अहीरवाल की राजनीति और दिल्ली का दखल : सीएम के मंच से दूरी की गूंज केंद्र तक, 'अपनों' की बगावत टटोल रही स्पेशल टीम
रेवाड़ी में मुख्यमंत्री के कार्यक्रम से मंत्री और तीन विधायकों की गैरमौजूदगी के बाद दिल्ली से स्पेशल टीम पहुंची। टीम ने 16 स्थानों का दौरा कर कार्यकर्ताओं से फीडबैक लिया। रिपोर्ट पर अब सभी की नजर है।
➤ सीएम के कार्यक्रम से मंत्री और तीन विधायकों की गैरमौजूदगी पर बढ़ी सियासी हलचल
➤ दिल्ली से आई 7 सदस्यीय टीम ने 16 स्थानों का दौरा कर 100 से अधिक कार्यकर्ताओं से जुटाई जानकारी
➤ स्पेशल टीम की रिपोर्ट के बाद पार्टी के अगले कदम पर टिकीं सभी की निगाहें
हरियाणा की राजनीति में यूं तो हर दिन एक नया पन्ना जुड़ता है, लेकिन जब बात दक्षिण हरियाणा यानी 'अहीरवाल' की हो, तो वहां नेताओं की खामोशी और गैरमौजूदगी भी बहुत कुछ कह जाती है। रेवाड़ी में 30 जून को जो हुआ, वह महज़ एक कार्यक्रम में न जाने का साधारण वाकया नहीं था; यह एक ऐसा सियासी संदेश था जिसकी तपिश अब सीधे दिल्ली के गलियारों तक महसूस की जा रही है।
मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के कार्यक्रम से जब अहीरवाल के कद्दावर नेता, मंत्री और तीन विधायक एक साथ नदारद हुए, तो जनता और आम कार्यकर्ताओं के मन में एक ही सवाल था— "आखिर अपनों ने ही इस मंच से दूरी क्यों बना ली?"
मंच बड़ा था, लेकिन 'अपने' ही नदारद
बावल कृषि कॉलेज में 'खेत बचाओ अभियान' का समापन समारोह था। मंच पर मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान जैसे बड़े चेहरे मौजूद थे। लेकिन उस भीड़ में स्थानीय लोगों की आंखें अपने नेताओं को तलाश रही थीं।
केंद्रीय राज्यमंत्री राव इंद्रजीत सिंह, जिले के तीनों भाजपा विधायक और पांच मंडल अध्यक्षों का कार्यक्रम से यूं अचानक गायब होना महज एक संयोग नहीं हो सकता। यह राजनीति के उस दर्द या असंतोष को बयां करता है, जो अक्सर पार्टी फोरम पर शब्दों में नहीं, बल्कि ऐसे ही मौन विरोध के रूप में सामने आता है।
कार्यकर्ताओं की उलझन और दिल्ली से आई 'स्पेशल 7'
जब बात दिल्ली तक पहुंची, तो डैमेज कंट्रोल के लिए मुख्यमंत्री ने 7 सदस्यीय स्पेशल टीम को रेवाड़ी भेजा। जरा उन ज़मीनी कार्यकर्ताओं की स्थिति सोचिए, जो दिन-रात पार्टी का झंडा उठाते हैं। वे अचानक खुद को बड़े नेताओं की गुटबाजी और आलाकमान की जांच के बीच फंसा हुआ पा रहे हैं।
टीम ने जो पड़ताल की, उसका दायरा देखिए:
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16 से अधिक गांवों/स्थानों का दौरा: टीम खोरी, भालखी-माजरा, शोभा की ढाणी, सुलखा, बावल, गढ़ी बोलनी और भाड़ावास जैसे कई अहम इलाकों में गई।
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100 से ज्यादा कार्यकर्ताओं से संपर्क: कुछ से आमने-सामने मिले, तो कुछ से फोन पर बात की। एक तरह से यह कार्यकर्ताओं के मन को टटोलने की कोशिश थी।
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ऑडियो रिकॉर्डिंग: कुछ कार्यकर्ताओं की सहमति से उनकी बातें रिकॉर्ड भी की गईं, ताकि दिल्ली दरबार में जमीनी हकीकत का कच्चा चिट्ठा जस-का-तस पेश किया जा सके।
सियासी हलचल: विवाद बढ़ने की भनक लगते ही दो भाजपा विधायकों ने प्रदेशाध्यक्ष डॉ. अर्चना गुप्ता से मुलाकात कर अपनी बात रखी है। इसे राजनीति की भाषा में 'डैमेज कंट्रोल' कहा जाता है, जहां नेता यह समझाने की कोशिश करते हैं कि उनकी गैरमौजूदगी के पीछे कोई बगावत नहीं, बल्कि कोई और 'मजबूरी' थी।
विपक्ष के तीखे तीर और जनता का आत्मसम्मान
सियासत में जब सत्ता पक्ष के घर में दरार दिखती है, तो विपक्ष कभी खामोश नहीं बैठता। पूर्व मंत्री जसवंत सिंह ने ठीक उस दुखती रग पर हाथ रखा, जो जनता से जुड़ी है। उनका यह कहना कि— "बावल के विधायक सोमवार शाम तक कार्यक्रम की तैयारियों में पसीना बहा रहे थे, फिर अचानक गायब क्यों हो गए?"—सीधे तौर पर यह सवाल उठाता है कि क्या यह मुख्यमंत्री के साथ-साथ जनता का भी अपमान नहीं है? जब स्थानीय नेता ही अपने घर आए मेहमान (सीएम और केंद्रीय मंत्री) का स्वागत करने नहीं पहुंचे, तो आम आदमी इसे अपने इलाके की अनदेखी के तौर पर भी देख सकता है।
अब सबकी नजरें उस 'सीक्रेट रिपोर्ट' पर टिकी हैं जो अगले 2-3 दिन में मुख्यमंत्री की टेबल पर होगी। क्या यह महज़ प्रोटोकॉल का मुद्दा था? क्या संगठन के भीतर कोई गहरा असंतोष सुलग रहा है? या फिर यह आगामी चुनावों से पहले अहीरवाल के क्षत्रपों की कोई सोची-समझी राजनीतिक रणनीति है?
पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब अनुशासन का डंडा चलाने और अहीरवाल के इस मजबूत किले को टूटने से बचाने के बीच संतुलन साधने की है। अगर कार्रवाई सख्त हुई, तो चुनाव से पहले भितरघात का डर है; और अगर मामला यूं ही रफा-दफा कर दिया गया, तो संगठन में अनुशासनहीनता का गलत संदेश जाएगा।
हरियाणा का अहीरवाल अपनी राजनीतिक वफादारी और खुद्दारी दोनों के लिए जाना जाता है। रेवाड़ी की खाली कुर्सियों ने आलाकमान को यह तो बता ही दिया है कि इस इलाके की राजनीति को हल्के में नहीं लिया जा सकता। अब देखना यह है कि दिल्ली से लौटकर यह स्पेशल टीम पार्टी नेतृत्व को 'कड़वी सच्चाई' का घूंट पिलाती है या सब कुछ 'ऑल इज वेल' की चादर से ढक दिया जाता है।
Akhil Mahajan