राम रहीम केस में बदली बेंच,जस्टिस सुखविंदर कौर सुनवाई से अलग, नई बेंच तय करेंगे कार्यवाहक चीफ जस्टिस
साध्वी यौन शोषण मामले में सजा के खिलाफ राम रहीम की अपील की सुनवाई से पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की जस्टिस सुखविंदर कौर अलग हो गई हैं। अब कार्यवाहक चीफ जस्टिस नई बेंच तय करेंगे।
राम रहीम केस की सुनवाई से जस्टिस सुखविंदर कौर अलग
➤ अब कार्यवाहक चीफ जस्टिस तय करेंगे नई बेंच
➤ बचाव पक्ष ने आरोपों की टाइमलाइन और घटनास्थल पर उठाए सवाल
पंचकूला: साध्वी यौन शोषण मामले में सजा के खिलाफ डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह की अपील पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में सुनवाई कर रही बेंच में बदलाव होगा। जस्टिस सुखविंदर कौर ने इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया है।
जस्टिस सुखविंदर कौर ने केस को कार्यवाहक चीफ जस्टिस के पास भेजते हुए आग्रह किया है कि मामले को ऐसी दूसरी बेंच के सामने लगाया जाए, जिसमें वह शामिल न हों।
यह मामला अब तक जस्टिस विनोद एस. भारद्वाज और जस्टिस सुखविंदर कौर की बेंच के समक्ष सूचीबद्ध था। जस्टिस सुखविंदर कौर के अलग होने के बाद कार्यवाहक चीफ जस्टिस तय करेंगे कि राम रहीम की अपील पर आगे कौन सी बेंच सुनवाई करेगी।
कोर्ट में कस्टडी सर्टिफिकेट भी पेश
हाईकोर्ट के निर्देश पर डेरा प्रमुख का कस्टडी सर्टिफिकेट अदालत में पेश किया गया। कोर्ट ने इसे रिकॉर्ड पर ले लिया है।
अब मामले की अगली सुनवाई नई बेंच के समक्ष होगी। राम रहीम की ओर से ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर अपील पर बचाव पक्ष लगातार विभिन्न कानूनी और तथ्यात्मक बिंदुओं पर दलीलें रख रहा है।
आरोपों की टाइमलाइन पर बचाव पक्ष ने उठाए सवाल
पिछली सुनवाई के दौरान राम रहीम की ओर से पेश वकील जितेंद्र खुराना ने कथित घटनाओं और आरोपों के सामने आने के समय के बीच के अंतर को अदालत के सामने रखा।
बचाव पक्ष की दलील के मुताबिक, कथित घटनाएं वर्ष 1999 की बताई गई हैं, जबकि दुष्कर्म के आरोप पहली बार 2006 में सामने आए। वकील ने अदालत में कहा कि वर्ष 2002 से 2005 के बीच दिए गए कई बयानों में दुष्कर्म के आरोप का उल्लेख नहीं था।
बचाव पक्ष ने इसी आधार पर आरोपों की टाइमलाइन और अभियोजन की कहानी पर सवाल उठाए हैं।
घटनास्थल को लेकर भी दलील
बचाव पक्ष ने कथित घटनास्थल को लेकर भी अदालत में आपत्ति दर्ज कराई। दलील दी गई कि चार्ज में केवल डेरा सच्चा सौदा क्षेत्र स्थित ‘गुफा’ का उल्लेख किया गया है।
वहीं, गवाही के दौरान पुराने और नए डेरे का जिक्र सामने आने की बात कही गई। बचाव पक्ष के अनुसार, दोनों स्थानों के बीच करीब 7 से 8 किलोमीटर की दूरी बताई गई और दोनों जगह गुफा होने की बात सामने आई।
बचाव पक्ष का कहना है कि घटनास्थल को लेकर यह अंतर मामले के तथ्यों की जांच के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
जांच अधिकारी की भूमिका पर भी सवाल
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने जांच अधिकारी इंस्पेक्टर सतीश डागर की भूमिका और निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए।
वकील की ओर से अदालत में दलील दी गई कि जांच अधिकारी के खिलाफ पहले से शिकायतें थीं। बचाव पक्ष के अनुसार, वर्ष 2005 में ही कथित प्रेम पत्र और यौन आरोपों से जुड़े कुछ सवाल तैयार करवा लिए गए थे।
बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि उस समय तक पीड़िता की ओर से दुष्कर्म का आरोप सामने नहीं आया था। इन्हीं परिस्थितियों को आधार बनाकर जांच की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए।
ट्रायल कोर्ट के फैसले की भाषा पर आपत्ति
बचाव पक्ष ने ट्रायल कोर्ट के फैसले में इस्तेमाल भाषा पर भी आपत्ति जताई है।
वकील ने ‘असाधारण परिस्थितियों में असाधारण उपाय’ जैसे शब्दों का उल्लेख करते हुए दलील दी कि ट्रायल कोर्ट ने फैसला सुनाते समय कानून की स्थापित कसौटियों से अलग दृष्टिकोण अपनाया।
राम रहीम की ओर से इन्हीं सहित विभिन्न आधारों पर दोषसिद्धि और सजा को हाईकोर्ट में चुनौती दी जा रही है।
2017 में दोनों मामलों में 10-10 साल की सजा
दो साध्वियों के यौन शोषण के मामलों में पंचकूला की सीबीआई कोर्ट ने अगस्त 2017 में गुरमीत राम रहीम को दोषी ठहराया था।
अदालत ने दोनों मामलों में 10-10 साल की सजा सुनाई थी। इसके अलावा डेरा प्रमुख पर कुल 30.20 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था।
सजा के खिलाफ राम रहीम ने हाईकोर्ट में अपील दायर की है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, एक मामले में 10 साल की सजा पूरी होने के बाद दूसरे मामले की 10 साल की सजा शुरू होनी है।
अब जस्टिस सुखविंदर कौर के मामले से अलग होने के बाद कार्यवाहक चीफ जस्टिस नई बेंच तय करेंगे, जिसके सामने राम रहीम की अपील पर आगे सुनवाई होगी।
pooja