राष्ट्रपति तक पहुंची मुरथल विश्वविद्यालय के दिव्‍यांग कर्मचारी की गुहार

मुरथल विश्वविद्यालय के 70 प्रतिशत दिव्यांग कर्मचारी ने प्रशासन पर मानसिक उत्पीड़न और पदावनति के आरोप लगाते हुए राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और हरियाणा सरकार से न्याय की मांग की है।

राष्ट्रपति तक पहुंची मुरथल विश्वविद्यालय के दिव्‍यांग कर्मचारी की गुहार
  • मुरथल विश्वविद्यालय के 70 प्रतिशत दिव्यांग कर्मचारी ने राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री से लगाई न्याय की गुहार
  • विश्वविद्यालय प्रशासन पर मानसिक उत्पीड़न और पदावनति के गंभीर आरोप
  • दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 के तहत सख्त कार्रवाई की मांग

सोनीपत: हरियाणा के दीनबंधु छोटू राम विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (डीक्रस्ट), मुरथल में कार्यरत एक 70 प्रतिशत दिव्यांग कर्मचारी ने विश्वविद्यालय प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदों तक न्याय की गुहार लगाई है। दिव्यांग कर्मचारी आनंद कुमार ने भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, हरियाणा के राज्यपाल, मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री और दिव्यांग आयोग को पत्र भेजकर अपने साथ हो रहे कथित उत्पीड़न की निष्पक्ष जांच कराने और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।

आनंद कुमार ने आरोप लगाया है कि विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा पिछले लंबे समय से उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है। उन्होंने मांग की है कि जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 के तहत नियमानुसार कड़ी कार्रवाई की जाए।

गौरतलब है कि आनंद कुमार को हरियाणा सरकार द्वारा दो बार अति कुशल दिव्यांग कर्मचारी सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है। इसके अलावा वे अब तक 82 बार रक्तदान भी कर चुके हैं।

आनंद कुमार ने बताया कि उन्होंने 30 मार्च 2018 को विश्वविद्यालय में सहायक कुलसचिव पद पर कार्यभार ग्रहण किया था। वर्ष 2019 में उनका प्रोबेशन सफलतापूर्वक पूरा हो गया था और उन्हें स्थायी नियुक्ति आदेश भी प्राप्त हो चुके थे।

उनका आरोप है कि चार वर्षों तक बेहतर कार्य करने के बावजूद वर्ष 2022 में बिना उनका पक्ष सुने उन्हें दोबारा कार्यालय अधीक्षक पद पर पदावनत कर दिया गया। उन्होंने कहा कि उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर तक नहीं दिया गया, जबकि उनके बाद नियुक्त कई जूनियर कर्मचारी उच्च पदों पर कार्यरत हैं और उन्हें उन्हीं के अधीन काम करना पड़ रहा है।

आनंद कुमार का कहना है कि पदोन्नति के समय उन्होंने केवल शैक्षणिक योग्यता में छूट की मांग की थी। उन्होंने दावा किया कि विश्वविद्यालय बनने से पहले संबंधित कॉलेज के सेवा नियमों में पदोन्नति के लिए केवल दसवीं पास और अधीक्षक पद का अनुभव आवश्यक था, जिसके आधार पर अन्य कर्मचारियों को भी पदोन्नति दी जा चुकी है।

उन्होंने बताया कि अक्टूबर 2025 में उन्होंने बी.ए. डिग्री पूरी कर ली थी, जो सहायक कुलसचिव पद के लिए निर्धारित शैक्षणिक योग्यता है। ऐसे में उनकी पदोन्नति दोबारा बहाल की जानी चाहिए।

दिव्यांग कर्मचारी ने विश्वविद्यालय प्रशासन पर यह आरोप भी लगाया कि उन्हें एम.ए. दूरस्थ शिक्षा करने की अनुमति नहीं दी गई। उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षा जारी रखने से रोकना उनके अधिकारों का हनन है।

आनंद कुमार ने यह भी आरोप लगाया कि पदावनति के बाद उनका सरकारी आवास खाली कराने की तैयारी शुरू कर दी गई। उन्होंने कहा कि उन्हें विश्वविद्यालय परिसर में वर्ष 2021 में नियमानुसार सी-58 सरकारी आवास आवंटित किया गया था, जबकि समान पे लेवल के कई कर्मचारी अब भी ऐसे आवासों में रह रहे हैं।

उन्होंने दावा किया कि कुलपति द्वारा जानबूझकर उन्हें मानसिक दबाव में लाने की कोशिश की जा रही है। आनंद कुमार के अनुसार इस तनाव के कारण उनकी पत्नी को हार्ट अटैक आया और अब उनका हृदय केवल 20 प्रतिशत ही कार्य कर रहा है।

आनंद कुमार ने कहा कि उन्हें प्रशासनिक भवन से हटाकर विश्वविद्यालय पुस्तकालय में स्थानांतरित कर दिया गया, जहां उनसे कथित तौर पर अधीक्षक पद से नीचे स्तर के कार्य कराए जा रहे हैं।

उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले दो वर्षों से अधिक समय से उनसे डायरी-डिस्पैच और टाइपिंग जैसे कार्य कराए जा रहे हैं, जबकि अधीक्षक स्तर के अधिकारी के अधीन सहायक और क्लर्क कार्य करते हैं। उनका कहना है कि यह सब उन्हें मानसिक रूप से परेशान करने और नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर करने की मंशा से किया जा रहा है।

आनंद कुमार ने कहा कि वे विश्वविद्यालय की गैर-शिक्षण कर्मचारी यूनियन डीसीआरयूईयू के प्रधान भी रह चुके हैं। उन्होंने बताया कि 21 अगस्त 2024 को शिक्षक संघ और कर्मचारी यूनियन की संयुक्त बैठक के बाद विश्वविद्यालय की कथित अनियमितताओं को लेकर राज्यपाल एवं कुलाधिपति को प्रतिवेदन भेजा गया था।

उनका आरोप है कि विश्वविद्यालय की अनियमितताएं उजागर होने के बाद कुलपति उनसे नाराज हो गए और तभी से उन्हें मानसिक प्रताड़ना दी जा रही है।,हालांकि इन आरोपों पर विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से फिलहाल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

दिव्यांग कर्मचारी ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और राज्य सरकार से मामले की निष्पक्ष जांच कर न्याय दिलाने तथा दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है ताकि भविष्य में किसी भी दिव्यांग कर्मचारी के साथ ऐसा व्यवहार न हो सके।