हरियाणा की बेटी मनीषा भनवाला ने विश्व कुश्ती में रचा इतिहास, भारत के लिए वर्ल्ड रेसलिंग का खिताब जीतने वाली पहली महिला पहलवान बनी

हरियाणा के जींद जिले की मनीषा भनवाला ने विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचा। फाइनल में अमेरिका की पहलवान को 8-6 से हराया।

हरियाणा की बेटी मनीषा भनवाला ने विश्व कुश्ती में रचा इतिहास,  भारत के लिए वर्ल्ड रेसलिंग का खिताब जीतने वाली पहली महिला पहलवान बनी

➤ जींद के सिवाहा गांव की मनीषा भनवाला ने विश्व कुश्ती में देश का नाम रोशन किया

➤ 59 किलोग्राम भारवर्ग में शानदार प्रदर्शन करते हुए जीता विश्व चैंपियनशिप का खिताब

➤ फाइनल में प्रतिद्वंद्वी को 8-6 से हराकर विश्व चैंपियन बनने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान बनीं


हरियाणा की बेटी मनीषा भनवाला ने अंतरराष्ट्रीय कुश्ती के अखाड़े में ऐसा कारनामा कर दिखाया है, जिसने भारतीय खेल इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। कजाखस्तान के अस्ताना में आयोजित विश्व कुश्ती चैंपियनशिप 2026 में मनीषा ने महिलाओं के 59 किलोग्राम भारवर्ग में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया। फाइनल मुकाबले में उन्होंने अमेरिका की पैन अमेरिकन चैंपियन एबिगेल नेट को 8-6 से हराया। खास बात यह रही कि मुकाबले में एक समय मनीषा 0-6 से पिछड़ रही थीं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और शानदार वापसी करते हुए मुकाबला अपने नाम कर लिया। इस जीत के साथ मनीषा सीनियर विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने वाली भारत की पहली महिला पहलवान बन गई हैं।

0-6 से पिछड़ने के बाद पलट दिया मुकाबला

फाइनल में मनीषा का सामना अमेरिका की मजबूत पहलवान एबिगेल नेट से हुआ। मुकाबले की शुरुआत में भारतीय पहलवान को लगातार अंक गंवाने पड़े और स्कोर 0-6 हो गया। इस स्थिति में मुकाबला उनके हाथ से निकलता हुआ दिखाई दे रहा था, लेकिन मनीषा ने धैर्य बनाए रखा। उन्होंने अपनी रणनीति में बदलाव किया और लगातार अंक जुटाते हुए वापसी की। आखिरी दौर में उनका प्रदर्शन निर्णायक साबित हुआ और उन्होंने 8-6 के अंतर से जीत दर्ज कर ली। यह जीत केवल एक स्वर्ण पदक नहीं, बल्कि दबाव में शानदार प्रदर्शन और मजबूत इच्छाशक्ति की मिसाल बन गई। 

सिवाहा गांव से विश्व चैंपियन बनने तक का सफर

मनीषा भनवाला का संबंध हरियाणा के जींद जिले के सिवाहा गांव से है। 29 वर्षीय मनीषा ने कुश्ती के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने के लिए लंबे समय तक मेहनत की है। उनके पिता सुरेश ने उन्हें करीब 14 साल पहले कुश्ती से जुड़ने के लिए प्रेरित किया था। शुरुआती दौर में खेल से जुड़ने का उद्देश्य फिटनेस सुधारना था, लेकिन धीरे-धीरे कुश्ती उनके जीवन का लक्ष्य बन गई। जब मनीषा इस खेल में अपनी पहचान बनाने लगी थीं, तभी उनके पिता का हार्ट अटैक से निधन हो गया। पिता के निधन के बाद भी उन्होंने अपने सपने को अधूरा नहीं छोड़ा और लगातार अभ्यास जारी रखा। 

एशियन गेम्स की निराशा के बाद विश्व मंच पर वापसी

विश्व चैंपियनशिप से पहले मनीषा को एशियन गेम्स में निराशा का सामना करना पड़ा था। वह 57 किलोग्राम भारवर्ग में उतरी थीं, लेकिन जापान की पहलवान अकरी फुजिनामी से हारकर पदक की दौड़ से बाहर हो गईं। इस हार के बाद उन्होंने खुद को संभाला और विश्व चैंपियनशिप की तैयारी में जुट गईं। कम समय को देखते हुए उन्होंने 59 किलोग्राम भारवर्ग में उतरने का फैसला किया। उनके कोच मंदीप सिंह के अनुसार, तैयारी के दौरान मनीषा की सहनशक्ति और मुकाबले के शुरुआती समय में अंक हासिल करने की क्षमता पर विशेष काम किया गया।

फाइनल तक का सफर भी रहा शानदार

मनीषा ने फाइनल तक पहुंचने के लिए कई मजबूत प्रतिद्वंद्वियों को मात दी। उन्होंने कनाडा की लॉरेंस ब्यूरेगार्ड को चित करके मुकाबला जीता। इसके बाद क्वार्टर फाइनल में मंगोलिया की बोलोरतुया खुरेलखू को 6-0 से हराया। सेमीफाइनल में उनका सामना मेजबान कजाखस्तान की अल्टिन शगायेवा से हुआ। मनीषा ने इस मुकाबले में 10-0 की बढ़त बनाई और प्रतिद्वंद्वी को चित करके फाइनल में जगह पक्की कर ली। इसके बाद फाइनल में अमेरिका की एबिगेल नेट को हराकर उन्होंने स्वर्ण पदक पर कब्जा जमाया। 

भारतीय कुश्ती के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि

मनीषा की यह उपलब्धि इसलिए भी खास है, क्योंकि इससे पहले किसी भारतीय महिला पहलवान ने सीनियर विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक नहीं जीता था। भारत को इससे पहले इस प्रतियोगिता में महिला वर्ग में रजत पदक मिले थे, लेकिन स्वर्ण का इंतजार जारी था। मनीषा ने यह इंतजार खत्म कर दिया। उनकी जीत के साथ भारत का सीनियर विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक का 16 साल का इंतजार भी समाप्त हुआ। इससे पहले 2010 में सुशील कुमार ने विश्व चैंपियनशिप में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीता था। 

मनीषा की सफलता हरियाणा के खेल जगत के साथ-साथ देश की उन बेटियों के लिए भी प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों और व्यक्तिगत चुनौतियों के बावजूद बड़े सपने देखती हैं। जींद जिले के सिवाहा गांव से निकलकर विश्व मंच पर तिरंगा ऊंचा करने वाली मनीषा ने साबित कर दिया कि मेहनत, धैर्य और मजबूत इरादों के दम पर इतिहास रचा जा सकता है।