सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: पति भी अब रख सकेंगे पत्नी का सरनेम
सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया, पति को भी पत्नी का सरनेम अपनाने का अधिकार मिला। पुराने उपनिवेशकालीन कानून को खारिज किया गया। भारत में सरनेम को लेकर कानूनी बाध्यता पर सवाल उठे।
➤ दक्षिण अफ्रीका सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया, पति भी पत्नी का सरनेम अपना सकेंगे
➤ पुराने उपनिवेशकालीन कानून को खारिज किया गया, यह लैंगिक भेदभाव को बढ़ावा देता था
➤ भारत में सरनेम को लेकर कानूनी बाध्यता, लेकिन अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों से प्रेरणा मिली
दक्षिण अफ्रीका की सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए यह तय किया है कि अब पति भी अपनी पत्नी का सरनेम अपना सकेंगे। यह निर्णय उन पुराने उपनिवेशकालीन कानूनों को चुनौती देता है, जो पुरुषों को यह अधिकार नहीं देते थे। कोर्ट ने कहा कि यह कानून उपनिवेशवाद की देन है और लैंगिक भेदभाव को बढ़ावा देता है।
इस फैसले से पहले अमेरिका में पति को अपनी पत्नी का सरनेम रखने का अधिकार था, हालांकि कुछ राज्यों में इसके लिए अतिरिक्त अदालत की मंजूरी की आवश्यकता होती थी। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में भी पति को पत्नी का उपनाम अपनाने का अधिकार था। न्यूजीलैंड का कानून शादी के बाद किसी का उपनाम बदलने का प्रावधान नहीं करता था। पुर्तगाल में 1977 से पति को अपनी पत्नी का उपनाम अपनाने की सहमति मिलने पर अधिकार दिया गया।
भारत में परंपरागत रूप से शादी के बाद महिलाओं को पति का सरनेम अपनाना अनिवार्य माना जाता था। यह बाध्यता मायके वाला सरनेम रखने की स्वतंत्रता को नहीं देती थी। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले में कहा गया कि पति का भी वही अधिकार होना चाहिए, जो पत्नी का होता है।
इस फैसले के तहत सरकार को भी "नेम्स एंड जेंडर रजिस्ट्रेशन एक्ट" में बदलाव करना आवश्यक हो गया है। गृह मंत्री सिमोन साइबर और न्याय मंत्री मालोचीका कुँवरानी ने भी यह माना कि पुराने कानून का कोई औचित्य नहीं बचा।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पति और पत्नी के बीच सहमति होनी चाहिए। साथ ही, यह कानून नए सामाजिक यथार्थ और लैंगिक समानता के अनुरूप बनना चाहिए। कोर्ट ने यह फैसला दो दशकों की चुनौती के बाद सुनाया है।
अब पूरे समाज में यह नया उदाहरण बन गया है कि पारंपरिक सोच को बदलकर समान अधिकारों को स्थापित किया जा सकता है। यह निर्णय न केवल दक्षिण अफ्रीका बल्कि दुनिया भर के उन देशों के लिए मिसाल बन गया है, जहां परंपरागत कानून महिलाओं पर ही सरनेम अपनाने की बाध्यता डालते थे।