'महिला सिलेंडर नहीं उठा सकती' कहकर नौकरी नहीं दी थी: इंडियन ऑयल कोअब देना होगा 12 लाख का मुआवजा देगा

नौकरी विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने इंडियन ऑयल को हरियाणा की महिला सुमित्रा को 12 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है।

'महिला सिलेंडर नहीं उठा सकती' कहकर नौकरी नहीं दी थी: इंडियन ऑयल कोअब देना होगा 12 लाख का मुआवजा देगा

सिर्फ महिला होने के आधार पर नौकरी से इनकार का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा

38 साल पुराने मामले में इंडियन ऑयल को ₹12 लाख मुआवजा देने का आदेश

कोर्ट ने पूछा- क्या महिलाएं घरों में गैस सिलेंडर नहीं उठातीं


नई दिल्ली। करीब 38 साल पुराने नौकरी से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश देते हुए इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) को हरियाणा की महिला सुमित्रा को 12 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया है। मामला उस समय का है जब सुमित्रा को इंडियन ऑयल के LPG बॉटलिंग प्लांट में नौकरी के लिए चुना गया था, लेकिन बाद में केवल इस आधार पर नियुक्ति नहीं दी गई कि महिला होने के कारण वह गैस सिलेंडर नहीं उठा पाएंगी। अब जब सुमित्रा सेवानिवृत्ति की उम्र तक पहुंच चुकी हैं, सुप्रीम कोर्ट ने नौकरी देने के बजाय मुआवजे का आदेश दिया है।

यह मामला हरियाणा की रहने वाली सुमित्रा से जुड़ा है। उन्होंने नौकरी नहीं दिए जाने के फैसले के खिलाफ लंबे समय तक कानूनी लड़ाई लड़ी। मामला ट्रायल कोर्ट से होते हुए प्रथम अपीलीय अदालत, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट और आखिरकार सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब इंडियन ऑयल को सुमित्रा को 12 लाख रुपये का मुआवजा देना होगा।

1988 में नौकरी के लिए दिया था इंटरव्यू

सुमित्रा हरियाणा के गुढ़ा गांव की रहने वाली हैं। वर्ष 1988 में उनका नाम उन 49 लोगों की सूची में शामिल किया गया था, जिनकी सिफारिश डिप्टी कमिश्नर की अध्यक्षता वाली समिति ने इंडियन ऑयल के LPG बॉटलिंग प्लांट के लिए की थी।

सुमित्रा ने खलासी, चपरासी या रीफिलिंग हेल्पर के पद के लिए इंटरव्यू दिया था। इसके बाद अन्य चयनित लोगों को नियुक्ति पत्र दे दिए गए, लेकिन सुमित्रा को नौकरी नहीं मिली।

इसके बाद उन्होंने नियुक्ति नहीं दिए जाने के खिलाफ ट्रायल कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। ट्रायल कोर्ट ने माना कि सुमित्रा नौकरी के लिए निर्धारित योग्यता पूरी करती थीं। अदालत ने एक गवाह के बयान का भी उल्लेख किया, जिसके आधार पर यह बात सामने आई कि उन्हें महिला होने के कारण नौकरी नहीं दी गई थी।

ट्रायल कोर्ट के बाद मामला हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट पहुंचा

ट्रायल कोर्ट के फैसले के बाद इंडियन ऑयल ने अपील की। 6 अगस्त 1993 को प्रथम अपीलीय अदालत ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया। इसके बाद मामला आगे हरियाणा हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने अक्टूबर 2025 में निचली अदालत के उस फैसले को पलट दिया था, जिसमें IOC को सुमित्रा को मजदूर के अलावा किसी अन्य पद पर नियुक्त करने का निर्देश दिया गया था। इसके बाद सुमित्रा ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

‘क्या महिलाएं घरों में गैस सिलेंडर नहीं उठातीं’

सुनवाई के दौरान इंडियन ऑयल की ओर से दलील दी गई कि संबंधित काम में भारी LPG सिलेंडर उठाने पड़ते हैं और कर्मचारियों को रात की शिफ्ट में भी काम करना होता है। इसी आधार पर अधिकारियों ने महिला को उस काम के लिए उपयुक्त नहीं माना होगा।

इस दलील पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या महिलाएं अपने घरों में गैस सिलेंडर नहीं उठातीं। अदालत ने महिला होने के आधार पर नौकरी से इनकार किए जाने को लेकर गंभीर टिप्पणी की।

कोर्ट ने कहा कि भारत में महिलाओं के सम्मान और गरिमा की बात की जाती है। ऐसे में सरकार की कंपनी की ओर से केवल महिला होने के आधार पर नियुक्ति से इनकार करना महिला गरिमा के खिलाफ है।

नौकरी की जगह अब मुआवजा मिलेगा

यह मामला लगभग चार दशक पुराना होने के कारण सुमित्रा अब उस नौकरी को करने की उम्र में नहीं हैं। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अब नियुक्ति देने के बजाय 12 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है।

इस मामले में अदालत के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या किसी महिला को केवल उसके लिंग के आधार पर ऐसे काम के लिए नौकरी से वंचित किया जा सकता है, जबकि वह पद के लिए निर्धारित योग्यता पूरी करती हो।

सुमित्रा ने 1988 से शुरू हुई इस कानूनी लड़ाई में कई अदालतों का रुख किया। लंबे समय बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश के साथ अब इस मामले में उन्हें आर्थिक मुआवजा दिए जाने का रास्ता साफ हुआ है।