हरियाणा के कच्चे कर्मचारियों को पक्का करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती, HC की डेडलाइन नजदीक; 12 फरवरी को प्रदेशव्यापी हड़ताल का ऐलान
हरियाणा में कच्चे कर्मचारियों को पक्का करने को लेकर सरकार संकट में है। हाईकोर्ट की 28 फरवरी की डेडलाइन और 12 फरवरी की हड़ताल के बीच सरकार बीच का रास्ता तलाश रही है।
➤ हाईकोर्ट के आदेश की 28 फरवरी तक डेडलाइन, अवमानना का खतरा
➤ 12 फरवरी को संविदा कर्मचारियों की राज्यस्तरीय हड़ताल
➤ नियमितीकरण से बचने को नौकरी सुरक्षा का रास्ता तलाश रही सरकार
हरियाणा की नायब सिंह सैनी सरकार इस समय गंभीर असमंजस की स्थिति में फंसी हुई नजर आ रही है। एक ओर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का संविदा यानी कच्चे कर्मचारियों को पक्का करने का सख्त आदेश है, जिसकी समयसीमा 28 फरवरी को पूरी हो रही है, वहीं दूसरी ओर कर्मचारी संगठनों ने 12 फरवरी को प्रदेशव्यापी हड़ताल का ऐलान कर सरकार पर दबाव और बढ़ा दिया है। अदालत की अवमानना की तलवार और कर्मचारियों के आंदोलन के बीच सरकार बीच का रास्ता निकालने की कोशिश में जुटी है।
हाईकोर्ट के फैसले को लेकर सरकार की मुश्किल इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि यह आदेश केवल नीति आधारित नहीं, बल्कि स्पष्ट समयबद्ध निर्देशों के साथ आया है। ऐसे में आदेश लागू न करने की स्थिति में सरकार पर अवमानना कार्यवाही का सीधा खतरा मंडरा रहा है।
सरकार ने बनाया पोर्टल, मंशा पर सवाल
ऑल इंडिया स्टेट गवर्नमेंट एम्प्लाइज फेडरेशन के अध्यक्ष सुभाष लांबा ने इसे सरकार के लिए बड़ी चुनौती बताते हुए आरोप लगाया कि सरकार संविदा कर्मचारियों के दस्तावेजों को जल्दबाजी में सरकारी पोर्टल पर अपलोड करवा रही है। उनका कहना है कि इसका मकसद कर्मचारियों को 58 वर्ष तक नौकरी की सुरक्षा देना दिखाकर नियमितीकरण की मांग से बचना है।
लांबा के अनुसार, हरियाणा कौशल रोजगार निगम (HKRN) के नोटिफिकेशन में ऐसी शर्तें हैं, जिनसे कर्मचारी नियमितीकरण और समान काम के लिए समान वेतन का दावा नहीं कर सकते। सरकार यह तर्क दे सकती है कि कर्मचारियों ने स्वेच्छा से पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन कर नौकरी सुरक्षा स्वीकार कर ली है, जिससे वह हाईकोर्ट की अवमानना से बच सके।
हाईकोर्ट ने क्या आदेश दिया
31 दिसंबर को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 41 याचिकाओं का निपटारा करते हुए हरियाणा सरकार को बड़ा झटका दिया था। अदालत ने निर्देश दिया था कि राज्य सरकार आठ सप्ताह के भीतर संविदा कर्मचारियों को नियमित करे।
अदालत ने 1993, 1996, 2003 और 2011 की राज्य नीतियों के तहत पात्र कर्मचारियों को नियमित करने का आदेश दिया। इसके अलावा यह भी साफ किया कि वे कर्मचारी जिन्होंने 31 दिसंबर 2025 तक 10 वर्ष की सेवा पूरी कर ली है, भले ही वे इन नीतियों में न आते हों, उन्हें भी नियमित किया जाए।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि पद स्वीकृत न होने की स्थिति में सरकार को नए पद सृजित करने होंगे। साथ ही, नियमितीकरण के पात्र होने के वर्ष से पूरा वेतन और 6 प्रतिशत ब्याज देने के निर्देश भी दिए गए।
सरकार क्यों निकाल रही बीच का रास्ता
सूत्रों के मुताबिक, सरकार के लिए हाईकोर्ट के आदेश को अक्षरशः लागू करना आसान नहीं है, लेकिन वह अवमानना से भी बचना चाहती है। सरकार के पास फिलहाल दो ही विकल्प हैं—या तो आदेश को लागू करे या फिर हाईकोर्ट में चुनौती दे।
एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, सरकार नियमितीकरण की बजाय नौकरी की सुरक्षा देने की प्रक्रिया तेज कर दोनों विकल्प खुले रखना चाहती है। HKRN के तहत नियुक्त करीब 1.20 लाख कर्मचारियों में से पांच साल से अधिक सेवा वाले कर्मचारियों को 58 वर्ष तक नौकरी सुरक्षा के लिए 20 फरवरी तक दस्तावेज अपलोड करने को कहा गया है।
हड़ताल का खतरा और तेज आंदोलन की चेतावनी
इधर, सर्व कर्मचारी संघ के अध्यक्ष नरेश कुमार शास्त्री और महासचिव कृष्ण कुमार नैन ने साफ चेतावनी दी है कि अगर हाईकोर्ट के आदेश को लागू नहीं किया गया तो आंदोलन और तेज होगा। उनका कहना है कि 12 फरवरी की हड़ताल सरकार को अदालत के निर्देशों का पालन कराने की दिशा में निर्णायक कदम साबित होगी।
कुल मिलाकर, कच्चे कर्मचारियों का मुद्दा अब सरकार के लिए केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और कानूनी संकट बन चुका है। आने वाले कुछ दिन तय करेंगे कि सरकार नियमितीकरण की राह पकड़ती है या फिर कानूनी लड़ाई और कर्मचारी आंदोलन का सामना करती है।
Akhil Mahajan