मन रूपी रावण का अंत ही सच्चा विजयादशमी संदेश, समालखा में श्रीराम कथा के अंतिम दिन साध्वी प्रवीणा भारती ने समझाया भक्ति का महत्व
समालखा में श्रीराम कथा के अंतिम दिन साध्वी प्रवीणा भारती ने मन रूपी रावण, भक्ति, सद्बुद्धि और भरत जी के प्रभु श्रीराम के प्रति समर्पण का संदेश दिया।
➤ बाहर के रावण के साथ मन के रावण को जलाना भी जरूरी
➤ भक्ति से जुड़ा मन परमात्मा का पावन मंदिर बन जाता है
➤ भरत जी की भक्ति और प्रभु श्रीराम के प्रति समर्पण की कथा ने भावुक किया
समालखा के श्री आदर्श ड्रामाटिक क्लब में आयोजित श्रीराम कथा के नवम एवं अंतिम दिवस पर दिव्या ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से श्रद्धालुओं को मन, बुद्धि और भक्ति का गहरा संदेश दिया गया। सर्वश्रेष्ठ आशुतोष जी की साध्वी शिष्या साध्वी प्रवीणा भारती ने भक्तों को संबोधित करते हुए कहा कि त्रेतायुग में एक रावण के अंत के साथ रामराज्य की स्थापना हुई थी, लेकिन कलियुग में मनुष्य का अपना मन ही रावण का रूप ले चुका है। आज लोग दशहरे पर रावण के पुतले जलाते हैं, लेकिन अपने भीतर मौजूद मन रूपी रावण को समाप्त करने का प्रयास नहीं करते। उन्होंने कहा कि यही मन इंसान को बुरे से बुरा कर्म करने के लिए प्रेरित करता है और जब यही मन परमात्मा के चरणों से जुड़ जाता है तो वह परमात्मा का पावन मंदिर बन जाता है।
साध्वी प्रवीणा भारती ने कहा कि मनुष्य के जीवन में बाहरी बुराइयों को समाप्त करने के साथ-साथ भीतर की बुराइयों पर विजय प्राप्त करना भी जरूरी है। दशहरे का वास्तविक संदेश केवल रावण के पुतले का दहन नहीं, बल्कि अहंकार, मोह, क्रोध और गलत प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त करना है। उन्होंने कहा कि मनुष्य जब अपने भीतर झांककर अपनी कमियों को पहचानता है और उन्हें दूर करने का प्रयास करता है, तभी वह वास्तविक अर्थों में धर्म और सद्मार्ग की ओर बढ़ता है।
रावण को कई लोगों ने समझाया, लेकिन नहीं बदली उसकी बुद्धि
साध्वी जी ने रामायण के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि भक्त हनुमान जी ने रावण को कई तरह से समझाने का प्रयास किया, लेकिन रावण ने उनकी बात को स्वीकार नहीं किया। इसके बाद विभीषण जी ने भी रावण को समझाने का प्रयास किया, लेकिन रावण ने उन्हें कुलद्रोही कहकर राज्य से निष्कासित कर दिया।
उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि जब मनुष्य की मति भ्रष्ट हो जाती है तो उसे अपने प्रिय व्यक्ति की कही हुई सही बात भी समझ में नहीं आती। इसी भाव को समझाते हुए उन्होंने कहा कि विनाशकाल में बुद्धि विपरीत हो जाती है। रावण के सामने भी अनेक अवसर आए, लेकिन अहंकार के कारण उसने किसी की बात नहीं मानी।
साध्वी प्रवीणा भारती ने बताया कि प्रभु श्रीराम ने भी रावण को समझाने के लिए हनुमान जी और अंगद जी को भेजा, लेकिन रावण अपनी हठ और अहंकार से बाहर नहीं निकल सका। अंततः प्रभु श्रीराम के हाथों उसका वध हुआ और माता सीता को उसकी कैद से मुक्ति मिली। रावण के अंत के साथ उसके अहंकार का भी अंत हुआ और उसके कुल को भी भारी विनाश का सामना करना पड़ा।
जब समझ न आए तो संतों की शरण जरूरी
साध्वी जी ने कहा कि जब मनुष्य किसी परिस्थिति में सही और गलत का निर्णय नहीं कर पाता और उसकी बुद्धि काम करना बंद कर देती है, तब उसे साधु-संतों की शरण ग्रहण करनी चाहिए। संतों का मार्गदर्शन मनुष्य को सही दिशा दिखा सकता है।
उन्होंने कहा कि जब मनुष्य अपनी जिद, अहंकार और गलत सोच में फंस जाता है तो वह न केवल अपना नुकसान करता है, बल्कि अपने परिवार और आसपास के लोगों के हित के बारे में भी सही ढंग से विचार नहीं कर पाता। इसलिए जीवन में सही मार्गदर्शन और आध्यात्मिक चिंतन का विशेष महत्व है।
भरत जी की भक्ति की भी सुनाई कथा
श्रीराम कथा के अंतिम दिवस पर साध्वी प्रवीणा भारती ने भरत जी की प्रभु श्रीराम के प्रति अटूट भक्ति और समर्पण का प्रसंग भी सुनाया। उन्होंने बताया कि 14 वर्षों तक भरत जी ने राज्य का कार्यभार संभाला, लेकिन उनका मन प्रभु श्रीराम के प्रति ही समर्पित रहा।
कथा के अनुसार, प्रभु श्रीराम ने अयोध्या लौटने से पहले यह जानने के लिए कि भरत जी आज भी उनसे उतना ही प्रेम करते हैं या नहीं, हनुमान जी को उनकी कुटिया की ओर भेजा। जब हनुमान जी वहां पहुंचे तो उन्होंने देखा कि 14 वर्ष पूरे हो चुके थे और संध्या का समय निकट था।
कथा के अनुसार, भरत जी ने अपने हाथों से चिता तैयार कर रखी थी। उनका संकल्प था कि यदि प्रभु श्रीराम निर्धारित समय पर अयोध्या नहीं लौटे तो वे अपने प्राण त्याग देंगे। भरत जी की यह स्थिति उनके भीतर प्रभु श्रीराम के प्रति मौजूद अटूट प्रेम और समर्पण को दर्शाती है।
भक्ति के बिना जीवन को बताया अधूरा
साध्वी जी ने संत-महापुरुषों के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि भक्त के जीवन में भक्ति और भगवान का प्रेम नहीं है तो उसका जीवन ठूंठ वृक्ष के समान हो जाता है। जिस प्रकार ठूंठ वृक्ष न किसी को फल दे सकता है और न छाया, उसी प्रकार भगवान के प्रेम और भक्ति से रहित जीवन भी समाज और परिवार के लिए उपयोगी नहीं रह जाता।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि दशहरे के अवसर पर केवल बाहर के रावण का दहन न करें, बल्कि अपने भीतर मौजूद अहंकार और नकारात्मक प्रवृत्तियों को पहचानकर उन्हें समाप्त करने का संकल्प लें। कथा के अंतिम दिवस पर रामायण के इन प्रसंगों के माध्यम से श्रद्धालुओं को भक्ति, समर्पण, सद्बुद्धि और आत्मचिंतन का संदेश दिया गया।
Akhil Mahajan