ताऊ नरपत सिंह का ठाडा फैसला: 'जब हाथ-पैर चालैं, तौ मुफ्त की पेंशन क्यूं?' 80 की उम्र में आत्मनिर्भरता की मिसाल! बुढ़ापा पेंशन ठुकराई

पंचकूला के 80 वर्षीय किसान नरपत सिंह राणा ने बुढ़ापा पेंशन नहीं लेकर आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश की और मेहनत को जीवन की सबसे बड़ी पूंजी बताया।

ताऊ नरपत सिंह का ठाडा फैसला: 'जब हाथ-पैर चालैं, तौ मुफ्त की पेंशन क्यूं?' 80 की उम्र में आत्मनिर्भरता की मिसाल! बुढ़ापा पेंशन ठुकराई

➤ 80 साल की उम्र में भी मेहनत को मानते हैं अपनी सबसे बड़ी पूंजी
➤ बुढ़ापा पेंशन के हकदार होने के बावजूद आज तक नहीं लिया लाभ
➤ नरपत सिंह बोले- जब तक शरीर साथ दे, अपनी मेहनत से चलाना चाहिए जीवन


पंचकूला के गांव बतौड़ निवासी 80 वर्षीय किसान नरपत सिंह राणा ने बुढ़ापे को मजबूरी नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता के साथ जीने का उदाहरण पेश किया है। जिस उम्र में आमतौर पर लोग सरकारी सहायता और परिवार के सहारे की उम्मीद करते हैं, उस उम्र में भी नरपत सिंह अपनी मेहनत को ही अपनी सबसे बड़ी पूंजी मानते हैं। सरकार की ओर से मिलने वाली बुढ़ापा पेंशन के पात्र होने के बावजूद उन्होंने आज तक इसका लाभ नहीं लिया। उनका कहना है कि जब तक शरीर उनका साथ दे रहा है और वह मेहनत करके अपनी जरूरतें पूरी कर सकते हैं, तब तक उन्हें किसी सरकारी सहायता की आवश्यकता महसूस नहीं होती।

नरपत सिंह की यह सोच अब गांव और आसपास के क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी हुई है। 80 वर्ष की उम्र में भी मेहनत के प्रति उनका भरोसा और अपने पैरों पर खड़े रहने की इच्छा लोगों को खास तौर पर प्रभावित कर रही है। उनका मानना है कि अपनी मेहनत से कमाई गई रकम से जीवन चलाना आत्मसम्मान की बात है और जब इंसान अपनी जरूरतें खुद पूरी करने की स्थिति में हो तो उसे दूसरों पर निर्भर नहीं होना चाहिए।

नरपत सिंह का कहना है कि उम्र बढ़ने के साथ शरीर की क्षमता जरूर पहले जैसी नहीं रहती, लेकिन जब तक वह काम करने में सक्षम हैं, तब तक मेहनत करना ही उनकी प्राथमिकता है। उनके लिए आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक स्थिति से जुड़ी बात नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और स्वाभिमान से भी जुड़ी है।

हरियाणा में बुजुर्गों के लिए बुढ़ापा पेंशन एक महत्वपूर्ण सामाजिक सुरक्षा योजना है। प्रदेश में बड़ी संख्या में बुजुर्ग इस सहायता पर निर्भर हैं और जरूरतमंद परिवारों के लिए यह राशि उनके रोजमर्रा के खर्च में सहारा देती है। ऐसे समय में नरपत सिंह का फैसला किसी सरकारी योजना के विरोध के तौर पर नहीं देखा जा रहा है, बल्कि उन्होंने अपनी व्यक्तिगत जरूरत और आर्थिक स्थिति को देखते हुए पेंशन नहीं लेने का निर्णय किया है।

पूर्व सरपंच एवं समाजसेवी लक्ष्मण बतौड़ ने भी नरपत सिंह के फैसले को आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान से जोड़कर देखा। उनका कहना है कि बुढ़ापा पेंशन जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाएं उन बुजुर्गों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं, जिन्हें आर्थिक सहायता की जरूरत है। नरपत सिंह खुद मेहनत कर अपना जीवन चला रहे हैं, इसलिए उन्होंने पेंशन न लेने का फैसला किया है।

नरपत सिंह की कहानी इसलिए भी अलग है क्योंकि उन्होंने सरकारी सहायता को ठुकराने का फैसला किसी विरोध या नाराजगी के कारण नहीं किया, बल्कि उनका मानना है कि जिस व्यक्ति की जरूरतें उसकी अपनी मेहनत से पूरी हो रही हों, उसे सरकारी सहायता किसी अधिक जरूरतमंद व्यक्ति के काम आनी चाहिए।

उनकी सोच का एक पहलू यह भी है कि सरकारी योजनाओं का उद्देश्य उन लोगों तक सहायता पहुंचाना है, जिन्हें वास्तव में इसकी जरूरत है। इसी भावना के चलते नरपत सिंह ने अपने लिए पेंशन लेने के बजाय अपनी मेहनत पर भरोसा बनाए रखा है।

हरियाणा में करीब 20 लाख 5000 बुजुर्ग बुढ़ापा पेंशन का लाभ ले रहे हैं। इनमें 10 लाख 44 हजार 69 पुरुष और 9 लाख 61 हजार 298 महिलाएं शामिल हैं। ऐसे में पंचकूला के नरपत सिंह की कहानी इन लाखों बुजुर्गों से अलग एक व्यक्तिगत उदाहरण के रूप में सामने आती है।

नरपत सिंह की उम्र भले ही 80 वर्ष हो चुकी है, लेकिन उनकी सोच में आज भी वही आत्मनिर्भरता दिखाई देती है, जिसे वह जीवन की सबसे बड़ी ताकत मानते हैं। उनकी कहानी यह संदेश देती है कि उम्र बढ़ने के साथ काम करने की क्षमता कम हो सकती है, लेकिन आत्मसम्मान और अपने पैरों पर खड़े रहने का जज्बा उम्र का मोहताज नहीं होता।

यह कहानी किसी योजना को सही या गलत साबित करने की नहीं, बल्कि एक ऐसे बुजुर्ग किसान के व्यक्तिगत फैसले की है, जिसने अपनी परिस्थितियों के अनुसार जीवन जीने का रास्ता चुना है। 80 वर्ष की उम्र में भी नरपत सिंह का मेहनत पर भरोसा और आत्मनिर्भर रहने का संकल्प निश्चित रूप से समाज में एक अलग संदेश छोड़ता है।