हिमाचल हाईकोर्ट सख्त: नियम तोड़े तो पंचायत चुनाव रद्द 196 पंचायतों पर संकट
हिमाचल हाईकोर्ट ने पंचायत चुनाव से पहले बड़ा फैसला देते हुए कहा है कि जिन पंचायतों के गठन और डिलिमिटेशन में नियमों का पालन नहीं हुआ, वहां चुनाव नहीं होंगे। 196 पंचायतों की वैधता पर सवाल खड़े हो गए हैं।
■ डिलिमिटेशन में नियमों का पालन नहीं तो चुनाव नहीं होंगे
■ 13 फरवरी के बाद बनी 196 पंचायतों पर संकट गहराया
■ सरकार को 7 अप्रैल तक आरक्षण रोस्टर जारी करने का आदेश
हिमाचल प्रदेश में पंचायत चुनाव से ठीक पहले हाईकोर्ट के एक अहम फैसले ने राज्य सरकार की चुनावी तैयारियों को झटका दे दिया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि पंचायतों के गठन, पुनर्गठन और सीमांकन (डिलिमिटेशन) की प्रक्रिया में यदि कानूनी नियमों का पालन नहीं किया गया, तो ऐसी पंचायतों में चुनाव नहीं कराए जा सकते। इस फैसले का सीधा असर उन करीब 196 नई पंचायतों पर पड़ा है, जिनका गठन 13 फरवरी 2026 के बाद किया गया था और जिनकी प्रक्रिया पर अब सवाल उठ रहे हैं।
महिला मंडल उमरी समेत कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर और जस्टिस रंजन शर्मा की बेंच ने कहा कि पंचायतों से जुड़ी पूरी प्रक्रिया दो चरणों में होती है। पहले राज्य सरकार पंचायतों का गठन या पुनर्गठन करती है और इसके बाद संबंधित उपायुक्त (डीसी) द्वारा क्षेत्रों का सीमांकन किया जाता है। इस दौरान नोटिस जारी करना, आपत्तियां आमंत्रित करना और उन पर सुनवाई करना अनिवार्य प्रक्रिया है। अदालत ने साफ कहा कि यदि इन नियमों की अनदेखी की गई है, तो पूरी प्रक्रिया अवैध मानी जाएगी और उसके आधार पर चुनाव नहीं हो सकते।
कोर्ट ने अपने आदेश में 13 फरवरी 2026 के बाद की गई कार्रवाइयों पर विशेष सख्ती दिखाई है। जिन पंचायतों में इस अवधि के दौरान डिलिमिटेशन किया गया और उसमें नियमों का पालन नहीं हुआ, वहां चुनाव पुराने ढांचे के आधार पर ही कराए जाएंगे। यानी हाल ही में किए गए बदलाव फिलहाल लागू नहीं होंगे। इससे राज्य के कई इलाकों में प्रशासन को अब फिर से चुनावी प्रक्रिया को व्यवस्थित करना पड़ेगा।
साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जहां-जहां सभी नियमों का सही तरीके से पालन किया गया है, वहीं पंचायतें वैध मानी जाएंगी और उन्हीं के आधार पर चुनाव कराए जा सकेंगे। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि वह 7 अप्रैल 2026 तक आरक्षण रोस्टर जारी करे और निर्धारित समय सीमा के भीतर पूरी चुनाव प्रक्रिया पूरी करे।
इस फैसले के बाद पंचायतीराज विभाग सक्रिय हो गया है और यह जांच की जा रही है कि 13 फरवरी के बाद गठित पंचायतों में से किन-किन में नियमों का पालन हुआ और किनमें नहीं। इससे साफ है कि आने वाले दिनों में पंचायत चुनाव की पूरी तस्वीर बदल सकती है।
अदालत ने यह भी कहा कि मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए फिलहाल केवल जरूरी मुद्दों पर ही फैसला दिया गया है और पंचायतों के गठन, विभाजन व सीमांकन की वैधता से जुड़े अन्य मामलों पर अंतिम निर्णय अभी बाकी है। याचिकाकर्ता चाहें तो इन मुद्दों पर आगे अलग से याचिका दायर कर सकते हैं।
वहीं इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। बीजेपी विधायक रणधीर शर्मा ने कांग्रेस सरकार पर आरोप लगाया कि पंचायत चुनावों को जानबूझकर टालने के लिए प्रक्रिया में देरी की गई। उन्होंने कहा कि चुनाव दिसंबर 2025 या जनवरी 2026 में होने थे, लेकिन सरकार ने प्रशासनिक स्तर पर बाधाएं खड़ी कीं, जिससे वोटर लिस्ट और रोस्टर जैसी प्रक्रियाएं प्रभावित हुईं। उन्होंने डिजास्टर एक्ट का सहारा लेकर चुनाव टालने को संवैधानिक भावना के खिलाफ बताया और इस मुद्दे पर सदन में चर्चा की मांग की।
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