फांसी की सजा पर सुप्रीम कोर्ट ने खींची नई लकीर, जानिए , तभी दी जाएगी फांसी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फांसी की सजा तभी दी जा सकती है जब दोषी के सुधार की संभावना पूरी तरह खत्म हो। सिर्फ क्रूर अपराध से सुधार की संभावना खत्म नहीं होती।

फांसी की सजा पर सुप्रीम कोर्ट ने खींची नई लकीर, जानिए , तभी दी जाएगी फांसी

➤ सुधार की संभावना पूरी तरह खत्म होने पर ही फांसी की सजा
➤ सिर्फ बेहद क्रूर अपराध होने से सुधार की संभावना खत्म नहीं मानी जाएगी
➤ अपराध की गंभीरता के साथ दोषी के सुधार की संभावना भी देखना जरूरी


सुप्रीम कोर्ट ने मृत्युदंड को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि फांसी की सजा केवल उन्हीं मामलों में दी जा सकती है, जहां दोषी के सुधार की संभावना पूरी तरह खत्म हो चुकी हो। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी अपराध का बेहद क्रूर या वीभत्स होना अपने आप में यह मान लेने का आधार नहीं हो सकता कि दोषी के सुधार की कोई संभावना नहीं बची है। मृत्युदंड जैसे अंतिम और अपरिवर्तनीय दंड पर फैसला लेते समय दोषी के सुधार की संभावना को भी गंभीरता से देखना होगा।

सुप्रीम कोर्ट के इस रुख में अपराध की गंभीरता और दोषी के सुधार की संभावना के बीच अंतर को रेखांकित किया गया है। अदालत ने माना कि कोई अपराध कितना भी गंभीर, क्रूर या वीभत्स क्यों न हो, केवल उसकी भयावहता के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि दोषी में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है।

अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि मृत्युदंड तभी उचित हो सकता है, जब दोषी के सुधार की संभावना पूरी तरह समाप्त होने की स्थिति स्थापित हो। यानी अपराध की प्रकृति और उसकी गंभीरता के साथ-साथ यह पहलू भी महत्वपूर्ण रहेगा कि दोषी के व्यवहार में भविष्य में सुधार की संभावना बची है या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी से यह बात एक बार फिर स्पष्ट होती है कि मृत्युदंड से जुड़े मामलों में केवल अपराध की भयावहता को ही अंतिम आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालतों को दोषी के मामले में सुधार और पुनर्वास की संभावना पर भी विचार करना होगा।

यह फैसला ऐसे मामलों में सजा तय करने की प्रक्रिया में सुधार की संभावना को महत्वपूर्ण मानता है। अदालत के अनुसार, किसी अपराध को बेहद क्रूर या वीभत्स मान लेना अपने आप में दोषी को सुधार से परे मानने के बराबर नहीं है।