सुखबीर सिंह यादव, जो सीमा सुरक्षा बल में डिप्टी कमांडेंट थे, शहीद हो गए थे। इसके बाद परिवार और बच्चों की जिम्मेदारी संभालते हुए सुधा यादव ने राजनीति में कदम रखा। वर्ष 1999 में उन्होंने महेंद्रगढ़ लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राव इंद्रजीत सिंह को हराकर संसद पहुंचीं। चुनावी राजनीति में बाद के वर्षों में उन्हें हार का सामना भी करना पड़ा, लेकिन भाजपा संगठन में उनकी भूमिका बनी रही। अब कर्नाटक के राज्यपाल पद पर नियुक्ति के साथ उनके राजनीतिक सफर का एक नया अध्याय जुड़ने की बात कही जा रही है।
कारगिल युद्ध में पति की शहादत के बाद राजनीति में आईं
डॉ. सुधा यादव के राजनीतिक जीवन की शुरुआत वर्ष 1999 में हुई। कारगिल युद्ध के दौरान उनके पति सुखबीर सिंह यादव शहीद हो गए थे। पति को खोने के बाद उनके सामने बच्चों की परवरिश और परिवार को संभालने की जिम्मेदारी थी। ऐसे समय में राजनीति में प्रवेश करना उनके लिए आसान फैसला नहीं था।
भाजपा नेतृत्व ने जब महेंद्रगढ़ लोकसभा सीट से उन्हें चुनाव लड़ने का प्रस्ताव दिया, तब शुरुआत में उन्होंने इससे इनकार कर दिया था। परिवार की जिम्मेदारियों के कारण वह चुनाव लड़ने को लेकर तैयार नहीं थीं। बाद में पार्टी नेताओं के समझाने पर उन्होंने चुनाव लड़ने का फैसला किया।
1999 में राव इंद्रजीत सिंह को हराकर पहुंचीं संसद
वर्ष 1999 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को महेंद्रगढ़ सीट पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राव इंद्रजीत सिंह के सामने एक मजबूत उम्मीदवार की तलाश थी। उस समय पार्टी के कई नेताओं के नाम पर चर्चा हो रही थी। उपलब्ध खबर के अनुसार, तत्कालीन भाजपा प्रदेश प्रभारी नरेंद्र मोदी ने नेतृत्व के सामने सुधा यादव का नाम रखा था।
शुरुआत में सुधा यादव चुनाव लड़ने के लिए तैयार नहीं थीं। बाद में नरेंद्र मोदी से बातचीत और पार्टी नेतृत्व के समझाने के बाद वह राजी हुईं। चुनाव में उन्होंने राव इंद्रजीत सिंह को हराकर जीत दर्ज की और पहली बार लोकसभा पहुंचीं। इस जीत ने उन्हें हरियाणा की राजनीति में पहचान दिलाई।
लगातार दो चुनाव हारीं, लेकिन संगठन में बनी रही अहम भूमिका
1999 में लोकसभा पहुंचने के बाद सुधा यादव ने वर्ष 2004 में महेंद्रगढ़ और वर्ष 2009 में गुरुग्राम से लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन दोनों बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद भाजपा संगठन में उनकी भूमिका खत्म नहीं हुई। वह पार्टी के विभिन्न संगठनात्मक दायित्वों से जुड़ी रहीं और वर्ष 2015 में भाजपा के ओबीसी मोर्चा की राष्ट्रीय प्रभारी बनाई गईं।
वर्ष 2019 में उन्हें राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग का सदस्य बनाया गया। इसके बाद अगस्त 2022 में भाजपा के संसदीय बोर्ड में शामिल किया गया। वह इस बोर्ड में शामिल होने वाली सुषमा स्वराज के बाद दूसरी महिला नेता बनीं। पार्टी के शीर्ष संगठनात्मक ढांचे में उनकी मौजूदगी को उनके लंबे राजनीतिक अनुभव और संगठन से जुड़ाव के रूप में देखा गया।
बेटे को भी भाजपा की राष्ट्रीय टीम में मिली जिम्मेदारी
सुधा यादव के परिवार का नाम एक बार फिर राजनीतिक चर्चा में आया, जब उनके बेटे को भाजपा की राष्ट्रीय टीम में मीडिया सह-संयोजक की जिम्मेदारी मिलने की खबर सामने आई। अब सुधा यादव को कर्नाटक का राज्यपाल नियुक्त किए जाने से परिवार की राजनीतिक चर्चा और बढ़ गई है।
राष्ट्रपति भवन की ओर से 12 अक्टूबर 2026 को जारी नियुक्तियों की घोषणा में डॉ. सुधा यादव को कर्नाटक का राज्यपाल बनाए जाने की पुष्टि की गई। यह नियुक्ति उस तारीख से प्रभावी होगी, जब वह अपने पद का कार्यभार संभालेंगी।
हरियाणा की राजनीति में लंबा रहा है जुड़ाव
डॉ. सुधा यादव का राजनीतिक सफर हरियाणा से शुरू हुआ और भाजपा के संगठनात्मक ढांचे में उनकी भूमिका लगातार बनी रही। कारगिल युद्ध में पति को खोने के बाद राजनीति में प्रवेश, 1999 में लोकसभा चुनाव में जीत, बाद के चुनावों में हार और फिर पार्टी के महत्वपूर्ण पदों तक पहुंचना उनके सार्वजनिक जीवन के प्रमुख पड़ाव रहे हैं।
कर्नाटक के राज्यपाल पद पर नियुक्ति के साथ अब उनकी भूमिका राज्य की संवैधानिक व्यवस्था से जुड़ने जा रही है। राज्यपाल के तौर पर उनके कार्यभार संभालने के बाद उनकी नई जिम्मेदारी औपचारिक रूप से शुरू होगी।
Akhil Mahajan