रोहतक से दिल्ली ग्रीन कॉरिडोर बनाकर पहुंचाया गया डोनर का दिल, विजेंद्र के अंगदान से कई जिंदगियां बचीं
रोहतक में ब्रेन डेड युवक विजेंद्र के परिवार ने अंगदान कर कई जिंदगियां बचाईं। दिल्ली तक ग्रीन कॉरिडोर बनाकर दिल समेत कई अंगों का सफल ट्रांसप्लांट किया गया।
➤ ब्रेन डेड युवक के परिवार ने लिया बड़ा फैसला, अंगदान से कई जिंदगियां बचीं
➤ रोहतक से दिल्ली तक बना ग्रीन कॉरिडोर, 100 पुलिसकर्मी मिशन में जुटे
➤ 6 घंटे चली प्रक्रिया, दिल, फेफड़े, किडनी और आंखें जरूरतमंदों को मिलीं
हरियाणा के रोहतक से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो दर्द के बीच उम्मीद की रोशनी बन गई। भिवानी के रहने वाले 36 वर्षीय विजेंद्र की जिंदगी भले ही थम गई, लेकिन उनके परिवार के फैसले ने कई लोगों को नई जिंदगी दे दी।
दरअसल, विजेंद्र 26 मार्च को गंभीर हालत में पीजीआई रोहतक में भर्ती हुए थे। उनके सिर में गहरी चोट थी। डॉक्टरों ने लगातार इलाज किया, लेकिन हालत में सुधार नहीं हुआ। जांच में सामने आया कि विजेंद्र ब्रेन डेड हो चुके हैं।
यह खबर परिवार के लिए किसी टूटन से कम नहीं थी, लेकिन इसी दर्द के बीच उन्होंने एक ऐसा फैसला लिया, जिसने इस घटना को मिसाल बना दिया। डॉक्टरों की टीम ने परिजनों को ऑर्गन डोनेशन के लिए प्रेरित किया। कुछ समय की चर्चा और समझाइश के बाद परिवार ने अपने बेटे के अंग दान करने की सहमति दे दी।
गुरुवार को सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक करीब 6 घंटे तक चली प्रक्रिया में डॉक्टरों की टीम ने विजेंद्र के अंग सुरक्षित निकाले। इस दौरान रोहतक, दिल्ली और गुरुग्राम के डॉक्टरों की संयुक्त टीम मौजूद रही।
सबसे भावुक और चुनौतीपूर्ण पल तब आया, जब विजेंद्र का हृदय (Heart) दिल्ली के एक मरीज तक पहुंचाना था। इसके लिए रोहतक से दिल्ली तक ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया। करीब 100 पुलिसकर्मी इस मिशन में तैनात रहे। रास्ते को पूरी तरह खाली कराया गया, ताकि एंबुलेंस बिना किसी रुकावट के तेजी से दिल्ली पहुंच सके।
इस ग्रीन कॉरिडोर के जरिए दिल को समय पर दिल्ली पहुंचाया गया, जहां एक जरूरतमंद मरीज को नई जिंदगी मिली। वहीं विजेंद्र के फेफड़े गुरुग्राम, किडनी रोहतक पीजीआई और आंखें भी दान की गईं।
पीजीआईएमएस रोहतक के वीसी डॉ. एचके अग्रवाल ने बताया कि विजेंद्र को गंभीर हालत में भर्ती कराया गया था। दो बार ब्रेन की जांच की गई, जिसमें उन्हें ब्रेन डेड घोषित किया गया। इसके बाद ट्रांसप्लांट टीम ने परिवार से संपर्क किया।
इस पूरी प्रक्रिया के दौरान अस्पताल में एक अलग ही माहौल था। जब विजेंद्र की बॉडी को अंतिम विदाई दी गई, तो अस्पताल के सुरक्षाकर्मियों ने सलामी देकर उन्हें सम्मान दिया। यह पल वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम कर गया।
जानकारी के अनुसार, विजेंद्र 26 मार्च की सुबह काम के लिए घर से निकले थे। कुछ ही घंटों बाद परिवार को सूचना मिली कि वह भिवानी बस स्टैंड पर बेहोशी की हालत में मिले हैं। इसके बाद उन्हें तुरंत रोहतक पीजीआई लाया गया। हालांकि अब तक यह साफ नहीं हो पाया कि वह इस हालत में कैसे पहुंचे।
लगातार इलाज के बावजूद विजेंद्र को होश नहीं आया और 8 अप्रैल को उनका निधन हो गया। लेकिन उनके परिवार के फैसले ने इस दुखद घटना को जीवनदान की प्रेरणादायक कहानी में बदल दिया।
Akhil Mahajan