20 साल की सजा अवैध: हाई कोर्ट का बड़ा फैसला 'हरियाणा में अफीम की खेती में कमर्शियल क्वांटिटी लागू नहीं'

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने अफीम पोस्ता की खेती को “कमर्शियल क्वांटिटी” मानने से इनकार करते हुए 20 साल की सजा को अवैध बताया है।

20 साल की सजा अवैध: हाई कोर्ट का बड़ा फैसला 'हरियाणा में अफीम की खेती में कमर्शियल क्वांटिटी लागू नहीं'

हाई कोर्ट ने अफीम पोस्ता खेती पर 20 साल की सजा को बताया अवैध

अफीम की खेती को ‘कमर्शियल क्वांटिटी’ नहीं माना जाएगा

मामला दोबारा सजा तय करने के लिए निचली अदालत को भेजा गया


पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एनडीपीएस एक्ट से जुड़े एक अहम मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि अफीम पोस्ता की खेती को “कमर्शियल क्वांटिटी” की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में आरोपी को 20 साल की कठोर सजा देना कानून के खिलाफ और प्रत्यक्ष अवैधता है।

यह फैसला जस्टिस अनूप चितकारा और जस्टिस सुखविंदर कौर की खंडपीठ ने हरियाणा के पानीपत निवासी सत्यवान की अपील पर सुनवाई करते हुए दिया। हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई 20 साल की सजा पर रोक लगाते हुए मामले को केवल सजा तय करने के उद्देश्य से दोबारा निचली अदालत में भेज दिया है।

मामले के अनुसार 13 मार्च 2019 को पुलिस को सूचना मिली थी कि आरोपी अपनी बहन की जमीन पर अवैध रूप से अफीम पोस्ता की खेती कर रहा है। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर 152 पोस्ता पौधे बरामद किए थे, जिनका वजन 11.560 किलोग्राम पाया गया। इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने इसे “कमर्शियल क्वांटिटी” मानते हुए एनडीपीएस एक्ट की धारा 18(बी) के तहत आरोपी को दोषी ठहराकर 20 वर्ष की सजा सुनाई थी।

हालांकि अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि ट्रायल कोर्ट ने कानून की गलत व्याख्या की। अफीम पोस्ता की खेती के मामलों में “स्मॉल क्वांटिटी” और “कमर्शियल क्वांटिटी” का कोई अलग प्रावधान नहीं है। ऐसे मामलों पर एनडीपीएस एक्ट की धारा 18(सी) लागू होती है, जिसमें अधिकतम सजा 10 साल तक ही हो सकती है।

 हाई कोर्ट ने क्या कहा?

हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार की 19 अक्टूबर 2001 की अधिसूचना का हवाला देते हुए कहा कि अफीम पोस्ता की खेती से जुड़े मामलों में धारा 18(सी) लागू होगी, न कि धारा 18(बी)। अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट यह बताने में पूरी तरह विफल रहा कि आखिर यह मामला “कमर्शियल क्वांटिटी” की श्रेणी में कैसे आता है।

खंडपीठ ने संविधान के अनुच्छेद 20(1) का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति को कानून में तय अधिकतम सीमा से अधिक सजा नहीं दी जा सकती। अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि जब कानून अधिकतम सजा तय कर देता है, तब अदालत एक दिन अधिक की सजा भी नहीं दे सकती।

दोषसिद्धि बरकरार, सजा पर फिर होगी सुनवाई

हाई कोर्ट ने आरोपी की दोषसिद्धि को बरकरार रखा है, लेकिन सजा को लेकर ट्रायल कोर्ट के आदेश पर सवाल उठाए हैं। अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह मामला धारा 18(सी) के अंतर्गत आता है, जहां अधिकतम सजा 10 वर्ष तक हो सकती है। इसलिए 20 साल की सजा कानून के विपरीत प्रतीत होती है।

अब निचली अदालत केवल सजा के मुद्दे पर नए सिरे से सुनवाई करेगी। इस फैसले को एनडीपीएस एक्ट से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्या माना जा रहा है।