₹22,000 करोड़ के कर्ज विवाद पर सुभाष चंद्रा की सफाई, बोले- मेरी निजी उधारी शून्य
सुभाष चंद्रा ने ₹22,000 करोड़ कर्ज विवाद पर सफाई दी। उन्होंने निजी उधारी शून्य बताई और पर्सनल गारंटी, NCLT प्लान व ₹4,262 करोड़ के दावे पर जानकारी दी।
➤ सुभाष चंद्रा बोले- ₹22,000 करोड़ के कर्ज को लेकर भ्रम फैलाया गया
➤ कहा- मेरी निजी उधारी शून्य, ₹22,000 करोड़ पर्सनल गारंटी की कुल रकम
➤ लाइव आकर 3 पन्नों का डॉक्यूमेंट दिखाया, बोले- शेष ₹4,262 करोड़ का होगा निपटारा
हिसार। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) द्वारा ₹22 हजार करोड़ के कर्ज को महज ₹6.5 करोड़ में निपटाने के प्लान को मंजूरी मिलने के बाद जी ग्रुप के फाउंडर और हरियाणा के पूर्व राज्यसभा सांसद डॉ. सुभाष चंद्रा विवादों में घिर गए हैं। सोशल मीडिया पर चल रहे विवाद और #PaisaVapasKaro ट्रेंड के बीच अब सुभाष चंद्रा ने सफाई दी है।
सुभाष चंद्रा सोमवार सुबह सोशल मीडिया पर लाइव आए और 3 पन्नों का डॉक्यूमेंट शेयर करते हुए दावा किया कि पूरे मामले को लेकर गलत धारणाएं और गलतफहमी फैलाई जा रही हैं। हालांकि उन्होंने कमेंट सेक्शन को लॉक रखा और सिर्फ एक तरफा फीड दिया।
यह विवाद उस समय और गहरा गया था, जब भगोड़े कारोबारी विजय माल्या ने X (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट कर NCLT के फैसले को "भारतीय इंसाफ का असली मजाक" करार दिया था। माल्या ने आरोप लगाया था कि 22 हजार करोड़ रुपये के कर्ज को महज कुछ करोड़ में निपटाया जा रहा है।
सुभाष चंद्रा ने दस्तावेजों के जरिए रखे पांच प्रमुख दावे
सुभाष चंद्रा की ओर से जारी दस्तावेज में पूरे मामले को लेकर कई दावे किए गए हैं। उनके बयान के मुताबिक, उनकी व्यक्तिगत उधारी शून्य है। उनके अनुसार ₹22,000 करोड़ की राशि उनके द्वारा दी गई पर्सनल गारंटी की कुल रकम थी।
₹22,000 करोड़ की पर्सनल गारंटी में मूल उधारी के समय केवल ₹4,800 करोड़
दस्तावेज में स्पष्ट किया गया है कि ₹22,000 करोड़ की पर्सनल गारंटी में से केवल ₹4,800 करोड़ की गारंटी ही कंपनियों द्वारा कर्ज लेते समय दी गई थी। बाकी की गारंटी डिफॉल्ट होने के बाद दी गई थीं।
₹4,808 करोड़ में से ₹3,803 करोड़ चुकाए जाने का दावा
सुभाष चंद्रा की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, बैंकों और वित्तीय संस्थानों द्वारा जारी कुल राशि ₹4,808 करोड़ थी। इसमें से उधारकर्ताओं द्वारा ₹3,803 करोड़ वापस चुकाए जा चुके हैं। उनके मुताबिक, शेष मूल बकाया राशि केवल ₹998 करोड़ है।
₹5,311 करोड़ के दावे के मुकाबले शेष दावा ₹4,262 करोड़
बैंकों ने ₹998 करोड़ के मूल बकाए के खिलाफ कुल ₹5,311 करोड़ का दावा पेश किया था। इसमें से ₹1,049 करोड़ के दावों का निपटारा या भुगतान हो चुका है। इसके बाद अब शेष दावा ₹4,262 करोड़ का रह गया है।
शेष ₹4,262 करोड़ के भुगतान और निपटारे का भरोसा
सुभाष चंद्रा ने कहा कि उन्होंने सभी उधारकर्ताओं से चर्चा की है। उनके मुताबिक, उधारकर्ताओं ने आश्वासन दिया है कि लेंडर्स यानी बैंकों के साथ खातों के मिलान के बाद शेष ₹4,262 करोड़ का भुगतान और निपटारा कर दिया जाएगा।
प्रमुख बैंकों और लेंडर्स के बारे में दस्तावेज में क्या बताया गया
दस्तावेज में प्रमुख बैंकों और लेंडर्स से जुड़े आंकड़ों का भी ब्योरा दिया गया है।
इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस: ₹726 करोड़ के लोन में से ₹771 करोड़ वापस किए गए। व्यक्तिगत दिवालियापन कार्यवाही शुरू होने के बाद इसे पूरी तरह सेटल कर दिया गया है।
एक्सिस बैंक ग्रुप: ₹388 करोड़ के डिस्बर्समेंट में से ₹157 करोड़ चुकाए जा चुके हैं। सेटलमेंट प्रक्रिया के तहत शेष भुगतान जारी है।
वहीं HDFC ग्रुप, केनरा बैंक, एडेलवाइस, फ्रैंकलिन टेम्पलटन, इंडसइंड बैंक, LIC हाउसिंग फाइनेंस, RBL बैंक और यूनियन बैंक के पास या तो पर्याप्त सिक्योरिटी उपलब्ध थी या फिर इनके दावों का पुनर्मूल्यांकन और सेटलमेंट की प्रक्रिया चल रही है।
NCLT ने ₹22,006.57 करोड़ के कुल कर्ज के बदले ₹6.5 करोड़ का प्लान मंजूर किया
इंसॉल्वेंसी ट्रिब्यूनल NCLT ने सुभाष चंद्रा के रीपेमेंट प्लान को इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड की धारा 114 के तहत मंजूरी दी है। इसके तहत सुभाष चंद्रा को ₹22,006.57 करोड़ के कुल कर्ज के बदले महज ₹6.5 करोड़ का भुगतान करना होगा।
इसके बाद उनका बाकी का पूरा ₹22,000 करोड़ से अधिक का बकाया कानूनी तौर पर हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।
NCLT की दो सदस्यीय बेंच में पहले आई थी विभाजित राय
इस मामले में इससे पहले NCLT की दो सदस्यीय बेंच में विभाजित राय आई थी। इसके बाद NCLT चेयरमैन ने तीसरे सदस्य के रूप में जुडिशियल मेम्बर नीलेश शर्मा को नियुक्त किया।
नीलेश शर्मा ने बहुमत के आधार पर 144 पन्नों के आदेश में रीपेमेंट प्लान को मंजूरी दी।
क्या सुभाष चंद्रा ने खुद ₹22,006 करोड़ का पर्सनल लोन लिया था?
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सुभाष चंद्रा ने व्यक्तिगत तौर पर ₹22,006 करोड़ का लोन लिया था। दिए गए विवरण के मुताबिक, इसका जवाब नहीं है।
यह रकम सुभाष चंद्रा द्वारा दी गई पर्सनल गारंटी से जुड़ी है। जब किसी कंपनी या मूल कर्जदार को बैंक लोन देते हैं, तो कई बार प्रमोटर अपनी व्यक्तिगत गारंटी देता है कि अगर कंपनी भुगतान नहीं कर पाई तो वह इसे चुकाएगा।
एस्सेल ग्रुप की कंपनियों द्वारा लिए गए लोन के लिए सुभाष चंद्रा ने पर्सनल गारंटी दी थी। कंपनियों के डिफॉल्ट करने पर यह क्लेम सुभाष चंद्रा पर आ गया। इसका मतलब यह नहीं है कि उन्होंने यह सारा पैसा व्यक्तिगत तौर पर उधार लिया था।
साल 2016 में शुरू हुआ था मामला, 2022 में इंडियाबुल्स ने कार्रवाई शुरू की
यह पूरा मामला साल 2016 में शुरू हुआ था, जब इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस (IHF) ने कुछ कंपनियों को ₹726 करोड़ का लोन दिया।
2018 में डॉ. सुभाष चंद्रा इस लोन के पर्सनल गारंटर बने। यानी कंपनी के पैसे न चुकाने की स्थिति में उन्हें यह रकम भरनी थी।
जब कंपनियों ने डिफॉल्ट किया तो इंडियाबुल्स ने 2022 में सुभाष चंद्रा के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी। इसके बाद 2024 में NCLT ने इस केस को आगे बढ़ाया।
₹178 करोड़ के नोटिस से मामला ₹22,000 करोड़ तक कैसे पहुंचा?
मामले में यह सवाल भी उठता है कि शुरुआत ₹178 करोड़ के नोटिस से होकर रकम ₹22,000 करोड़ तक कैसे पहुंच गई। दिए गए विवरण के अनुसार, जब किसी व्यक्ति के खिलाफ इंसॉल्वेंसी प्रक्रिया शुरू होती है तो उसके सभी कर्जदाता अपना-अपना बकाया मांगने आ जाते हैं।
सुभाष चंद्रा ने एस्सेल ग्रुप की दूसरी कंपनियों के कर्जों के लिए भी HDFC, एक्सिस, कैनरा और RBL जैसे कई अन्य बैंकों को पर्सनल गारंटी दे रखी थी।
इन सभी बैंकों के पुराने कर्जों, सालों के भारी-भरकम ब्याज और पेनल्टी को आपस में मिलाकर कुल क्लेम ₹22,006.57 करोड़ हो गया। इसी ₹22,000 करोड़ के बकाए के बदले अब NCLT ने ₹6.5 करोड़ के रीपेमेंट प्लान को मंजूरी दी है।
LIC हाउसिंग फाइनेंस समेत कुछ कर्जदाताओं ने जताई थी आपत्ति
इस फैसले का विरोध भी हुआ था। LIC हाउसिंग फाइनेंस की अगुआई में कुछ कर्जदाताओं ने रीपेमेंट प्लान पर आपत्ति जताई थी।
LIC हाउसिंग ने इसे "अव्यवहारिक और गैर-कानूनी" बताते हुए कहा था कि उन्हें ₹1,322.39 करोड़ के बकाए के बदले केवल ₹38.09 लाख दिए जा रहे हैं।
80.81% वोटिंग शेयर वाले लेनदारों की मंजूरी के आधार पर प्लान मंजूर
NCLT ने असहमति जताने वाले लेनदारों की आपत्तियों को खारिज करते हुए पाया कि विरोध करने वाले लेनदारों के पास 20% से भी कम वोटिंग शेयर थे।
रीपेमेंट प्लान को 80.81% वोटिंग शेयर वाले लेनदारों की जरूरी मंजूरी मिल चुकी थी। कानून के मुताबिक बहुमत की मंजूरी के कारण ट्रिब्यूनल ने आपत्तियों को खारिज कर दिया।
क्या बैंकों का पूरा ₹22,000 करोड़ डूब गया?
दिए गए विवरण के अनुसार, इसका मतलब यह नहीं है कि बैंकों का ₹22,000 करोड़ का कर्ज पूरी तरह डूब गया। 99.97% का हेयरकट केवल सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत गारंटी के क्लेम पर लागू होता है।
जिन मूल कंपनियों ने लोन लिया था, वे अब भी कर्जदार बनी हुई हैं। बैंक उन कंपनियों, उनकी संपत्तियों और अन्य गिरवी रखे गए कोलेटरल से अपनी वसूली जारी रख सकते हैं।
NCLT ने भी अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि क्रेडिटर्स के पास मूल कर्जदारों से वसूली का अधिकार बना रहेगा।
बैंकिंग और कॉर्पोरेट सेक्टर के लिए क्यों अहम है यह फैसला?
यह फैसला आने वाले ऐसे सभी मामलों के लिए एक बड़ी मिसाल बनेगा। दिए गए विवरण के मुताबिक, इससे यह संदेश मिलता है कि अगर 75% से ज्यादा कर्ज देने वाले बैंक या लोग किसी रीपेमेंट प्लान पर राजी हो जाते हैं तो अदालत उनके इस कारोबारी फैसले को सर्वोच्च मानेगी।
ऐसी स्थिति में बैंकों को उनका 99% से ज्यादा पैसा छोड़ना पड़े और रिकवरी के नाम पर सिर्फ नाममात्र की रकम मिले, तब भी बहुमत से मंजूर रीपेमेंट प्लान को महत्व दिया जा सकता है।
Akhil Mahajan