बिहार की सियासत में युग का अंत: मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ राज्यसभा जाएंगे नीतीश कुमार, बिहार की सत्ता में अब कौन बनेगा 'किंग'?
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पद से इस्तीफा देकर राज्यसभा जाने का फैसला किया है। 21 साल के ऐतिहासिक कार्यकाल के बाद 'विकास पुरुष' की इस विदाई से समर्थक भावुक हैं, वहीं एनडीए ने उनके फैसले का सम्मान करते हुए पूर्ण सहयोग का वादा किया है।
■ लोकसभा सांसद के रूप में पारी शुरू कर राज्यसभा के रास्ते नीतीश कुमार की विदाई
■ एनडीए ने नीतीश के फैसले का किया सम्मान और अमित शाह रहे नामांकन में मौजूद
■ विकास पुरुष के रूप में 21 साल का यादगार सफर और नई सरकार को सहयोग का वादा
बिहार की सियासत में पिछले दो दशकों से एक ही धुरी के इर्द-गिर्द सत्ता घूमती रही— नीतीश कुमार। 21 साल पहले जब नीतीश कुमार ने लोकसभा सांसद रहते हुए मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, तब किसी ने नहीं सोचा था कि उनकी इस लंबी पारी का समापन संसद के उच्च सदन यानी राज्यसभा के रास्ते होगा।
बिहार की सियासत में पिछले दो दशकों से सत्ता की धुरी रहे नीतीश कुमार अब एक नए सफर पर निकल पड़े हैं। लगभग 21 साल पहले लोकसभा सदस्य रहते हुए मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले नीतीश कुमार ने अब इस पद से विदा लेने और राज्यसभा जाने का निर्णय लिया है। यह खबर केवल एक इस्तीफे की नहीं बल्कि बिहार में एक बड़े राजनीतिक युग के अवसान की आहट है। नीतीश कुमार ने स्वयं राज्यसभा जाने की अपनी इच्छा प्रकट की थी जिसे एनडीए के घटक दलों ने न केवल स्वीकार किया बल्कि उनके इस फैसले का पूरा सम्मान भी किया है। उनके नामांकन के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की उपस्थिति ने साफ कर दिया कि भाजपा के साथ उनके रिश्ते अब भी मजबूती की नींव पर टिके हैं।
हालांकि नीतीश कुमार के इस अचानक फैसले से उनके समर्थकों में भारी मायूसी और नाराजगी देखी जा रही है। बिहार के विभिन्न हिस्सों में समर्थक सड़कों पर उतर आए हैं क्योंकि वे अपने नेता को इस तरह सत्ता से विदा होते नहीं देखना चाहते। नीतीश कुमार ने स्पष्ट किया है कि वे पद भले ही छोड़ रहे हों लेकिन विकसित बिहार बनाने का उनका संकल्प और नई बनने वाली सरकार को उनका सहयोग निरंतर जारी रहेगा। बिहार की जनता ने उन्हें विकास पुरुष का खिताब दिया था और 2005 के बाद से राज्य में जितने भी चुनाव हुए वे सीधे तौर पर उनके चेहरे और काम पर ही लड़े गए।
नीतीश कुमार का राजनीतिक कौशल ऐसा रहा कि बिहार का शायद ही कोई ऐसा दल हो जिसके साथ उन्होंने सरकार न बनाई हो। भाजपा के साथ लंबी पारी खेलने के अलावा उन्होंने राजद, कांग्रेस और वाम दलों के साथ भी गठबंधन किया। 2020 के विधानसभा चुनाव में जदयू को भाजपा से कम सीटें मिलने के बावजूद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपना वादा निभाया और नीतीश को ही मुख्यमंत्री बनाया। हालांकि गृह विभाग भाजपा के पास होने से सत्ता के संतुलन में बदलाव के संकेत पहले ही मिल चुके थे। अब नीतीश कुमार की राज्यसभा रवानगी के साथ ही बिहार में सत्ता का नया समीकरण आकार लेने जा रहा है...
'विकास पुरुष' का सफर: संघर्ष से शिखर तक
2005 में 'जंगलराज' के खात्मे के नारे के साथ सत्ता में आए नीतीश कुमार ने बिहार को 'सड़क, बिजली और सुशासन' की नई पहचान दी। उनके राजनीतिक कौशल का लोहा हर किसी ने माना: अजेय चेहरा: चाहे भाजपा के साथ हों या राजद के साथ, बिहार में चुनाव हमेशा नीतीश के चेहरे पर ही लड़ा गया। गठबंधन के उस्ताद: वे अकेले ऐसे नेता रहे जिन्हें भाजपा, राजद, कांग्रेस और वामपंथी दलों—सभी का साथ समय-समय पर मिला।
त्यागपत्र और राज्यसभा की 'अंतिम इच्छा'
नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना अचानक लिया गया फैसला नहीं, बल्कि उनकी एक पुरानी इच्छा बताई जा रही है। स्वास्थ्य कारणों और राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए उन्होंने सक्रिय मुख्यमंत्री की भूमिका से हटकर केंद्र की राजनीति या मार्गदर्शक की भूमिका में जाने का मन बनाया है। खास बात यह है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का उनके नामांकन में मौजूद रहना यह साफ संकेत देता है कि एनडीए में नीतीश कुमार का कद आज भी बरकरार है और यह विदाई बेहद सम्मानजनक तरीके से हो रही है।
सत्ता के समीकरणों में बदलाव
नीतीश के हटने के बाद बिहार की राजनीति में कई बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे। भाजपा की नई भूमिका: गृह विभाग पहले से पास होने के बाद, अब भाजपा राज्य में 'बड़े भाई' की भूमिका में पूरी तरह फिट होने की तैयारी में है। कार्यकर्ताओं का आक्रोश: नीतीश के समर्थक इस फैसले से भावुक हैं और सड़कों पर विरोध जता रहे हैं, जो उनके प्रति जनता के जुड़ाव को दर्शाता है। विरासत का सवाल: "2025 से 2030, फिर से नीतीश" का नारा देने वाली जेडीयू के लिए अब नेतृत्व का संकट और नई पहचान तलाशने की चुनौती होगी।
एक विदाई, कई यादें
नीतीश कुमार ने यह साफ कर दिया है कि वे भले ही पद छोड़ रहे हैं, लेकिन "विकसित बिहार" का उनका संकल्प नहीं बदलेगा। नई सरकार को उनका मार्गदर्शन मिलता रहेगा। बिहार के इतिहास में उन्हें एक ऐसे मुख्यमंत्री के रूप में याद किया जाएगा जिसने गठबंधन की राजनीति के विरोधाभासों के बीच भी अपनी प्रासंगिकता कभी कम नहीं होने दी।
निष्कर्ष:
बिहार की राजनीति अब 'नीतीश युग' से आगे बढ़ने को तैयार है। क्या नई सरकार उनके विकास के मॉडल को आगे ले जा पाएगी? यह देखना दिलचस्प होगा।
Akhil Mahajan