दुनिया को अलविदा कहकर डेढ़ साल की नन्हीं परी छोड़ गई उम्मीद की रोशनी, परिवार ने किया नेत्रदान
रोहतक में डेढ़ साल की आस्था की तेज बुखार के बाद मौत हो गई। परिवार ने पहले से लिए संकल्प के अनुसार बेटी का नेत्रदान कर मानवीय मिसाल पेश की।
➤ डेढ़ साल की आस्था की अचानक तबीयत बिगड़ने के बाद रास्ते में मौत
➤ मौत के बाद परिवार ने पहले से लिए संकल्प के अनुसार कराया नेत्रदान
➤ रोहतक में डेढ़ साल की बच्ची के नेत्रदान का बताया गया पहला मामला
रोहतक। महज डेढ़ साल की उम्र में आस्था इस दुनिया से चली गई, लेकिन उसके परिवार ने दुख की इस घड़ी में ऐसा फैसला लिया, जिससे किसी और की जिंदगी में रोशनी आने की उम्मीद जगी है। हरियाणा के रोहतक में आस्था की अचानक तबीयत बिगड़ने के बाद मौत हो गई। बच्ची को तेज बुखार था और हालत लगातार खराब होती गई। परिवार उसे इलाज के लिए अस्पताल लेकर पहुंचा, जहां से डॉक्टरों ने उसे पीजीआई रेफर कर दिया। पीजीआई ले जाते समय पिता की गोद में ही आस्था ने दम तोड़ दिया। इसके बाद परिवार ने अपने पहले से लिए गए अंगदान के संकल्प के अनुसार बच्ची के नेत्रदान का फैसला किया। भिवानी से आई मेडिकल टीम बच्ची के नेत्र लेकर पीजीआई के आई बैंक पहुंची। परिवार के इस फैसले ने आस्था की छोटी सी जिंदगी को एक ऐसी मानवीय पहल से जोड़ दिया, जिससे भविष्य में किसी जरूरतमंद के लिए रोशनी की उम्मीद बन सकती है।
आंगन में खेल रही थी आस्था, अचानक बिगड़ी तबीयत
महम निवासी दीपक परुथी ने बताया कि 14 अक्टूबर की शाम उनकी बेटी आस्था घर के आंगन में खेल रही थी। इसी दौरान अचानक उसकी तबीयत खराब होने लगी। परिवार ने बच्ची को दवाई दी, लेकिन बुखार कम नहीं हुआ। देखते ही देखते बच्ची का शरीर काफी गर्म हो गया और उसकी हालत बिगड़ती चली गई।
परिवार ने बच्ची को इलाज के लिए पास के अस्पताल ले जाने का फैसला किया। इस दौरान उसे 106 डिग्री बुखार भी था। डॉक्टरों की टीम ने बच्ची का इलाज शुरू किया, लेकिन उसकी हालत में अपेक्षित सुधार नहीं हो सका।
पीजीआई रेफर किया, रास्ते में पिता की गोद में थम गई सांसें
दीपक के अनुसार, 15 अक्टूबर की सुबह करीब साढ़े 4 बजे वे आस्था को अस्पताल लेकर पहुंचे थे। वहां डॉक्टरों ने उसकी गंभीर हालत को देखते हुए उसे पीजीआई रेफर कर दिया।
परिवार बच्ची को लेकर पीजीआई के लिए रवाना हुआ, लेकिन रास्ते में ही आस्था ने पिता की गोद में दम तोड़ दिया। जिस बच्ची को परिवार इलाज के लिए लेकर निकला था, उसकी मौत की खबर ने पूरे परिवार को तोड़कर रख दिया।
फरवरी 2025 में हुआ था जन्म, धीरे-धीरे चलना और बोलना सीख रही थी
दीपक ने बताया कि आस्था का जन्म 18 फरवरी 2025 को हुआ था। परिवार में उसका एक 3 साल का बेटा भी है। बेटी के जन्म के बाद घर में खुशियां बढ़ गई थीं। आस्था अभी बेहद छोटी थी और धीरे-धीरे बोलना सीख रही थी।
परिवार के मुताबिक, पिछले कुछ महीनों से वह धीरे-धीरे चलने भी लगी थी। उसकी छोटी-छोटी गतिविधियां परिवार के लिए खुशी का कारण बनती थीं। अचानक उसकी मौत ने परिवार को गहरे दुख में डाल दिया।
परिवार ने पहले ही भर रखा था अंगदान का फॉर्म
आस्था के पिता दीपक अपने भाई सोनू के साथ होलसेल का काम करते हैं। परिवार एक धार्मिक संस्था से जुड़ा हुआ है। इसी जुड़ाव के चलते परिवार ने पहले ही मृत्यु के बाद आंखें और शरीर दान करने का फॉर्म भर रखा था।
आस्था की मौत के बाद परिवार ने अपने उसी पुराने संकल्प को निभाने का फैसला किया। बच्ची की मौत के बाद परिजनों ने नेत्रदान के लिए सहमति दी और मेडिकल टीम ने उसके नेत्र सुरक्षित तरीके से लेकर आई बैंक पहुंचाए।
दुख की इस घड़ी में परिवार का यह निर्णय खास इसलिए भी रहा क्योंकि उन्होंने बेटी की मृत्यु के बाद उसके नेत्रदान के जरिए किसी जरूरतमंद के लिए भविष्य में रोशनी की संभावना बनाए रखने का फैसला किया।
भिवानी से मेडिकल टीम ने पहुंचकर लिए बच्ची के नेत्र
आस्था के नेत्र लेने के लिए भिवानी से मेडिकल टीम पहुंची। टीम ने बच्ची के नेत्र लिए और उन्हें पीजीआई के आई बैंक ले जाया गया। इस प्रक्रिया के बाद परिवार ने अपनी बेटी के नेत्रदान का संकल्प पूरा किया।
आस्था की उम्र महज डेढ़ साल थी, लेकिन उसके परिवार के इस फैसले ने नेत्रदान के महत्व को एक बार फिर सामने ला दिया। बच्ची की मौत के बीच परिवार ने यह संदेश दिया कि किसी के जाने के बाद भी उसकी आंखें किसी और के लिए उम्मीद बन सकती हैं।
रोहतक में डेढ़ साल की बच्ची का नेत्रदान पहली बार बताया गया
सिविल अस्पताल से रिटायर आई विशेषज्ञ दिनेश शर्मा ने बताया कि रोहतक जिले में डेढ़ साल की बच्ची के नेत्रदान का यह पहला मामला है। उन्होंने बताया कि नवजात से लेकर 90 साल तक के व्यक्ति के नेत्रदान किए जा सकते हैं।
स्वास्थ्य विभाग की ओर से आस्था के परिवार को प्रशस्ति पत्र भी दिया जाएगा। इस तरह छोटी सी उम्र में दुनिया से विदा हुई आस्था अपने पीछे परिवार के लिए गहरा दुख छोड़ गई, लेकिन उसके परिवार के नेत्रदान के फैसले ने उसकी याद को एक मानवीय संकल्प से जोड़ दिया।
आस्था की कहानी एक ऐसे परिवार की कहानी है, जिसने अपनी सबसे बड़ी पीड़ा के बीच भी दूसरों के लिए उम्मीद बचाए रखने का फैसला किया। जिस उम्र में बच्ची अभी दुनिया को समझना शुरू ही कर रही थी, उसी उम्र में उसकी जिंदगी अचानक थम गई। लेकिन परिवार के नेत्रदान के निर्णय से उसके नेत्र अब आई बैंक के माध्यम से जरूरतमंदों के लिए उपयोग की संभावना से जुड़े हैं।
Akhil Mahajan