नेहा बोरा के पर्सनल बॉन्ड केस में फैसला कल, HC की ‘बैड बॉय’ टिप्पणी पर सरकार और बचाव पक्ष में तीखी दलीलें
नेहा बोरा के पर्सनल बॉन्ड मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रखा है। कोर्ट 23 अक्टूबर को आदेश सुनाएगा।
➤ दिल्ली हाईकोर्ट ने नेहा बोरा के पर्सनल बॉन्ड मामले में फैसला सुरक्षित रखा
➤ कोर्ट ने ‘बैड बॉय’ की छवि बनाए जाने और अनुच्छेद 21 से जुड़े सवाल उठाए
➤ सरकार ने छह FIR का हवाला दिया, बचाव पक्ष बोला- सत्ता परिवर्तन की बात करना अपराध नहीं
नई दिल्ली में नेहा बोरा के पर्सनल बॉन्ड मामले में दिल्ली हाईकोर्ट में गुरुवार को सुनवाई पूरी हो गई। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया है और अब इस मामले में 23 अक्टूबर को आदेश सुनाया जाएगा। सुनवाई के दौरान अदालत की ओर से नेहा बोरा की छवि को लेकर की गई टिप्पणी और सरकार की ओर से उनके खिलाफ दर्ज मामलों का हवाला दिए जाने को लेकर बहस काफी महत्वपूर्ण रही।
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस बात पर सवाल उठाया कि किसी व्यक्ति से अच्छे व्यवहार का वादा लेने की प्रक्रिया क्या उसके बारे में पहले से बनी एक नकारात्मक धारणा को मजबूत नहीं करती। अदालत ने टिप्पणी की कि नेहा बोरा को पहले ही ‘बैड बॉय’ की तरह पेश कर दिया गया है और इसके बाद उनसे अच्छे व्यवहार का वादा मांगना उसी धारणा को आगे बढ़ाता दिखाई दे सकता है। कोर्ट ने इस पहलू को संविधान के अनुच्छेद 21 से भी जोड़कर देखा।
सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने इस दलील पर सवाल उठाया कि जब किसी व्यक्ति के खिलाफ छह FIR दर्ज हों, तो उसे पूरी तरह ‘दूध का धुला’ कैसे माना जा सकता है। सरकार का कहना है कि नेहा बोरा के खिलाफ कार्रवाई किसी अनुमान या मनमाने आधार पर नहीं की गई, बल्कि प्रशासन के पास उपलब्ध रिकॉर्ड और उस समय की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए कदम उठाया गया।
नोटिस जारी करने के आधार पर सरकार की दलील
सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) ने नोटिस जारी करने से पहले उपलब्ध सामग्री पर विचार किया था। इसमें जनरल डायरी की एंट्री, पहले से दर्ज FIR, संबंधित अपराधों का रिकॉर्ड और उस समय सड़कों पर बनी परिस्थितियों को आधार बनाया गया था।
चेतन शर्मा के मुताबिक, मजिस्ट्रेट ने मामले की स्थिति समझने के लिए जांच अधिकारी को भी बुलाया था। सरकार का पक्ष है कि कार्रवाई के पीछे पर्याप्त आधार मौजूद था और इसे केवल किसी राजनीतिक या व्यक्तिगत धारणा के आधार पर शुरू किया गया कदम नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने ‘बैड बॉय’ वाली धारणा पर उठाया सवाल
सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि किसी व्यक्ति से भविष्य में अच्छे आचरण का वादा मांगने का मतलब कहीं यह तो नहीं निकाला जा रहा कि उसने पहले गलत व्यवहार किया था। अदालत ने इसी संदर्भ में व्यक्ति की प्रतिष्ठा और उसके संवैधानिक अधिकारों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर सवाल उठाए।
कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद सरकार की ओर से कहा गया कि छह FIR का सामना कर रहे व्यक्ति को पूरी तरह निर्दोष या ‘दूध का धुला’ मानना भी उचित नहीं होगा। इस तरह सुनवाई में एक तरफ व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों और प्रतिष्ठा का सवाल रहा, तो दूसरी तरफ सरकार ने दर्ज मामलों और प्रशासनिक रिकॉर्ड को अपने पक्ष का आधार बनाया।
‘रिजीम चेंज’ वाली बैठक का भी जिक्र
सुनवाई के दौरान सरकार ने कथित तौर पर एक ऐसी बैठक का भी उल्लेख किया, जिसमें नेहा बोरा के शामिल होने का दावा किया गया। एएसजी चेतन शर्मा ने कहा कि यह बैठक CJP के नेताओं और प्रशांत भूषण के साथ हुई थी और इसमें कथित तौर पर ‘रिजीम चेंज’ की बात कही गई थी।
सरकार की ओर से इस कथित बैठक और वहां कही गई बातों को भी कार्रवाई के संदर्भ में अदालत के सामने रखा गया। हालांकि, इस दावे को लेकर अंतिम निष्कर्ष अदालत के आदेश के बाद ही स्पष्ट होगा।
बचाव पक्ष ने कहा- लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन की बात गलत नहीं
नेहा बोरा की ओर से पेश वकील गोपाल शंकरनारायणन ने सरकार की दलीलों का विरोध किया। बचाव पक्ष ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता परिवर्तन की बात करना अपने आप में कोई अपराध नहीं है।
वकील ने अदालत के सामने तर्क दिया कि नेहा बोरा ने केवल मंडी हाउस में लोगों के जुटने की अपील की थी। उनके अनुसार, उन्होंने किसी तरह की हिंसा करने या कानून तोड़ने का आह्वान नहीं किया था।
10 हजार रुपये के निजी मुचलके वाले नोटिस को चुनौती
पूरा मामला उस नोटिस से जुड़ा है, जिसमें नेहा बोरा को शांति बनाए रखने के लिए 10 हजार रुपये का निजी मुचलका और एक जमानतदार देने को कहा गया है। नेहा बोरा ने इसी कार्रवाई को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी है।
बचाव पक्ष का कहना है कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर उन्हें इस तरह के बंधन में रखने का पर्याप्त आधार नहीं है। वहीं सरकार का पक्ष है कि प्रशासन ने उपलब्ध रिकॉर्ड और कानून-व्यवस्था से जुड़ी परिस्थितियों को देखते हुए प्रक्रिया अपनाई है।
अब दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। 23 अक्टूबर को आने वाला आदेश यह तय करेगा कि नेहा बोरा को निजी मुचलके और जमानतदार से संबंधित नोटिस में राहत मिलती है या प्रशासन की कार्रवाई बरकरार रहती है। फिलहाल अदालत के अंतिम आदेश का इंतजार है।
Akhil Mahajan