वेनेजुएला के बाद अमेरिका की भारत पर टेढ़ी नजर, 500 परसेंट टैरिफ की तैयारी

रूस से तेल आयात और इंटरनेशनल सोलर अलायंस से अमेरिका के बाहर होने पर भारत पर कूटनीतिक और ऊर्जा दबाव बढ़ा, ट्रंप सरकार के फैसलों से बदले समीकरण।

वेनेजुएला के बाद अमेरिका की भारत पर टेढ़ी नजर, 500 परसेंट टैरिफ की तैयारी
  • रूसी तेल खरीद पर 500 प्रतिशत टैरिफ की धमकी से भारत पर दबाव
  • अंतरराष्ट्रीय सोलर एलायंस से अमेरिका के बाहर निकलने का फैसला
  • ऊर्जा और कूटनीति दोनों मोर्चों पर भारत के लिए चुनौती

नई दिल्ली। भारत को ऊर्जा और विदेश नीति के मोर्चे पर एक साथ दोहरे दबाव का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने वाले बिल को समर्थन देने और भारत-नेतृत्व वाले अंतरराष्ट्रीय सोलर एलायंस (ISA) से अमेरिका को बाहर निकालने का फैसला किया है। इन फैसलों को भारत के लिए कूटनीतिक और रणनीतिक झटके के तौर पर देखा जा रहा है।

यह घोषणा ऐसे समय में हुई है, जब अमेरिका के नए राजदूत और विशेष दूत सर्जियो गोर इसी सप्ताह दिल्ली पहुंचने वाले हैं। सर्जियो गोर पहले ही साफ कर चुके हैं कि भारत द्वारा रूसी तेल आयात पूरी तरह बंद कराना उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता होगी। वह 12 जनवरी 2026 से भारत में अपना कार्यभार संभालेंगे और सार्वजनिक रूप से इस मुद्दे पर बयान देने की संभावना है।

पेरिस में इस बीच पोलैंड के विदेश मंत्री रादोस्लाव सिकोरस्की ने भारत द्वारा रूसी तेल आयात घटाने पर संतोष जताया। उन्होंने कहा कि यह कदम रूस की युद्ध मशीन की फंडिंग कम करने में मददगार है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने इस बयान का खंडन नहीं किया, जिससे संकेत मिला कि भारत ने दबाव के बीच अपने कदमों में आंशिक बदलाव किया है।

अमेरिका के सीनेटर लिंडसे ग्राहम, जो ट्रंप के करीबी माने जाते हैं, ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप ने रूस प्रतिबंध विधेयक को हरी झंडी दे दी है और इसे अगले सप्ताह संसद में वोटिंग के लिए लाया जा सकता है। इस बिल के तहत भारत, चीन और ब्राजील जैसे देशों पर रूसी तेल खरीद जारी रखने की स्थिति में भारी टैरिफ लगाए जा सकते हैं।

इस विधेयक को अमेरिकी सीनेट में 84 सह-प्रायोजकों और प्रतिनिधि सभा में 151 सांसदों का समर्थन मिल चुका है, जिससे इसके पारित होने की संभावना काफी मजबूत मानी जा रही है। ट्रंप पहले ही भारत पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगा चुके हैं और अब उन्हें 500 प्रतिशत तक बढ़ाने का अधिकार इस बिल के जरिए मिल सकता है।

इस दबाव का असर भारतीय ऊर्जा कंपनियों पर भी दिखने लगा है। रिलायंस इंडस्ट्रीज ने संकेत दिया है कि उसने दिसंबर में रूसी तेल का कोई कार्गो नहीं लिया और जनवरी में भी आयात की संभावना नहीं है। वहीं नायरा एनर्जी पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण पहले ही सीमित स्थिति में है। ऐसे में भारत का रूसी तेल आयात पुराने स्तर पर लौटना मुश्किल माना जा रहा है।

गौरतलब है कि वर्ष 2018 में भी इसी तरह के दबाव में भारत ने ईरान और वेनेजुएला से तेल आयात पूरी तरह बंद कर दिया था। मौजूदा हालात उस दौर की याद दिला रहे हैं।

दूसरी ओर अमेरिका का अंतरराष्ट्रीय सोलर एलायंस से बाहर निकलना भी भारत के लिए झटका है। भारत और फ्रांस द्वारा 2015 में शुरू किए गए इस संगठन में 90 से अधिक देश सदस्य हैं। 2021 में अमेरिका के शामिल होने को वैश्विक सौर ऊर्जा अभियान के लिए बड़ी सफलता माना गया था। अब अमेरिका का ISA, यूएन क्लाइमेट फ्रेमवर्क और दर्जनों अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से बाहर निकलना बहुपक्षीय सहयोग और जलवायु प्रयासों के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।