सोमनाथ मंदिर में PM मोदी ने पूजा की: शौर्य यात्रा में डमरू बजाया, पुष्प अर्पित किए, जलाभिषेक किया,
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के सोमनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना की। स्वाभिमान पर्व के तहत शौर्य यात्रा निकाली और जनसभा को संबोधित करेंगे।
- पीएम मोदी ने सोमनाथ मंदिर में विधि-विधान से पूजा-अर्चना की
- शिवलिंग पर जल, फूल और पंचामृत से किया अभिषेक
- सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के तहत जनसभा को करेंगे संबोधित
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के सोमनाथ मंदिर में विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। पीएम ने मंदिर में शिवलिंग पर जल चढ़ाया, फूल अर्पित किए और पंचामृत से अभिषेक किया। प्रधानमंत्री ने करीब 30 मिनट तक मंदिर में पूजा की और श्रद्धा के साथ भगवान शिव का आशीर्वाद लिया।
पूजा के बाद प्रधानमंत्री थोड़ी देर में सद्भावना ग्राउंड पहुंचेंगे, जहां वह जनसभा को संबोधित करेंगे। इससे पहले सुबह प्रधानमंत्री ने शंख सर्किल से शौर्य यात्रा निकाली। करीब एक किलोमीटर लंबी यात्रा के दौरान पीएम मोदी ने डमरू भी बजाया, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।
प्रधानमंत्री मोदी शनिवार शाम सोमनाथ पहुंचे थे। इस दौरान सोमनाथ मंदिर पर साल 1026 में हुए पहले आक्रमण के हजार साल पूरे होने के अवसर पर सोमनाथ स्वाभिमान पर्व मनाया जा रहा है। इस विशेष कार्यक्रम का नाम ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ स्वयं प्रधानमंत्री ने रखा है।
यह पर्व 8 से 11 जनवरी तक आयोजित किया जा रहा है। अपने दौरे के पहले दिन प्रधानमंत्री ने रोड शो किया था। उन्होंने सोमनाथ मंदिर में दर्शन-पूजन, ऊं मंत्र के सामूहिक जप में भाग लिया और ड्रोन शो भी देखा। पूरे आयोजन को लेकर श्रद्धालुओं में उत्साह का माहौल बना हुआ है।
साल 2026 सोमनाथ मंदिर के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव बनने जा रहा है। एक ओर साल 1026 में सोमनाथ मंदिर पर हुए हमले के 1000 वर्ष पूरे हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर स्वतंत्र भारत में पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के 75 वर्ष भी इसी साल पूरे होंगे। इन्हीं दो ऐतिहासिक अवसरों को केंद्र में रखकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस आयोजन को ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ नाम दिया है।
इतिहास के अनुसार, 11 मई 1951 को स्वतंत्र भारत में सोमनाथ मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा हुई थी। यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि भारतीय स्वाभिमान, पुनर्निर्माण और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक भी माना जाता है।
इतिहासकारों के मुताबिक सोमनाथ मंदिर पर हुए हमलों के पीछे कई कारण रहे। माना जाता है कि मंदिर को राजाओं, व्यापारियों और विदेशी यात्रियों से अपार दान मिलता था। यह मंदिर समुद्र तट के पास स्थित होने के कारण पश्चिमी भारत का प्रवेश द्वार भी माना जाता था। प्रसिद्ध स्थल पर हमला करना आक्रमणकारी की राजनीतिक शक्ति और भय का प्रतीक माना जाता था। इसके अलावा, उस समय स्थानीय सत्ता की कमजोरी और आंतरिक संघर्ष भी बाहरी आक्रमणों का कारण बने।
इतिहासकार रोमिला थापर के अनुसार मंदिर पर हमले धार्मिक से अधिक राजनीतिक प्रतीक थे। आरसी मजूमदार ने मंदिर की अपार संपत्ति को आक्रमण का मुख्य कारण बताया। सतीश चंद्र ने लिखा कि सोमनाथ पर नियंत्रण का मतलब व्यापार और शक्ति पर नियंत्रण था। वहीं आरएस शर्मा के अनुसार, जब शासक कमजोर होते हैं, तो मंदिर पहले निशाने पर आते हैं।
सोमनाथ मंदिर से जुड़ी कई धार्मिक और भौगोलिक मान्यताएं भी प्रचलित हैं। मान्यता है कि यह चंद्रदेव से जुड़ा इकलौता शिव तीर्थ है। कहा जाता है कि मंदिर के शिखर से दक्षिण दिशा में लगभग 6000 किलोमीटर तक कोई भूमि नहीं आती। समुद्र किनारे स्थित होने के बावजूद लहरें गर्भगृह तक नहीं पहुंचतीं, जिसे शिव कृपा माना जाता है।
इतिहास में यह मंदिर कई बार तोड़ा गया, लेकिन हर बार उसी स्थान पर पुनः निर्मित किया गया। इसी कारण इसे वह मंदिर कहा जाता है, जो हर बार राख से उठ खड़ा हुआ। मंदिर के लूटे गए द्वारों को लेकर भी इतिहासकारों में मतभेद रहे हैं, जिसे लेकर अलग-अलग व्याख्याएं सामने आती रही हैं।
Akhil Mahajan