‘वकील हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि अदालत पर दबाव बनाएं’, पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने लगाई फटकार

पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने पीठ से अलग होने की मांग करने वाले वकील को फटकार लगाई। अदालत ने ठोस आधार जरूरी बताया और सुनवाई 28 जनवरी 2027 तक टाली।

‘वकील हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि अदालत पर दबाव बनाएं’, पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने लगाई फटकार

हाई कोर्ट ने वकील की पीठ से अलग होने की मांग ठुकराई
अदालत बोली- वकील होने का मतलब यह नहीं कि न्यायिक प्रक्रिया पर दबाव बनाया जाए
सुनवाई 28 जनवरी 2027 तक टली, पारिवारिक अदालत की कार्यवाही जारी रहेगी


पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक वकील की उस मांग को खारिज कर दिया, जिसमें उसने सुनवाई कर रही पीठ से अलग होने का अनुरोध किया था। अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि केवल इसलिए कि कोई पक्षकार स्वयं हाई कोर्ट में वकालत करता है, उसे अदालत पर दबाव बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

जस्टिस अलका सरीन और जस्टिस मोनिका छिब्बर शर्मा की खंडपीठ ने कहा कि यदि पक्षकारों के कहने मात्र पर पीठ से अलग होने की मांग स्वीकार की जाने लगे तो इससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी पक्षकार को पीठ से अलग होने का अधिकार नहीं है और इसके लिए ठोस व वैध आधार होना जरूरी है।

मामला एक पारिवारिक अपील की सुनवाई से जुड़ा था। खास बात यह है कि इस मामले में अपीलकर्ता स्वयं हाई कोर्ट में वकील है और अदालत में खुद ही अपनी पैरवी कर रहा था। सुनवाई के दौरान घटनाक्रम कई तारीखों तक चला, जिसके बाद नौ सितंबर को अपीलकर्ता ने बहस करने के बजाय पीठ से अलग होने का अनुरोध कर दिया।

19 अगस्त को सूचीबद्ध था मामला, फिर लगातार बढ़ती गई सुनवाई की तारीख

अदालत ने अपने आदेश में पिछली सुनवाइयों का भी उल्लेख किया। मामला 19 अगस्त को सूचीबद्ध था। पहली पुकार पर इसे आगे के लिए रख दिया गया।

इसके बाद दूसरी पुकार पर अपीलकर्ता की ओर से स्थगन की मांग की गई। अदालत ने न्याय के हित में इस मांग को स्वीकार करते हुए सुनवाई को 25 अगस्त तक स्थगित कर दिया।

25 अगस्त को भी अपीलकर्ता के वकील के अनुरोध पर मामले की सुनवाई आगे बढ़ा दी गई। इसके बाद अगली तारीख नौ सितंबर निर्धारित की गई।

नौ सितंबर को खुद अदालत पहुंचा वकील, लेकिन बहस की जगह की पीठ से अलग होने की मांग

नौ सितंबर को अपीलकर्ता स्वयं अदालत में पेश हुआ। हालांकि, उसने मामले में बहस करने के बजाय सुनवाई कर रही पीठ से अलग होने का अनुरोध कर दिया।

पीठ ने इस मांग को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और मामले को कुछ समय के लिए आगे कर दिया। बाद में जारी आदेश में अदालत ने इस तरह की मांगों को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट की।

अदालत ने कहा कि पीठ से अलग होने की मांग केवल पक्षकार के अनुरोध पर स्वीकार नहीं की जा सकती। इसके लिए ऐसा ठोस और वैध आधार होना चाहिए, जिससे यह मांग उचित ठहरे।

‘हर असहज सवाल पर पीठ बदलने की मांग होने लगेगी’

खंडपीठ ने कहा कि यदि पक्षकारों के कहने मात्र पर पीठ से अलग होने की मांग स्वीकार की जाने लगी तो इससे न्यायिक प्रक्रिया पर गंभीर असर पड़ेगा।

अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में जब भी किसी पक्षकार को लगेगा कि पीठ उसके पक्ष में सहमत नहीं है या उससे कोई असहज सवाल पूछा जा रहा है, वह पीठ से अलग होने की मांग करने लगेगा।

अदालत के मुताबिक, इससे न्यायिक कार्यवाही की निष्पक्षता और निरंतरता प्रभावित होगी। इसलिए केवल पक्षकार की इच्छा के आधार पर पीठ से अलग होने की मांग को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

वकील होने के आधार पर अदालत पर दबाव बनाने की अनुमति नहीं

हाई कोर्ट ने इस मामले में विशेष रूप से कहा कि केवल इसलिए कि वर्तमान मामले में अपीलकर्ता इस अदालत में वकालत करने वाला वकील है, उसे अदालत पर दबाव बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

खंडपीठ ने कानून की स्थापित स्थिति का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि किसी पक्षकार को पीठ से अलग होने का अधिकार नहीं है। इसके लिए ठोस और वैध आधार होना जरूरी है।

अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान ऐसा कोई आधार नहीं पाया, जिसके आधार पर पीठ से अलग होने की मांग स्वीकार की जा सके। इसी वजह से अपीलकर्ता की यह मांग खारिज कर दी गई।

बहस से किया इनकार, हाई कोर्ट ने फिर दिया एक और मौका

पीठ की ओर से मांग खारिज किए जाने के बाद अपीलकर्ता ने स्वयं पेश होकर कहा कि वह मामले में बहस नहीं करना चाहता।

इसके बाद हाई कोर्ट ने न्याय के हित में उसे एक और अवसर देने का फैसला किया। अदालत ने मामले की सुनवाई को अब 28 जनवरी 2027 तक स्थगित कर दिया है।

इस तरह अदालत ने एक तरफ पीठ से अलग होने की मांग को स्वीकार नहीं किया, वहीं अपीलकर्ता को अपना पक्ष रखने के लिए आगे एक और मौका दिया है।

पारिवारिक अदालत की कार्यवाही पर रोक नहीं

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में एक और महत्वपूर्ण बात स्पष्ट की। अदालत ने कहा कि इस अपील के लंबित रहने से पारिवारिक अदालत में चल रही कार्यवाही पर कोई रोक नहीं लगेगी

पीठ ने साफ किया कि वर्तमान अपील लंबित होने की स्थिति पारिवारिक अदालत की कार्यवाही जारी रखने में किसी तरह की बाधा नहीं बनेगी। यानी हाई कोर्ट में अपील की सुनवाई लंबित रहने के बावजूद पारिवारिक अदालत में चल रही कार्यवाही अपने स्तर पर जारी रह सकेगी।