पानीपत के हैंडलूम कला के साधक खेमराज सुंदरियाल को मिला देश का बड़ा पद्म श्री सम्मान सम्मान

गणतंत्र दिवस 2026 पर पानीपत निवासी बुनकर खेमराज सुंदरियाल को हैंडलूम और टेपेस्ट्री कला में योगदान के लिए पद्म श्री सम्मान से नवाजा गया।

पानीपत के हैंडलूम कला के साधक खेमराज सुंदरियाल  को  मिला देश का बड़ा पद्म श्री सम्मान सम्मान
  • पद्म श्री से सम्मानित हुए बुनकर खेमराज सुंदरियाल
  • हैंडलूम और टेपेस्ट्री कला को दिलाई राष्ट्रीय पहचान
  • उत्तराखंड से हरियाणा तक संघर्ष और सफलता की प्रेरक कहानी


भारत सरकार ने गणतंत्र दिवस 2026 की पहली शाम को पद्म पुरस्कारों की घोषणा की है। इस सूची में मूल रूप से उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल और वर्तमान में हरियाणा के पानीपत निवासी प्रसिद्ध बुनकर खेमराज सुंदरियाल का नाम भी शामिल है। उन्हें पद्म श्री सम्मान से नवाजा गया है।

खेमराज सुंदरियाल ने हैंडलूम और बुनाई कला के क्षेत्र में दशकों तक कार्य करते हुए समाज और कला दोनों में गहरी छाप छोड़ी है। उनका जीवन संघर्ष, लगन और निरंतर मेहनत का उदाहरण है, जो यह साबित करता है कि साधारण पृष्ठभूमि से भी असाधारण उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं।

खेमराज सुंदरियाल का जन्म 2 फरवरी 1943 को उत्तराखंड के छोटे से गांव सुमाड़ी में हुआ था। सीमित संसाधनों और आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उनके भीतर कुछ बड़ा करने का जज्बा शुरू से मौजूद रहा। उन्होंने कभी परिस्थितियों के आगे हार नहीं मानी।

वर्ष 1964 में उन्होंने श्रीनगर, गढ़वाल से वीविंग में डिप्लोमा प्राप्त किया। इसके बाद वे रोजगार की तलाश में दिल्ली पहुंचे। दिल्ली में उन्होंने एक क्लॉथ मिल में नौकरी शुरू की, लेकिन वहां उनका मन नहीं लगा। इसके बाद वे दिल्ली स्थित बुनकर सेवा केंद्र से जुड़ गए।

बुनकर सेवा केंद्र में रहते हुए उन्होंने प्रसिद्ध डिजाइनरों के साथ काम किया और अपनी बुनाई कला को नया आयाम दिया। आगे चलकर उन्होंने कई राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रमों में बुनकरों को प्रशिक्षण भी दिया और पारंपरिक हस्तकला को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

कुछ समय बाद उनका तबादला बनारस बुनकर सेवा केंद्र में हुआ। बनारस उनके जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। यहीं उन्हें टेपेस्ट्री कला से गहरा लगाव हुआ। टेपेस्ट्री एक विशेष प्रकार की भित्ति चित्र बुनाई कला है, जिसमें रंग-बिरंगे धागों से चित्र उकेरे जाते हैं।

खेमराज सुंदरियाल ने टेपेस्ट्री कला में महारत हासिल की और इसे भारत में नई पहचान दिलाई। उनकी कारीगरी और समर्पण ने भारतीय हैंडलूम परंपरा को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने में अहम योगदान दिया।