हरियाणा में कच्चे कर्मचारियों के नियमितीकरण को लेकर तीन माह में आएगा फैसला,हाई कोर्ट का बड़ा आदेश
हरियाणा हाई कोर्ट ने 11 साल से सेवाएं दे रहे कच्चे कर्मचारियों के नियमितीकरण मामलों पर तीन महीने में फैसला लेने के आदेश दिए हैं। कर्मचारियों को बड़ी राहत मिली है।
हरियाणा के कच्चे कर्मचारियों को हाई कोर्ट से बड़ी राहत
नियमितीकरण मांग पर तीन महीने में फैसला लेने के आदेश
11 साल से ज्यादा सेवा दे रहे कर्मचारियों के दावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकेगा
चंडीगढ़: हरियाणा में लंबे समय से कार्यरत कच्चे कर्मचारियों को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। करीब 11 वर्षों से अधिक समय से सेवाएं दे रहे कर्मचारियों के नियमितीकरण की मांग पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने संबंधित निगम को तीन महीने के भीतर फैसला लेने का आदेश दिया है। अदालत के इस फैसले को प्रदेश के हजारों अस्थायी कर्मचारियों के लिए अहम माना जा रहा है।
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने निगम के प्रबंध निदेशक को निर्देश दिए कि याचिकाकर्ताओं के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट के हालिया ‘मदन सिंह बनाम हरियाणा राज्य’ फैसले के आलोक में तय समयसीमा के भीतर निर्णय लिया जाए। अदालत ने कहा कि कर्मचारियों के दावों को नियमों और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार गंभीरता से देखा जाना चाहिए।
यह मामला वर्ष 2015 से लंबित था। भारत भूषण व अन्य द्वारा दायर याचिका को हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 16 अप्रैल 2026 के महत्वपूर्ण फैसले के बाद पुनर्जीवित करते हुए अंतिम रूप से निस्तारित किया। अदालत ने अपने आदेश में साफ कहा कि हरियाणा सरकार की 18 जून 2014 की नियमितीकरण नीति, जिसे बाद में 20 जून और 28 जुलाई 2014 की अधिसूचनाओं से स्पष्ट किया गया था, अब सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वैध घोषित की जा चुकी है।
हाई कोर्ट ने माना कि जब सुप्रीम कोर्ट समान परिस्थितियों वाले कर्मचारियों के पक्ष में नीति को वैध ठहरा चुका है, तब पात्र कर्मचारियों के दावों की अनदेखी नहीं की जा सकती। अदालत ने निगम को निर्देश दिया कि प्रत्येक कर्मचारी के मामले की निष्पक्ष और विधिसम्मत जांच की जाए।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि वे वर्ष 2005 से 2010 के बीच अलग-अलग तिथियों पर पहले हारट्रॉन के माध्यम से और बाद में सीधे निगम में डेटा एंट्री ऑपरेटर के रूप में नियुक्त किए गए थे। इसके बाद से वे लगातार बिना किसी सेवा-विराम के काम कर रहे हैं। कर्मचारियों का कहना था कि वे नियमितीकरण नीति की सभी शर्तों को पूरा करते हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें स्थायी सेवा का लाभ नहीं दिया गया।
सुनवाई के दौरान कर्मचारियों की ओर से दलील दी गई कि अब जबकि सुप्रीम कोर्ट ने समान परिस्थितियों वाले कर्मचारियों के पक्ष में फैसला दिया है, ऐसे में बिजली निगम को भी उनके मामलों पर सकारात्मक और निष्पक्ष निर्णय लेना चाहिए। वहीं निगम की ओर से अदालत को भरोसा दिया गया कि सभी मामलों की कानून के अनुसार जांच कर समयबद्ध फैसला लिया जाएगा।
अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि प्रबंध निदेशक इस याचिका को एक व्यापक प्रतिनिधित्व मानते हुए प्रत्येक कर्मचारी को सुनवाई का अवसर दें। साथ ही आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के तीन महीने के भीतर कारणयुक्त आदेश पारित किया जाए।
हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कर्मचारियों का दावा स्वीकार किया जाता है तो उन्हें वही लाभ दिए जाएं, जो पहले ‘योगेश त्यागी बनाम हरियाणा राज्य’ मामले में दिए गए थे। इस फैसले के बाद हरियाणा में लंबे समय से कार्यरत हजारों कच्चे कर्मचारियों में उम्मीद की नई किरण जगी है।
Akhil Mahajan