प्रयागराज संगम पर गूंजे हर-हर गंगे के जयकारे, पौष पूर्णिमा स्नान से शुरू हुआ कल्पवास
Prayagraj Sangam witnessed the grand beginning of Magh Mela 2026 on Paush Purnima. Despite freezing cold, millions of devotees and Kalpvasis took the holy dip.
➡️ प्रयागराज संगम पर पौष पूर्णिमा स्नान पर्व से माघ मेले की शुरुआत
➡️ कड़ाके की ठंड के बावजूद लाखों श्रद्धालु और कल्पवासी स्नान व साधना में लीन
➡️ प्रशासन ने सुरक्षा, यातायात और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए विशेष इंतजाम किए
प्रयागराज के संगम पर माघ मेले का पहला स्नान पर्व पौष पूर्णिमा के अवसर पर आस्था का अद्भुत सैलाब उमड़ा। गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती की त्रिवेणी में लाखों श्रद्धालुओं और कल्पवासियों ने स्नान कर पुण्य अर्जित किया। कड़ाके की ठंड के बावजूद श्रद्धालुओं का उत्साह कम नहीं हुआ।
इस बार की पौष पूर्णिमा विशेष रही क्योंकि यह सुपरमून भी थी। खगोलशास्त्रियों के अनुसार जब चंद्रमा पृथ्वी के सबसे निकट होता है तो उसका आकार और चमक सामान्य से अधिक दिखाई देती है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन स्नान और दान का फल कई गुना बढ़ जाता है। संगम पर स्नान करने वाले श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इससे पापों का क्षय होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
माघ मेले की अवधि लगभग 45 दिन की होती है और इस दौरान देश-विदेश से करोड़ों श्रद्धालु प्रयागराज पहुंचते हैं। प्रशासन ने
अनुमान लगाया है कि इस बार लगभग 15 करोड़ श्रद्धालु मेले में शामिल होंगे। इसके लिए सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। हजारों पुलिसकर्मी और पैरामिलिट्री बल तैनात किए गए हैं। साथ ही स्वास्थ्य सेवाओं, भोजन, जलापूर्ति और आवास की विशेष व्यवस्था की गई है।
संगम तट पर हर-हर गंगे और जय मां सरस्वती के जयकारे गूंजते रहे। साधु-संतों, अखाड़ों और श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने मेले को आध्यात्मिक रंग दिया। पौष पूर्णिमा पर सूर्य और चंद्र पूजा, गायत्री मंत्र जाप और दान-पुण्य का विशेष महत्व है। श्रद्धालुओं ने सत्यनारायण कथा और श्री सूक्तम पाठ भी किया।
कल्पवासियों की तपस्या इस मेले की सबसे बड़ी पहचान है। वे पूरे महीने संगम तट पर रहकर साधना करते हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और इसे जीवन का सबसे बड़ा तप माना जाता है। कल्पवासियों का मानना है कि संगम पर रहकर तप करने से जीवन के सारे दोष दूर होते हैं और आत्मा शुद्ध होती है।
माघ मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। यह आयोजन सामूहिक आस्था, अनुशासन और तपस्या का अद्भुत प्रदर्शन है। संगम स्नान को लेकर देशभर से श्रद्धालु आते हैं, जिससे सांस्कृतिक एकता और धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिलता है। प्रयागराज का यह आयोजन न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से भी अत्यंत प्रभावशाली है।
Akhil Mahajan