सियाचिन में हिमस्खलन: तीन वीर भारतीय सैनिकों की शहादत

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सियाचिन में हिमस्खलन: तीन वीर भारतीय सैनिकों की शहादत
  • सियाचिन ग्लेशियर पर भीषण हिमस्खलन, तीन वीर सपूत शहीद
  • सिपाही मोहित कुमार और अग्निवीर नीरज व राकेश देवभाई ने दी शहादत
  • सेना ने अन्य जवानों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया, खतरा अभी भी बरकरार

लद्दाख के सियाचिन ग्लेशियर पर मंगलवार को  एक भीषण हिमस्खलन की चपेट में आकर सेना का एक जवान और दो अग्निवीर शहीद हो गए। रक्षा सूत्रों ने बताया कि हादसा अचानक हुआ और बचाव दल ने तुरंत राहत कार्य शुरू कर दिया। फिलहाल इलाके में भारी बर्फबारी का दौर जारी है, जिससे हिमस्खलन का खतरा और बढ़ गया है।

शहीद हुए जवानों की पहचान सिपाही मोहित कुमार, अग्निवीर नीरज कुमार चौधरी और अग्निवीर डाभी राकेश देवभाई के रूप में हुई है। सेना ने घटना के तुरंत बाद अन्य जवानों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया और क्षेत्र में एहतियाती कदम बढ़ा दिए हैं।

सियाचिन ग्लेशियर, जिसे दुनिया का सबसे ऊंचा युद्धक्षेत्र कहा जाता है, पर तैनात सैनिकों के लिए हालात बेहद चुनौतीपूर्ण होते हैं। यहां का तापमान अक्सर माइनस 60 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। इस कारण जवानों को फ्रॉस्टबाइट, सांस लेने में दिक्कत, दिमागी सुन्नपन और कोल्ड इंज्युरी जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ऐसे कठिन मौसम और दुर्गम इलाकों में भी भारतीय सैनिक दिन-रात देश की सुरक्षा में डटे रहते हैं।

सियाचिन का महत्व सामरिक दृष्टि से बेहद खास है। यह ग्लेशियर लगभग 78 किलोमीटर में फैला है और भारत-पाक नियंत्रण रेखा, अक्साई चिन और शक्सगाम घाटी से सटा हुआ है। 1984 से पहले यहां किसी भी देश की सेना तैनात नहीं थी, लेकिन पाकिस्तान की कब्जे की कोशिश की जानकारी मिलने पर भारत ने 13 अप्रैल 1984 को ऑपरेशन मेघदूत के जरिए यहां अपनी सेना तैनात कर दी। तब से लेकर अब तक भारतीय सेना लगातार इस इलाके की निगरानी करती आ रही है।

यह स्थान भारत के लिए न केवल इसलिए अहम है क्योंकि यह पाकिस्तान और चीन की गतिविधियों पर पैनी नजर रखने की क्षमता देता है, बल्कि इसकी भौगोलिक स्थिति के कारण लेह से गिलगित तक जाने वाले रास्तों पर भी नियंत्रण सुनिश्चित करता है। यही कारण है कि सियाचिन ग्लेशियर पर भारतीय सेना की मौजूदगी राष्ट्रीय सुरक्षा का अहम हिस्सा मानी जाती है।