लिव-इन पार्टनर के नाम की वसीयत को माना वैध, 34 साल पुराने जमीन विवाद पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 34 साल पुराने यमुनानगर भूमि विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रही महिला के पक्ष में की गई वसीयत को वैध माना और निचली अदालतों के फैसले बरकरार रखे।

लिव-इन पार्टनर के नाम की वसीयत को माना वैध, 34 साल पुराने जमीन विवाद पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहने पर कानून विवाह की धारणा स्वीकार कर सकता है

संतानहीन व्यक्ति अपनी सेवा करने वाले के पक्ष में संपत्ति की वसीयत कर सकता है

यमुनानगर की 23 बीघा 19 बिस्वा कृषि भूमि से जुड़े 34 साल पुराने विवाद का निपटारा


चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 34 साल पुराने पैतृक कृषि भूमि विवाद का निपटारा करते हुए वसीयत और लंबे समय तक साथ रहने वाले रिश्ते को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई पुरुष और महिला लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहते हैं, तो कानून ऐसी परिस्थितियों में विवाह की धारणा स्वीकार कर सकता है। ऐसे में महिला के पक्ष में की गई वसीयत को केवल इस आधार पर अमान्य नहीं ठहराया जा सकता कि औपचारिक विवाह या करेवा विवाह को लेकर विवाद है अथवा महिला मृतक की रक्त संबंधी उत्तराधिकारी नहीं है। हाईकोर्ट ने यह भी माना कि एक संतानहीन व्यक्ति को अपनी सेवा और देखभाल करने वाले व्यक्ति के पक्ष में संपत्ति की वसीयत करने का अधिकार है।

जस्टिस हरकेश मनुजा की पीठ ने सुरमुख सिंह व अन्य की नियमित द्वितीय अपील को खारिज करते हुए जगाधरी की निचली अदालतों के फैसलों को बरकरार रखा। यह मामला यमुनानगर जिले के गांव सांखेड़ा स्थित 23 बीघा 19 बिस्वा कृषि भूमि से जुड़ा था।

पैतृक जमीन और वसीयत को लेकर दशकों से चल रहा था विवाद

वादकारियों का दावा था कि विवादित भूमि बिशन सिंह की पैतृक संपत्ति थी। उनका कहना था कि बिशन सिंह जाट समुदाय से संबंधित थे और कथित प्रचलित रीति-रिवाजों के अनुसार वह पैतृक संपत्ति अपनी कथित पत्नी देबो के नाम वसीयत नहीं कर सकते थे।

वादकारियों ने यह भी तर्क दिया कि देबो बिशन सिंह की कानूनी पत्नी नहीं थीं। इसी आधार पर उनके पक्ष में की गई वसीयत और सहमति डिक्री को अवैध घोषित करने की मांग की गई थी।

1976 की पंजीकृत वसीयत को अदालत ने माना प्रमाणित

हाईकोर्ट ने मामले से जुड़े रिकॉर्ड और दस्तावेजों का विस्तृत परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि 15 मार्च 1976 की पंजीकृत वसीयत को कानून के प्रावधानों के अनुरूप साबित किया गया था।

वसीयत से जुड़े गवाह ने अदालत में दस्तावेज के निष्पादन की पुष्टि की थी। रिकॉर्ड में प्रमाणीकरण भी मौजूद था। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी वसीयत को संदिग्ध ठहराने के लिए संदेह वास्तविक और ठोस होना चाहिए, केवल काल्पनिक आशंकाओं के आधार पर वैध दस्तावेज को खारिज नहीं किया जा सकता।

बिशन सिंह ने स्वयं देबो को पत्नी के रूप में किया था स्वीकार

अदालत के सामने यह तथ्य भी आया कि वर्ष 1978 की सहमति डिक्री में स्वयं बिशन सिंह ने देबो को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। महत्वपूर्ण बात यह रही कि बिशन सिंह ने अपने जीवनकाल में इस डिक्री को कभी चुनौती नहीं दी।

साक्ष्यों से यह भी सामने आया कि देबो लंबे समय तक बिशन सिंह के साथ रही थीं और उनकी सेवा तथा देखभाल करती थीं। अदालत ने इन परिस्थितियों को मामले के निर्णय में महत्वपूर्ण माना।

लंबे समय तक साथ रहने पर विवाह की धारणा

हाईकोर्ट ने कहा कि जब कोई पुरुष और महिला लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहते हैं, तो कानून ऐसी परिस्थितियों में उनके संबंध के पक्ष में विवाह की धारणा स्वीकार कर सकता है।

इस कारण केवल औपचारिक विवाह के दस्तावेजों को लेकर विवाद के आधार पर महिला के अधिकारों को स्वतः समाप्त नहीं किया जा सकता। हालांकि ऐसे मामलों का फैसला उपलब्ध साक्ष्यों और प्रत्येक मामले की विशिष्ट परिस्थितियों के आधार पर किया जाता है।

संतानहीन व्यक्ति अपनी संपत्ति की कर सकता है वसीयत

पैतृक संपत्ति से जुड़े तर्क पर हाईकोर्ट ने कहा कि भूमि को पैतृक मान भी लिया जाए, तब भी परिस्थितियों और लागू कानून के तहत संतानहीन व्यक्ति अपनी सेवा करने वाले व्यक्ति के पक्ष में संपत्ति का प्रबंध कर सकता है।

वादकारी अदालत के सामने ऐसा कोई बाध्यकारी प्रचलित रिवाज साबित नहीं कर सके, जो इस तरह की वसीयत पर पूर्ण प्रतिबंध लगाता हो। इसी कारण वसीयत को केवल प्रचलित रीति-रिवाज का दावा करके अमान्य नहीं ठहराया गया।

पहले अधिकार स्वीकार किए, बाद में चुनौती देने पर कोर्ट की टिप्पणी

अदालत ने वादकारियों के आचरण पर भी गौर किया। कोर्ट के अनुसार, पूर्व की न्यायिक कार्यवाही में देबो के अधिकारों को स्वीकार किया गया था, जबकि बाद में उन्हीं अधिकारों को चुनौती दी गई।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई पक्ष एक ही विवाद में अलग-अलग अवसरों पर परस्पर विरोधी रुख अपनाकर लाभ नहीं ले सकता। सभी तथ्यों, दस्तावेजों और कानूनी सिद्धांतों पर विचार करने के बाद अदालत ने निचली अदालतों के फैसलों को सही माना और अपील खारिज कर दी।