4 वर्षीय अंशु के अंगदान से छह लोगों को मिला नया जीवन

रोहतक PGIMS में 14 वर्षीय अंशु के अंगदान से छह लोगों को नया जीवन मिला। ब्रेन स्टेम डेड घोषित होने के बाद परिवार ने मानवता की मिसाल पेश की।

4 वर्षीय अंशु के अंगदान से छह लोगों को मिला नया जीवन
  • 14 वर्षीय अंशु के अंगदान से छह लोगों को मिला नया जीवन
  • ब्रेन स्टेम डेड घोषित होने के बाद परिवार ने लिया मानवता भरा फैसला
  • पीजीआइएमएस रोहतक में सफलतापूर्वक किडनी, कार्निया और लिवर ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया पूरी

पंडित भगवत दयाल शर्मा स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय के पीजीआइएमएस में एक 14 वर्षीय बच्चे के परिवार ने असहनीय दुख के बीच ऐसा निर्णय लिया, जिसने छह जरूरतमंद लोगों के जीवन में नई उम्मीद जगा दी। झज्जर जिले के बादली क्षेत्र के गांव सौंधी निवासी 14 वर्षीय अंशु को 20 मई को गंभीर हालत में ट्रॉमा सेंटर लाया गया था। बच्चे के सिर में गंभीर चोट थी और उसकी स्थिति लगातार नाजुक बनी हुई थी।

आइसीयू इंचार्ज डा. तरुण यादव और उनकी टीम ने तुरंत उपचार शुरू किया। उपचार के दौरान बच्चे की किडनी भी प्रभावित हो रही थी। नेफ्रोलॉजिस्ट डा. अंकुर गोयल के सहयोग से किडनी की कार्यप्रणाली को सामान्य किया गया, लेकिन सिर में गंभीर चोट के कारण 22 मई को चिकित्सकों की टीम ने अंशु को ब्रेन स्टेम डेड घोषित कर दिया।

यह खबर सुनते ही परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। पिता बार-बार अपने बेटे को पुकारते रहे और पूरा परिवार गहरे सदमे में डूब गया। इसी दौरान सोटो हरियाणा की टीम ने परिवार को अंगदान के महत्व के बारे में जानकारी दी। भारी मन और आंसुओं के बीच परिवार ने ऐसा साहसिक फैसला लिया, जिसने मानवता की मिसाल कायम कर दी।

परिजनों की सहमति के बाद अंशु के अंग दान किए गए। उसकी दोनों किडनियां पीजीआइएमएस के दो मरीजों में सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित की गईं। वहीं दोनों कार्निया से दो लोगों को आंखों की रोशनी मिल सकेगी। इसके अलावा लिवर को इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलियरी साइंसेज भेजा गया, जहां स्प्लिट लिवर तकनीक के जरिए दो मरीजों को नया जीवन मिलेगा।

इस तरह एक मासूम बच्चे ने दुनिया से विदा लेने के बाद भी छह घरों में उम्मीद की लौ जला दी। इस भावुक क्षण के दौरान विश्वविद्यालय के कुलपति डा. एचके अग्रवाल स्वयं परिजनों से मिलने पहुंचे। परिवार की संवेदना और साहस को देखकर उनकी आंखें भी नम हो गईं।

डा. अग्रवाल ने कहा कि एक पिता के लिए अपने बेटे को खोना सबसे बड़ा दुख होता है, लेकिन इस परिवार ने अपने दर्द को मानवता की ताकत में बदल दिया। उन्होंने कहा कि समाज इस त्याग और साहस को कभी नहीं भूल पाएगा। दादी को सांत्वना देते हुए उन्होंने कहा कि आपका पोता कहीं नहीं गया, वह अब छह लोगों की सांसों में जीवित रहेगा।

पीजीआइएमएस रोहतक में यह लगातार सफल अंगदान की घटनाओं में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है। संस्थान में अब तक छह सफल अंगदान और ट्रांसप्लांट हो चुके हैं। वर्ष 2024 में यहां पहला सफल अंगदान हुआ था। हाल के महीनों में कई ब्रेन डेड मरीजों के अंगदान से अनेक लोगों को नया जीवन मिल चुका है।

विशेषज्ञों के अनुसार, कोई भी वयस्क व्यक्ति जीवित रहते हुए अंगदान की इच्छा व्यक्त कर सकता है। इसके लिए राष्ट्रीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन यानी NOTTO या राज्य स्तरीय पोर्टल पर पंजीकरण कराया जा सकता है। हालांकि अंतिम निर्णय में परिवार की सहमति सबसे अहम मानी जाती है।