10 साल बाद 4 आरोपी बरी,पुलिस टीम पर पथराव और लूट की कोशिश का था केस

झज्जर कोर्ट ने बहादुरगढ़ में पुलिस टीम पर पथराव, सरकारी गाड़ी लूटने की कोशिश और अवैध हथियार रखने के 2016 के मामले में चार आरोपियों को बरी किया।

10 साल बाद 4 आरोपी बरी,पुलिस टीम पर पथराव और लूट की कोशिश का था केस

झज्जर कोर्ट ने 2016 के पुलिस टीम पर पथराव और लूट की कोशिश के मामले में चार आरोपियों को किया बरी

➤ पुलिस ने हथियार और कारतूस बरामद करने का किया था दावा, सुनवाई के दौरान स्वतंत्र गवाह पेश नहीं कर पाया अभियोजन पक्ष

➤ करीब 10 साल बाद फैसला, कोर्ट ने साक्ष्यों की कमी के चलते चारों आरोपियों को दिया संदेह का लाभ

झज्जर। बहादुरगढ़ में पुलिस टीम पर पथराव करने, सरकारी गाड़ी लूटने की कोशिश और अवैध हथियार रखने के करीब 10 साल पुराने मामले में झज्जर कोर्ट ने चार आरोपियों को बरी कर दिया है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सुखप्रीत सिंह की अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान पुलिस की कार्रवाई और अभियोजन पक्ष की ओर से पेश किए गए साक्ष्यों में कमियां पाईं। आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर पाने के कारण अदालत ने चारों आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी करने का फैसला सुनाया।

बरी किए गए आरोपियों में संजय उर्फ छोटा, पवन, कवित और परवीन उर्फ बब्बू शामिल हैं। पुलिस ने यह मामला 20 मई 2016 को बहादुरगढ़ के लाइन पार थाने में दर्ज किया था। आरोप था कि कुछ युवक हथियार लेकर राहगीरों को लूटने की योजना बना रहे थे। पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 398 और 401 तथा आर्म्स एक्ट की धारा 25 के तहत कार्रवाई की थी।

मुकदमे की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने पुलिस की कार्रवाई, कथित बरामदगी और स्वतंत्र गवाहों को शामिल नहीं किए जाने को लेकर सवाल उठाए। अदालत के सामने यह भी दलील दी गई कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य पेश नहीं कर पाया। इन कमियों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने चारों आरोपियों को सभी आरोपों से बरी कर दिया।

इन चार आरोपियों को कोर्ट ने किया बरी

अदालत से बरी होने वालों में संजय उर्फ छोटा निवासी पिनाना (सोनीपत), पवन निवासी झज्जर, कवित निवासी माजरी (झज्जर) और परवीन उर्फ बब्बू निवासी मित्राऊ (दिल्ली) शामिल हैं।

यह मामला 20 मई 2016 को बहादुरगढ़ के लाइन पार थाने में दर्ज किया गया था। पुलिस ने आरोप लगाया था कि आरोपी लूट की योजना बना रहे थे और उनके पास अवैध हथियार थे। इसी आधार पर उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 398 और 401 तथा आर्म्स एक्ट की धारा 25 के तहत केस दर्ज किया गया था।

करीब एक दशक तक चले इस मुकदमे में अदालत ने पुलिस की ओर से लगाए गए आरोपों और उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा की। सुनवाई के दौरान सामने आई कमियों के आधार पर कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि आरोपियों के खिलाफ आरोप संदेह से परे साबित नहीं हुए हैं।

पुलिस का दावा था- राहगीरों को लूटने की योजना बना रहे थे युवक

पुलिस के अनुसार, उस समय एसओजी स्टाफ बहादुरगढ़ की टीम तत्कालीन प्रभारी निरीक्षक सतीश देसवाल के नेतृत्व में नाहरा-नाहरी रोड पर गश्त कर रही थी। इसी दौरान पुलिस को सूचना मिली कि चोर पियाऊ के पास कुछ युवक हथियार लेकर राहगीरों को लूटने की योजना बना रहे हैं।

पुलिस का दावा था कि सूचना मिलने के बाद टीम मौके पर पहुंची तो आरोपियों ने सरकारी गाड़ी पर पत्थर फेंके और उसे रोकने का प्रयास किया। पुलिस ने मौके से संजय, पवन और कवित को पकड़ने की बात कही थी। पुलिस के मुताबिक, संजय और पवन के पास से .315 बोर के दो देसी कट्टे और कारतूस बरामद हुए थे। वहीं, कवित के पास से लोहे की छड़ मिलने का दावा किया गया था।

पुलिस ने बताया था कि चौथे आरोपी परवीन उर्फ बब्बू को बाद में गिरफ्तार किया गया। इसी घटनाक्रम के आधार पर पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कर कानूनी कार्रवाई शुरू की थी। हालांकि, मुकदमे की सुनवाई के दौरान पुलिस के दावों और कार्रवाई की प्रक्रिया पर बचाव पक्ष ने सवाल उठाए।

कोर्ट में पुलिस की कार्रवाई और स्वतंत्र गवाहों को लेकर उठे सवाल

मुकदमे की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने पुलिस की कार्रवाई और कथित बरामदगी की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। बचाव पक्ष की ओर से दलील दी गई कि घटना के समय सड़क पर लोगों की आवाजाही थी। पुलिस के पास पहले से सूचना होने के बावजूद किसी स्वतंत्र सार्वजनिक गवाह को जांच में शामिल नहीं किया गया।

बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि इस तरह की स्थिति में स्वतंत्र गवाहों की मौजूदगी महत्वपूर्ण थी। उनके अनुसार, सार्वजनिक गवाह को शामिल नहीं किए जाने से पुलिस की कार्रवाई की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं।

अदालत के सामने यह दलील भी रखी गई कि पुलिस की सरकारी गाड़ी पर पुलिस लिखा हुआ था। ऐसे में आरोपियों द्वारा उसी गाड़ी को लूटने के इरादे से रोकने का दावा अस्वाभाविक लगता है। बचाव पक्ष ने पुलिस की कहानी के अन्य पहलुओं पर भी सवाल उठाए।

पुलिस के अनुसार, आरोपी हथियारों से लैस थे और उन्होंने सरकारी गाड़ी को रोकने का प्रयास किया था। इसके बावजूद गिरफ्तारी के दौरान किसी तरह के प्रतिरोध या पुलिसकर्मी अथवा आरोपी के घायल होने की बात सामने नहीं आई। बचाव पक्ष ने इन परिस्थितियों को भी अपने तर्कों का आधार बनाया।

शिकायतकर्ता ने ही की थी शुरुआती जांच और जब्ती की कार्रवाई

बचाव पक्ष ने जांच की निष्पक्षता को लेकर भी सवाल उठाए। अदालत में दलील दी गई कि मामले के शिकायतकर्ता और तत्कालीन निरीक्षक सतीश देसवाल ने ही शुरुआती जांच और जब्ती की कार्रवाई की थी।

बचाव पक्ष के अनुसार, शिकायतकर्ता की ओर से ही शुरुआती जांच और जब्ती की कार्रवाई किए जाने से जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं। इसके अलावा अभियोजन पक्ष आरोपियों के किसी आदतन लुटेरे गिरोह से जुड़े होने के आरोप को भी पर्याप्त साक्ष्यों के आधार पर साबित नहीं कर पाया।

सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष की ओर से उठाए गए इन सवालों और अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों का अदालत ने मूल्यांकन किया। अंततः अदालत ने पाया कि आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित करने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद नहीं थे।

साक्ष्यों की कमी के चलते कोर्ट ने दिया संदेह का लाभ

झज्जर के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सुखप्रीत सिंह ने मामले में उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के बयानों में सामने आई कमियों को ध्यान में रखते हुए फैसला सुनाया। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष चारों आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा।

इसके बाद कोर्ट ने संजय उर्फ छोटा, पवन, कवित और परवीन उर्फ बब्बू को सभी आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने उनके बेल बॉन्ड रद्द करने के आदेश भी दिए।

करीब 10 साल तक चले इस मामले में फैसले से चारों आरोपियों को राहत मिली है। यह फैसला आपराधिक मुकदमों में साक्ष्यों की अहमियत को भी रेखांकित करता है। किसी भी आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को अदालत में साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष को ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य पेश करने होते हैं। इस मामले में अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और सुनवाई के दौरान सामने आई कमियों के आधार पर चारों आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।