ऑपरेशन सिंदूर के हीरो को राम मंदिर की कमान क्यों मिली? जितेंद्र मिश्र के चयन की ये हैं 3 बड़ी वजहें

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान वेस्टर्न एयर कमांड संभालने वाले जितेंद्र मिश्र राम मंदिर के पहले CEO बने। जानिए चयन की तीन बड़ी वजहें और उनकी जिम्मेदारियां।

ऑपरेशन सिंदूर के हीरो को राम मंदिर की कमान क्यों मिली? जितेंद्र मिश्र के चयन की ये हैं 3 बड़ी वजहें

ऑपरेशन सिंदूर में वेस्टर्न एयर कमांड की कमान संभाल चुके हैं जितेंद्र मिश्र
39 साल के सैन्य करियर और पेशेवर छवि ने मजबूत किया दावा
देवरिया से जुड़ाव और 16 इंटरव्यू के बाद तीन नामों के पैनल में पहुंचे


अयोध्या के राम मंदिर ट्रस्ट ने पहली बार मुख्य कार्यकारी अधिकारी यानी CEO का पद बनाया और इस अहम जिम्मेदारी के लिए रिटायर्ड एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र को चुना है। वायुसेना में करीब चार दशक का अनुभव रखने वाले मिश्र ऑपरेशन सिंदूर के दौरान वेस्टर्न एयर कमांड की कमान संभाल रहे थे। अब वायुसेना से रिटायर होने के कुछ ही महीनों बाद उन्हें राम मंदिर के बढ़ते प्रशासन की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

जितेंद्र मिश्र का चयन केवल ऑपरेशन सिंदूर से जुड़ी उनकी पहचान की वजह से नहीं हुआ। उनके करीब 39 साल के सैन्य करियर, साफ-सुथरी पेशेवर छवि और उत्तर प्रदेश से जुड़ाव को भी इस फैसले की अहम कड़ियां माना जा रहा है। खास बात यह है कि CEO पद की शुरुआती चर्चा में उनका नाम प्रमुखता से सामने नहीं आया था। 16 लोगों के इंटरव्यू के बाद तीन नामों का पैनल तैयार हुआ और इसी पैनल में जगह बनाकर जितेंद्र मिश्र राम मंदिर ट्रस्ट के पहले CEO चुने गए।

ऑपरेशन सिंदूर ने बनाई मजबूत पहचान

जितेंद्र मिश्र के चयन की पहली बड़ी वजह ऑपरेशन सिंदूर से जुड़ी उनकी भूमिका मानी जा रही है। जब भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया, उस समय वेस्टर्न एयर कमांड की कमान जितेंद्र मिश्र के पास थी। पश्चिमी मोर्चे पर वायुसेना की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी उनके नेतृत्व में थी।

13 मई को ऑपरेशन सिंदूर के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब आदमपुर एयर फोर्स स्टेशन पहुंचे थे, तब जितेंद्र मिश्र ने उनका स्वागत किया था। ऑपरेशन के दौरान उनकी भूमिका और बाद में सामने आई तस्वीरों ने भी उन्हें सार्वजनिक चर्चा में ला दिया। सैन्य सेवा के लिए उन्हें सर्वोच्च युद्ध सेवा मेडल भी मिला है। ऐसे में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उनके नेतृत्व से बनी पहचान को CEO पद के चयन की सबसे अहम कड़ियों में माना जा रहा है।

करीब चार दशक का सैन्य अनुभव बना दूसरी बड़ी वजह

जितेंद्र मिश्र के चयन की दूसरी बड़ी वजह उनका लंबा सैन्य अनुभव है। उन्होंने करीब चार दशक भारतीय वायुसेना में बिताए और इस दौरान अलग-अलग महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। कई स्तरों पर कमान का अनुभव हासिल करने के साथ उन्होंने बड़े ऑपरेशनल सिस्टम और टीमों के साथ काम किया।

राम मंदिर अब केवल धार्मिक स्थल तक सीमित नहीं है। यहां हर दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंदिर से जुड़ी व्यवस्थाएं, नए प्रोजेक्ट और पूरे परिसर के संचालन का दायरा भी लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में ट्रस्ट को ऐसे व्यक्ति की जरूरत है, जिसे बड़े स्तर पर व्यवस्था संभालने और अलग-अलग टीमों के साथ काम करने का अनुभव हो।

सैन्य सेवा में अनुशासन, समय पर काम पूरा करना, बड़ी टीम का नेतृत्व और मुश्किल परिस्थितियों में फैसले लेना महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां होती हैं। यही अनुभव CEO की भूमिका में भी उपयोगी हो सकता है। ट्रस्ट को उम्मीद है कि जितेंद्र मिश्र का प्रशासनिक और कमान का अनुभव राम मंदिर की व्यवस्था को आगे बढ़ाने में मदद करेगा।

उत्तर प्रदेश से जुड़ाव भी बना अहम कड़ी

जितेंद्र मिश्र के चयन की तीसरी बड़ी वजह उनका उत्तर प्रदेश से संबंध है। उनका संबंध देवरिया से है। राम मंदिर अयोध्या में है और ट्रस्ट का पूरा कामकाज उत्तर प्रदेश से जुड़ा हुआ है। ऐसे में प्रदेश से उनका जुड़ाव भी चयन की प्रक्रिया में एक अहम कड़ी माना जा रहा है।

एक ओर जितेंद्र मिश्र के पास देश की सुरक्षा और बड़े सैन्य अभियानों का अनुभव है, वहीं दूसरी ओर उनका उत्तर प्रदेश से संबंध है। ट्रस्ट की नई प्रशासनिक व्यवस्था में दोनों पहलुओं को उपयोगी माना जा सकता है। इसलिए उनके चयन को केवल उनकी सैन्य पृष्ठभूमि से जोड़कर देखना पूरी तस्वीर नहीं होगी।

शुरुआत में दौड़ में नहीं था जितेंद्र मिश्र का नाम

जितेंद्र मिश्र का नाम CEO पद की दौड़ में शुरुआत से सबसे आगे नहीं था। शुरुआती चर्चा में पूर्व IAS योगेश्वर राम मिश्र, पूर्व IPS राजेश पांडेय, बिहार कैडर के IPS डॉ. परेश सक्सेना और IAS दिनेश सिंह जैसे नाम सामने आए थे। जितेंद्र मिश्र उस शुरुआती चर्चा में शामिल नहीं थे।

इसके बाद ट्रस्ट ने CEO के चयन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई। कुल 16 लोगों के इंटरव्यू लिए गए। इंटरव्यू के बाद तीन नामों का पैनल तैयार किया गया, जिसमें जितेंद्र मिश्र भी शामिल थे। इसके बाद ट्रस्ट ने उनके नाम पर मुहर लगाकर उन्हें पहला CEO नियुक्त कर दिया। यानी उनका चयन अचानक सामने आए किसी नाम के आधार पर नहीं हुआ, बल्कि वह चयन प्रक्रिया के अंतिम चरण तक पहुंचे और फिर इस महत्वपूर्ण पद के लिए चुने गए।

राम मंदिर ट्रस्ट में पहली बार CEO का पद क्यों बनाया गया?

राम मंदिर ट्रस्ट में CEO का पद पहली बार बनाया गया है। इसके पीछे मंदिर के कामकाज के लगातार बढ़ते दायरे को अहम वजह माना जा रहा है। मंदिर निर्माण के साथ अब श्रद्धालुओं की व्यवस्था, मंदिर संचालन, रखरखाव, नए प्रोजेक्ट और अयोध्या के विकास से जुड़े काम भी सामने हैं। आने वाले समय में ट्रस्ट के सामने कई बड़ी जिम्मेदारियां होंगी। ऐसे में रोजमर्रा के प्रशासन और बड़े प्रोजेक्ट के बीच तालमेल बनाए रखना जरूरी होगा। CEO की भूमिका इसी व्यवस्था को मजबूत करने के लिए तय की गई है।

ट्रस्ट की ओर से CEO की जिम्मेदारियों को लेकर SOP भी तैयार की जाएगी। इसमें यह तय किया जाएगा कि CEO के पास कौन-कौन से अधिकार होंगे और उनकी जिम्मेदारियों का दायरा कितना होगा। जरूरत पड़ने पर आगे संयुक्त CEO या डिप्टी CEO की नियुक्ति भी की जा सकती है।

चढ़ावा चोरी विवाद के बाद बदली ट्रस्ट की व्यवस्था

CEO का पद बनाए जाने को हाल के प्रशासनिक बदलावों के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। जून में मंदिर के चढ़ावे से जुड़े रुपयों में हेराफेरी का विवाद सामने आने के बाद जांच के लिए SIT बनाई गई और मुकदमा दर्ज किया गया। इस मामले में आठ लोगों को गिरफ्तार किया गया।

इसके बाद जुलाई में चंपत राय और अनिल मिश्रा ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया। 6 और 22 जुलाई की बैठकों में ट्रस्ट के पूरे कामकाज को नए सिरे से ढालने का फैसला हुआ। इसी प्रक्रिया में जगदीश आफले को पहला सचिव चुना गया, जबकि मुश्किल दौर में कृष्ण मोहन ने अंतरिम महासचिव के तौर पर जिम्मेदारी संभाली। अब 2 सितंबर को अयोध्या में हुई बैठक में स्वामी गोविंद देव गिरि को ट्रस्ट का नया महासचिव बनाया गया और महेश भागचंदका को कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई।

इसी बैठक में ट्रस्ट में तीन नए सदस्य भी शामिल किए गए। शिकोहाबाद की डॉ. निर्मला यादव, अयोध्या के मदन मोहन पांडेय और दिल्ली के महेश भागचंदका अब ट्रस्ट का हिस्सा हैं। डॉ. निर्मला यादव ट्रस्ट की पहली महिला सदस्य बनी हैं। वहीं मदन मोहन पांडेय रामलला की ओर से राम जन्मभूमि मामले में अदालत में कानूनी लड़ाई लड़ चुके हैं। महेश भागचंदका का संबंध अशोक सिंघल के परिवार से बताया जाता है।

सैन्य अनुशासन से मंदिर प्रशासन को कितना फायदा होगा?

जितेंद्र मिश्र की नियुक्ति को ट्रस्ट की नई प्रशासनिक सोच के हिस्से के तौर पर भी देखा जा रहा है। करीब 40 साल की सैन्य सेवा वाले व्यक्ति को पहला CEO बनाना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि ट्रस्ट अपने प्रशासन में अनुशासन और बेहतर प्रबंधन को प्राथमिकता देना चाहता है।

ऑपरेशन सिंदूर में नेतृत्व, लंबा सैन्य अनुभव और उत्तर प्रदेश से जुड़ाव—ये तीनों बातें जितेंद्र मिश्र के चयन की कहानी को समझने में अहम हैं। अब उनकी असली परीक्षा यह होगी कि वायुसेना में बड़े ऑपरेशन और व्यवस्थाओं को संभालने का अनुभव राम मंदिर जैसी विशाल और लगातार बढ़ती व्यवस्था को चलाने में कितना उपयोगी साबित होता है।