24 साल पुराने मर्डर केस में हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, पति-पत्नी बरी

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने 24 साल पुराने हत्या मामले में पति-पत्नी को संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया, जबकि मुख्य आरोपी सतबीर की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी।

24 साल पुराने मर्डर केस में हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, पति-पत्नी बरी

24 साल पुराने हत्या मामले में हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

पति-पत्नी को संदेह का लाभ देकर बरी किया गया

मुख्य आरोपी सतबीर की उम्रकैद की सजा बरकरार

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने करीब 24 साल पुराने हत्या मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए हत्या के आरोप में उम्रकैद की सजा काट रहे पति-पत्नी को संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया है। वहीं, मृतक पर कुल्हाड़ी से हमला करने वाले मुख्य आरोपी की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा गया है।

जस्टिस एनएस शेखावत और जस्टिस एचएस ग्रेवाल की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए ओमपति और रिसाला की अपील स्वीकार कर उन्हें दोषमुक्त कर दिया। जबकि सह-आरोपी सतबीर की अपील को खारिज कर दिया गया।

यह मामला मार्च 2002 में हरियाणा के भिवानी जिले के ककरोली हुक्मी गांव में हुई सोमबीर की हत्या से जुड़ा हुआ है। अभियोजन पक्ष के अनुसार रात करीब 10 बजे दो प्रत्यक्षदर्शियों ने देखा था कि रिसाला और उसकी पत्नी ओमपति ने सोमबीर को पकड़ रखा था, जबकि सतबीर उसके सिर पर कुल्हाड़ी से लगातार वार कर रहा था। गंभीर चोटों के कारण सोमबीर की मौके पर ही मौत हो गई थी।

घटना के बाद पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज कर तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया था। बाद में वर्ष 2004 में सत्र न्यायालय ने तीनों को भारतीय दंड संहिता की धारा 302/34 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी।

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और मेडिकल विशेषज्ञ की गवाही का विस्तार से परीक्षण किया। डॉक्टर ने जिरह के दौरान स्वीकार किया कि यदि एक या दो व्यक्ति मृतक को पकड़कर रखते, तो कुछ चोटों का स्वरूप अलग होता। उन्होंने यह भी माना कि ऐसी चोटें उस स्थिति में भी संभव थीं, जब मृतक बैठा हुआ या जमीन पर लेटा हुआ हो।

अदालत ने यह भी पाया कि रिसाला पहले से पैर की गंभीर चोट से पीड़ित था और लाठी के सहारे चलता था। बचाव पक्ष ने चिकित्सकीय रिकॉर्ड प्रस्तुत किए, जिनसे उसके पैर में फ्रैक्चर होने की पुष्टि हुई। वहीं ओमपति गांव के स्कूल में चपरासी के पद पर कार्यरत थी और उसने दावा किया कि घटना के समय वह स्कूल की निगरानी के लिए वहां मौजूद थी।

खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि ओमपति और रिसाला के खिलाफ केवल मृतक को पकड़ने का आरोप था। उनके कब्जे से कोई हथियार बरामद नहीं हुआ और न ही कोई स्वतंत्र गवाह उनके खिलाफ सामने आया। मेडिकल साक्ष्य भी अभियोजन की कहानी का पूरी तरह समर्थन नहीं करते हैं।

अदालत ने कहा कि ऐसे हालात में दोनों आरोपियों के खिलाफ संदेह की स्थिति बनी रहती है और कानून के अनुसार संदेह का लाभ आरोपियों को दिया जाना चाहिए। इसी आधार पर दोनों को बरी कर दिया गया।

वहीं अदालत ने सतबीर के खिलाफ प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही, उसकी निशानदेही पर बरामद खून से सनी कुल्हाड़ी और फोरेंसिक रिपोर्ट को विश्वसनीय माना। अदालत ने कहा कि हत्या के वास्तविक हमलावर के रूप में उसकी भूमिका स्पष्ट रूप से साबित होती है। इसी वजह से उसकी उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा गया है।