जाट आंदोलन हत्याकांड, आरोपियों की उम्रकैद की सजा रद्द

जाट आंदोलन हत्याकांड में हाईकोर्ट ने तीन आरोपियों की उम्रकैद रद्द कर उन्हें बरी किया। गवाहों के मुकरने और साक्ष्यों पर अदालत ने अहम फैसला सुनाया।

जाट आंदोलन हत्याकांड, आरोपियों की उम्रकैद की सजा रद्द

➤ तीनों आरोपियों को संदेह का लाभ देकर बरी किया गया
➤ गवाहों के मुकरने के बाद दोषसिद्धि पर उठे गंभीर सवाल
➤ 2019 में सेशन कोर्ट ने सुनाई थी उम्रकैद की सजा


पंचकूला। साल 2016 के जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हांसी में हुई मिंटू की मौत के मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने तीन आरोपियों को बड़ी राहत दी है। हाईकोर्ट की जस्टिस राजेश भारद्वाज और जस्टिस पूजा चोपड़ा की खंडपीठ ने हिसार सेशन कोर्ट द्वारा दलजीत उर्फ सिसाय, पवन उर्फ पोना और सुरेंदर उर्फ ढांडा को सुनाई गई उम्रकैद की सजा रद्द कर दी। अदालत ने तीनों आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जब मामले के सभी प्रमुख चश्मदीद गवाह अदालत में अपने पहले के कथनों से मुकर गए हों, तो केवल संदिग्ध एफएसएल रिपोर्ट और पुलिस हिरासत में दिए गए बयानों के आधार पर दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती।

यह मामला 22 और 23 फरवरी 2016 को जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हांसी के लालपुरा और ढाणी पाल क्षेत्रों में हुई हिंसक घटनाओं से जुड़ा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, करीब 70 से 75 लोगों की भीड़ ने वहां उपद्रव किया था। इस दौरान आगजनी और गोलीबारी की घटना हुई, जिसमें मिंटू नामक युवक की गोली लगने से मौत हो गई थी। वहीं कृष्ण और हरफूल गंभीर रूप से घायल हुए थे। मामले में शिकायतकर्ता राम अवतार के बयान के आधार पर पुलिस ने केस दर्ज किया और दलजीत उर्फ सिसाय, पवन उर्फ पोना तथा सुरेंदर उर्फ ढांडा को आरोपी बनाया था।

2019 में तीनों को सुनाई गई थी उम्रकैद

मामले की सुनवाई के बाद जनवरी 2019 में हिसार सेशन कोर्ट ने तीनों आरोपियों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके बाद आरोपियों ने हाईकोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी। हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान मामले के गवाहों के बयान और पुलिस जांच से जुड़े साक्ष्यों पर विस्तार से विचार किया गया।

अदालत के सामने यह भी आया कि सुनवाई के दौरान घायल कृष्ण और हरफूल तथा शिकायतकर्ता राम अवतार ने आरोपियों की पहचान करने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि जिस भीड़ ने हमला किया था, उसमें आरोपी शामिल नहीं थे। शिकायतकर्ता की ओर से यह आरोप भी लगाया गया कि पुलिस ने उससे सादे कागजों पर हस्ताक्षर करवाए थे।

मुख्य गवाहों के मुकरने को माना अहम पहलू

हाईकोर्ट के सामने मामले का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह रहा कि पीड़ित और प्रमुख गवाह अदालत में अपने पहले के कथनों की पुष्टि नहीं कर सके। अभियोजन की ओर से आरोपियों को घटना से जोड़ने के लिए पेश किए गए साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर इसी कारण सवाल खड़े हुए।

अदालत ने माना कि जब प्रमुख स्वतंत्र गवाह अभियोजन के मामले का समर्थन नहीं कर रहे हों, तब अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कानूनी मजबूती का परीक्षण और अधिक सावधानी से किया जाना जरूरी है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने आरोपियों को संदेह का लाभ दिया।

सप्लीमेंट्री चालान और हथियार की बरामदगी पर भी सवाल

मामले में पुलिस की ओर से बाद में सप्लीमेंट्री चालान पेश किए जाने का पहलू भी हाईकोर्ट के सामने आया। अदालत ने गौर किया कि प्रमुख गवाहों के मुकरने के बाद पुलिस ने दो साल से अधिक समय बीतने पर सप्लीमेंट्री चालान पेश किया था।

हत्या में इस्तेमाल किए जाने का दावा किए गए .32 बोर के पिस्टल की बरामदगी को लेकर भी अदालत ने साक्ष्यों की स्थिति पर विचार किया। यह हथियार एक अन्य एफआईआर नंबर 337 में बलवंत उर्फ बल्लू से बरामद बताया गया था। बलवंत के बयान के मुताबिक उसने यह हथियार सोनू गुर्जर से खरीदा था, न कि आरोपी दलजीत से।

पुलिस हिरासत के बयान को लेकर अदालत की अहम टिप्पणी

हाईकोर्ट ने पुलिस हिरासत में दिए गए डिस्क्लोजर स्टेटमेंट से जुड़ी कानूनी सीमाओं पर भी विचार किया। अदालत ने माना कि केवल पुलिस हिरासत में दिए गए बयान और उसके आधार पर हुई बरामदगी अपने आप में पूर्ण और निर्णायक साक्ष्य नहीं बन जाती, खासकर तब जब स्वतंत्र गवाहों का समर्थन उपलब्ध नहीं हो और मामले में अन्य गंभीर कमियां भी सामने आई हों।

आरोपियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप सिंह पूनिया ने भी अदालत में दलील दी कि पवन और सुरेंदर को उन अन्य मामलों में पहले ही बरी किया जा चुका था, जिनके आधार पर हथियारों की बरामदगी का संदर्भ सामने आया था।

पुलिस कार्रवाई को लेकर भी चर्चा में रहा था मामला

यह मामला जांच और पुलिस कार्रवाई के कारण भी लंबे समय तक चर्चामे रहा। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पुलिस ने दलजीत को गिरफ्तार किया था और बाद में उसे बेड़ियां पहनाकर बाजार में परेड कराई गई थी। इस कार्रवाई की तस्वीरें भी सामने आई थीं।

हालांकि, हाईकोर्ट में मुख्य सवाल यह था कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों को हत्या के मामले में दोषी ठहराया जाना कानूनी रूप से उचित था या नहीं। अदालत ने गवाहों के मुकरने, बरामदगी से जुड़े साक्ष्यों और पुलिस हिरासत में दिए गए बयानों समेत पूरे मामले का मूल्यांकन किया।

हाईकोर्ट के फैसले के बाद तीनों आरोपियों की उम्रकैद की सजा समाप्त हो गई और उन्हें संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया। यह फैसला इस मामले में निचली अदालत के 2019 के निर्णय पर हाईकोर्ट की पुनर्विचारात्मक न्यायिक समीक्षा का परिणाम है।