विश्वविद्यालय में शैक्षणिक अन्याय का आरोप, शोधार्थी आमरण अनशन पर
विश्वविद्यालय में पीएचडी प्रक्रिया रोके जाने के विरोध में शोधार्थी आमरण अनशन पर बैठा। प्रशासन पर उत्पीड़न और अकादमिक नियमों के उल्लंघन के गंभीर आरोप लगाए।
- विश्वविद्यालय प्रशासन पर शोधार्थी ने पीएचडी प्रक्रिया रोकने का आरोप
- विधानसभा समिति के समक्ष अव्यवस्थाएं उठाने के बाद बढ़ा उत्पीड़न का दावा
- न्याय और समयबद्ध निर्णय की मांग को लेकर 15 दिसंबर से आमरण अनशन
विश्वविद्यालय में शैक्षणिक और प्रशासनिक अव्यवस्थाओं को विधानसभा समिति के समक्ष उठाने के बाद एक शोधार्थी को कथित रूप से प्रताड़ना का सामना करना पड़ रहा है। पीड़ित शोधार्थी संदीप कुमार ने विश्वविद्यालय प्रशासन पर उनकी पीएचडी प्रक्रिया को नियमों के विपरीत रोकने का गंभीर आरोप लगाया है।
संदीप कुमार ने बताया कि उनकी पीएचडी से जुड़ी सभी प्रगति रिपोर्ट संतोषजनक रही हैं और प्री सबमिशन सहित आवश्यक शैक्षणिक अनुमतियां पहले ही स्वीकृत की जा चुकी थीं। इसके बावजूद बिना किसी लिखित आदेश या स्पष्ट कारण के उनकी सबमिशन प्रक्रिया को रोक दिया गया।
शोधार्थी का कहना है कि उनके खिलाफ की गई शिकायतें निराधार थीं, जिन्हें स्वयं शिकायतकर्ता द्वारा वापस ले लिया गया है और इस संबंध में रिग्रेट भी दर्ज कराया गया है। इसके बाद भी प्रशासन द्वारा कोई ठोस और समयबद्ध निर्णय नहीं लिया गया।
बार बार लिखित अनुरोध के बावजूद समाधान न मिलने से मानसिक और शैक्षणिक क्षति झेलने का आरोप लगाते हुए संदीप कुमार ने 15 दिसंबर 2025 से आमरण अनशन शुरू कर दिया है। उन्होंने इसे शांतिपूर्ण बताते हुए कहा कि उनका उद्देश्य केवल न्याय, पारदर्शिता और अकादमिक नियमों के अनुसार निर्णय सुनिश्चित कराना है।
शोधार्थी ने विश्वविद्यालय प्रशासन से लंबित सभी प्रक्रियाओं के तत्काल निस्तारण, निराधार शिकायतों के आधार पर की गई कार्रवाइयों को निरस्त करने और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग की है। साथ ही भविष्य में शोधार्थियों के मामलों में देरी न हो, इसके लिए स्पष्ट समय सीमा तय करने की अपील भी की है।
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