इतनी छोटी उम्र में इतना गुस्सा, आखिर बच्चों के भीतर क्या चल रहा है

पंचकूला के एक स्कूल में तीसरी कक्षा के छात्र ने हैवानियत की सारी हदें पास करते हुए  केजी की नन्‍हीं बच्ची पर पत्थरों और गमले से हमला करके अधमरा कर दिया है। इस खबर ने हर माता-पिता को भीतर तक हिला दिया है। मामले की जांच पुलिस कर रही है और सच्चाई जांच के बाद ही सामने आएगी। लेकिन यह घटना एक बड़ा सवाल छोड़ गई है। आखिर इतनी छोटी उम्र के बच्चे में इतना गुस्सा और इतनी हिंसा कहां से आ रही है।

इतनी छोटी उम्र में इतना गुस्सा, आखिर बच्चों के भीतर क्या चल रहा है

➤ पंचकूला की घटना ने झकझोरा, छोटे बच्चों में बढ़ती हिंसक प्रवृत्ति पर उठे सवाल
➤ मोबाइल का हिंसक कंटेंट, घर का तनाव और संवाद की कमी बन रहे बड़े कारण
➤ डांट या पिटाई नहीं, समय पर संवाद और विशेषज्ञ की सलाह ही है समाधान


पंचकूला के एक स्कूल में तीसरी कक्षा के छात्र ने हैवानियत की सारी हदें पास करते हुए  केजी की नन्‍हीं बच्ची पर पत्थरों और गमले से हमला करके अधमरा कर दिया है। इस खबर ने हर माता-पिता को भीतर तक हिला दिया है। मामले की जांच पुलिस कर रही है और सच्चाई जांच के बाद ही सामने आएगी। लेकिन यह घटना एक बड़ा सवाल छोड़ गई है। आखिर इतनी छोटी उम्र के बच्चे में इतना गुस्सा और इतनी हिंसा कहां से आ रही है।

क्या यह सिर्फ एक घटना है

किसी एक घटना के आधार पर पूरी पीढ़ी को कटघरे में खड़ा करना सही नहीं है। ज्यादातर बच्चे आज भी मासूम और संवेदनशील हैं। लेकिन बाल मनोविज्ञान से जुड़े जानकार लंबे समय से चेतावनी दे रहे हैं कि बच्चों में गुस्सा, चिड़चिड़ापन और आक्रामक व्यवहार बढ़ रहा है। इसे हल्के में लेना भारी पड़ सकता है। छोटे बच्चे अक्सर अपनी भावनाओं को शब्दों में नहीं कह पाते। जो बात वे बोल नहीं पाते, वह कई बार उनके व्यवहार में दिखती है।

आखिर क्यों आ रही है हिंसक प्रवृत्ति

विशेषज्ञ इसके पीछे किसी एक नहीं, बल्कि कई कारण मानते हैं।

मोबाइल और स्क्रीन का असर: आज छोटे बच्चे भी घंटों मोबाइल, टीवी और गेम में डूबे रहते हैं। कई गेम और वीडियो में मारपीट और हिंसा को सामान्य और मजेदार दिखाया जाता है। छोटे बच्चे असली और नकली का फर्क पूरी तरह नहीं समझ पाते। वे जो देखते हैं, उसकी नकल करने लगते हैं।

घर का माहौल: जिस घर में रोज झगड़े, चीख-पुकार या मारपीट होती है, वहां बच्चा गुस्से को ही समस्या सुलझाने का तरीका मान लेता है। बच्चे उपदेश से नहीं, देखकर सीखते हैं। अगर घर में बच्चे को खुद पिटाई या कठोर व्यवहार का सामना करना पड़ता है, तो वह भी वही व्यवहार दूसरों के साथ दोहरा सकता है।

माता-पिता के पास समय की कमी: दोनों अभिभावकों के नौकरी करने, व्यस्त दिनचर्या और एकल परिवारों में बच्चे अकेले पड़ते जा रहे हैं। उनसे बात करने, उनकी सुनने और उनके साथ खेलने वाला कोई नहीं होता। अकेलापन और अनसुना रह जाने का भाव कई बार गुस्से के रूप में बाहर आता है।

भावनाएं संभालना कोई नहीं सिखाता: हम बच्चों को पढ़ाई, अंक और प्रतियोगिता तो सिखाते हैं, लेकिन गुस्सा, ईर्ष्या, डर और निराशा को संभालना नहीं सिखाते। जब बच्चे को यह पता ही न हो कि गुस्सा आने पर क्या करना है, तो वह हाथ उठा देता है।

अत्यधिक छूट या अत्यधिक सख्ती: हर जिद पूरी करने वाला घर बच्चे को सिखाता है कि 'ना' सुनना उसके लिए नहीं बना। वहीं बहुत ज्यादा सख्ती और डर का माहौल भी बच्चे के भीतर दबा हुआ गुस्सा भर देता है। दोनों ही स्थितियां खतरनाक हो सकती हैं।

बुलिंग और साथियों का दबाव: कई बार जो बच्चा हिंसक दिखता है, वह खुद कहीं न कहीं परेशान किया गया होता है। स्कूल या मोहल्ले में दबाव, चिढ़ाया जाना या डराया जाना भी व्यवहार को बदल देता है।

मानसिक और विकास संबंधी कारण: कुछ मामलों में बच्चे के व्यवहार के पीछे ध्यान और आवेग नियंत्रण की समस्या, चिंता, सदमा या भावनात्मक कठिनाइयां भी हो सकती हैं। इनकी पहचान केवल प्रशिक्षित बाल मनोवैज्ञानिक या चिकित्सक ही कर सकते हैं। इसलिए अपने मन से कोई निष्कर्ष न निकालें।

किन संकेतों को नजरअंदाज न करें

अगर बच्चा बार-बार दूसरों को मारता या काटता है, छोटी बात पर आपा खो देता है, चीजें तोड़ता है, जानवरों या छोटे बच्चों को परेशान करता है, गलती करने पर भी बिल्कुल पछतावा नहीं दिखाता या बात-बात पर दूसरों को चोट पहुंचाने की धमकी देता है, तो इसे बचपन की शरारत मानकर टालना ठीक नहीं है। ऐसे में शुरुआती दौर में ही मदद लेना सबसे असरदार रहता है।

माता-पिता क्या करें

रोज कम से कम कुछ समय बिना मोबाइल के बच्चे के साथ बिताएं और उसकी बात पूरे ध्यान से सुनें। बच्चे के स्क्रीन टाइम की सीमा तय करें और वह क्या देख रहा है, इस पर नजर रखें। गुस्सा आने पर क्या करना चाहिए, यह उसे सरल शब्दों में सिखाएं, जैसे गहरी सांस लेना, अपनी बात कहना या बड़ों को बताना। अच्छे व्यवहार की सराहना करें। घर में खुद भी शांत व्यवहार का उदाहरण पेश करें, क्योंकि बच्चा आपको ही देखकर सीखता है। बच्चे को सबके सामने डांटने, शर्मिंदा करने या पीटने से बचें। इससे गुस्सा घटता नहीं, बढ़ता है। जरूरत लगे तो स्कूल काउंसलर या बाल मनोवैज्ञानिक से सलाह लेने में संकोच न करें। यह कमजोरी नहीं, समझदारी है।

स्कूलों की जिम्मेदारी

स्कूलों में सिर्फ पढ़ाई नहीं, बच्चों की भावनात्मक सुरक्षा और व्यवहार पर भी ध्यान देना जरूरी है। इंटरवल, खेल के समय, गलियारों और खुले परिसर में पर्याप्त स्टाफ की तैनाती, सीसीटीवी की नियमित जांच, छोटे और बड़े बच्चों की निगरानी का अलग इंतजाम और स्कूल में प्रशिक्षित काउंसलर की मौजूदगी अब विकल्प नहीं, जरूरत है। शिक्षकों को भी आक्रामक व्यवहार के शुरुआती संकेत पहचानने का प्रशिक्षण मिलना चाहिए।

समाज के लिए सबक

बच्चे किसी एक घर या स्कूल की नहीं, पूरे समाज की जिम्मेदारी हैं। हम जो फिल्में, वीडियो और खबरें बच्चों के सामने चलाते हैं, जैसा माहौल देते हैं और जैसा व्यवहार दिखाते हैं, वही आने वाली पीढ़ी का चरित्र गढ़ता है। जरूरत है कि हम दोषारोपण से आगे बढ़कर संवाद, संवेदना और समय देने की ओर लौटें। पंचकूला की घटना का सबसे बड़ा सबक यही है कि बच्चों के व्यवहार की आहट को समय रहते सुना जाए, इससे पहले कि बात हाथ से निकल जाए।

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