युवराज हत्याकांड की जांच में बड़ी चूकें उजागर, SHO निलंबित; डॉक्टर और फॉरेंसिक टीम भी जांच के घेरे में
गुरुग्राम में युवराज मनचंदा हत्याकांड में शव की पहचान, फॉरेंसिक जांच और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट पर सवाल उठे। SHO निलंबित, कई अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच शुरू।
➤ युवराज का शव मिलने के बाद पहचान और जांच प्रक्रिया में देरी पर उठे सवाल
➤ शुरुआती रिपोर्ट में डूबने की बात, बाद की जांच में गोली मारकर हत्या का मामला सामने आया
➤ SHO निलंबित, डॉक्टर, फॉरेंसिक टीम और अन्य पुलिसकर्मियों की भूमिका की जांच शुरू
हरियाणा के गुरुग्राम में 31 वर्षीय रियल एस्टेट मैनेजर युवराज सिंह मनचंदा की हत्या के मामले में पुलिस जांच, फॉरेंसिक प्रक्रिया और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। युवराज का शव 10 सितंबर को बादशाहपुर के पास एक नाले से मिला था। शुरुआती जांच में उनकी मौत की वजह डूबना बताई गई, लेकिन बाद में दिल्ली पुलिस की तकनीकी जांच के दौरान उनकी पूर्व सहकर्मी आन्या वत्स और उसके साथी संयम सचदेवा के नाम सामने आए। दोनों को उत्तराखंड से गिरफ्तार किया गया। खबर के मुताबिक, पुलिस ने बताया कि पूछताछ में दोनों ने पैसों के विवाद के चलते युवराज की गोली मारकर हत्या करने की बात स्वीकार की। इस घटनाक्रम के बाद शुरुआती जांच में हुई कथित चूकों, शव की पहचान में देरी और मेडिकल रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल उठे हैं। मृतक की बहन हरसिमरन मनचंदा के मामला सुप्रीम कोर्ट में उठाने के बाद विभागीय कार्रवाई तेज हुई। बादशाहपुर थाने के SHO राजेश को निलंबित कर दिया गया है, जबकि डॉक्टर, फॉरेंसिक टीम के सदस्यों और अन्य पुलिसकर्मियों की भूमिका की जांच की जा रही है।
युवराज 6 सितंबर को लापता हुए, 10 सितंबर को मिला शव
रिपोर्ट के अनुसार, युवराज सिंह मनचंदा दिल्ली के सरिता विहार में रहते थे और अदानी रियल्टी में सेल्स मैनेजर के पद पर कार्यरत थे। वह 6 सितंबर को लापता हुए थे। चार दिन बाद, 10 सितंबर को उनका शव बादशाहपुर के पास एक नाले में मिला। उस समय शव की पहचान नहीं हो सकी। पुलिस ने शव को अज्ञात मानते हुए 14 सितंबर को अंतिम संस्कार कर दिया। बाद में शव की पहचान युवराज के रूप में हुई।
शव की पहचान में देरी के कारण परिवार को समय रहते जानकारी नहीं मिल सकी। परिवार अपने बेटे की तलाश कर रहा था, लेकिन उसे अंतिम बार देखने और सम्मानपूर्वक विदाई देने का अवसर नहीं मिला। इस घटनाक्रम ने पुलिस की पहचान प्रक्रिया और लापता लोगों की शिकायतों से जुड़े समन्वय पर गंभीर सवाल खड़े किए।
दिल्ली पुलिस की जांच में सामने आया हत्या का मामला
मामले में दिल्ली पुलिस की तकनीकी जांच के दौरान युवराज की पूर्व सहकर्मी आन्या वत्स और उसके साथी संयम सचदेवा के नाम सामने आए। दोनों को उत्तराखंड से गिरफ्तार किया गया। खबर के अनुसार, पुलिस ने बताया कि पूछताछ में दोनों ने पैसों के विवाद के चलते युवराज को गोली मारने की बात स्वीकार की।
जांच में सामने आई जानकारी के मुताबिक, युवराज को दो गोलियां मारी गई थीं। शुरुआती जांच में मौत की वजह डूबना बताई गई थी, जबकि बाद की जांच में गोली लगने से हत्या का मामला सामने आया। इस अंतर के बाद शुरुआती मेडिकल और फॉरेंसिक जांच की गुणवत्ता पर सवाल उठे हैं।
जांच में सामने आईं तीन प्रमुख चूकें
पहली चूक: ZIPNET पर जानकारी अपलोड करने में देरी।
पुलिस को अज्ञात शव मिलने पर उसकी तस्वीरें, कपड़ों का विवरण और पहचान से जुड़े निशान ZIPNET यानी जोनल इंटीग्रेटेड पुलिस नेटवर्क पर अपलोड करने होते हैं। इसका उद्देश्य दूसरे राज्यों की पुलिस और लापता व्यक्तियों के परिवारों तक जानकारी पहुंचाना है। खबर के अनुसार, युवराज का शव 10 सितंबर को मिलने के बावजूद संबंधित जांच अधिकारी ने इसकी जानकारी 16 सितंबर तक पोर्टल पर अपलोड नहीं की। इस देरी के कारण शव की पहचान की प्रक्रिया प्रभावित होने के सवाल उठे हैं।
दूसरी चूक: फॉरेंसिक जांच में गोली के निशानों की पहचान पर सवाल।
शव की जांच करने वाली फॉरेंसिक टीम पर आरोप है कि वह शरीर पर मौजूद गोली के निशानों की पहचान नहीं कर सकी। शुरुआती जांच में मौत की वजह डूबना मानी गई। बाद में हत्या का मामला सामने आने के बाद फॉरेंसिक जांच की प्रक्रिया और उसके निष्कर्षों की समीक्षा की जा रही है। खबर के मुताबिक, फॉरेंसिक टीम की डॉ. रिचा शर्मा और उनके टीम सदस्यों की भूमिका की विभागीय जांच शुरू की गई है।
तीसरी चूक: पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में मौत की वजह डूबना बताई गई।
खबर के मुताबिक, पोस्टमॉर्टम करने वाले मेडिकल अफसर डॉ. मानव चौहान ने मौत की वजह डूबना बताई थी। जांच अधिकारी ने शुरुआती रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की। बाद में गोली लगने से हत्या की बात सामने आने पर रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया और उसमें दर्ज निष्कर्षों पर सवाल उठे। डॉ. मानव चौहान के खिलाफ विभागीय जांच शुरू किए जाने की जानकारी दी गई है।
परिवार अंतिम विदाई से वंचित रह गया
रिपोर्ट के अनुसार, युवराज की गुमशुदगी की शिकायत दिल्ली के लाजपत नगर थाने में पहले से दर्ज थी। इसके बावजूद शव की पहचान के लिए संबंधित पुलिस इकाइयों के बीच समुचित समन्वय नहीं हो पाने के सवाल उठे हैं। शव का अंतिम संस्कार 14 सितंबर को कर दिया गया, जबकि ZIPNET पर जानकारी 16 सितंबर तक अपलोड नहीं की गई थी।
इस घटनाक्रम का सबसे दर्दनाक पहलू यह रहा कि परिवार अपने बेटे को अंतिम बार देख नहीं पाया। परिवार को शव की पहचान और अंतिम संस्कार के बारे में समय रहते जानकारी नहीं मिली। मामले में यह सवाल भी उठे कि शुरुआती पहचान और जांच की प्रक्रिया में हुई देरी से क्या महत्वपूर्ण साक्ष्यों की जांच प्रभावित हुई।
SHO निलंबित, डॉक्टर और फॉरेंसिक टीम की जांच शुरू
मामले की गंभीरता को देखते हुए गुरुग्राम पुलिस कमिश्नर ने बादशाहपुर थाने के SHO राजेश को निलंबित कर दिया। खबर के मुताबिक, डॉ. मानव चौहान के खिलाफ विभागीय जांच शुरू की गई है। फॉरेंसिक टीम की डॉ. रिचा शर्मा, उनकी टीम के सदस्यों और पुलिस कंट्रोल रूम की एक महिला सब-इंस्पेक्टर की भूमिका की भी जांच की जा रही है।
जांच अधिकारी साहुन खान की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। शुरुआती मेडिकल रिपोर्ट और फॉरेंसिक निष्कर्षों के आधार पर आगे की कार्रवाई करने के तरीके की समीक्षा की जा रही है। विभागीय जांच में यह स्पष्ट किया जाना है कि किन स्तरों पर चूक हुई और संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी क्या बनती है।
सुप्रीम कोर्ट में मामला उठने के बाद बढ़ी गंभीरता
युवराज की बहन हरसिमरन मनचंदा ने मामले को सुप्रीम कोर्ट में उठाया। रिपोर्ट के मुताबिक, सुनवाई के दौरान शुरुआती जांच में हुई चूकों और गलत निष्कर्षों के आधार पर मामला बंद हो जाने की आशंका पर गंभीर टिप्पणी की गई। अदालत के समक्ष पुलिस और मेडिकल प्रक्रिया की भूमिका से जुड़े सवाल रखे गए।
यह मामला अब केवल हत्या की जांच तक सीमित नहीं है। इसमें अज्ञात शवों की पहचान, राज्यों के बीच पुलिस समन्वय, फॉरेंसिक जांच की गुणवत्ता और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट की जवाबदेही जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे भी शामिल हो गए हैं।
अब विभागीय जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि शुरुआती जांच में कहां चूक हुई और संबंधित अधिकारियों की क्या जिम्मेदारी थी। किसी अधिकारी की लापरवाही या जानबूझकर साक्ष्य छिपाने की भूमिका पर अंतिम निष्कर्ष जांच के परिणामों के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए।
Akhil Mahajan